मुन्ना बाबु के कारनामे

गांव के एक सुखी सम्पन्न परिवार की कहानी है। घर की मालकिन का नाम शीला देवी था। मालिक का नाम तो पता नहि पर सब उसे चौधरी कहते थे। शीला देवी, जब शादी हो के आई थी तो देखने में कुछ खास नही थी, रंग भी थोडा सांवला-सा था और शरीर दुबला पतला, छरहरा था। मगर बच्चा पैदा होने के बाद उनक शरीर भरना शुरु हो गया और कुछ ही समय में एक दुबली पतली औरत से एक अच्छी खासी स्वस्थ भरे-पुरे शरीर की मालकिन बन गई। पहले जिस की तरफ एक्का दुक्का लोगो की नजरे इनायत होती थी वह अब सबकी नजरों की चाहत बन चुकी थी। उसके बदन में सही जगहों पर भराव आ जाने के कारण हर जगह से कामुक्ता फुटने लगी थी। छोटी छोटी छातियां अब उन्नत वक्ष-स्थल में तबदील हो चुकी थी। बाहें जो पहले तो लकडी के डन्डे-सी लगती थी अब काफी मांसल हो चुकी थी। पतली कमर थोडी मोटी हो गई थी और पेट पर मांस चड जाने के कारण गुदाजपन आ गया था। और झुकने या बैठने पर दो मोटे-मोटे फोल्ड से बन ने लगे थे। चुतडों में भी मांसलता आ चुकी थी और अब तो यही चुतड लोगो के दिल धडका देते थे। जांघे मोटी मोटी केले के खम्भो में बदल चुकी थी। चेहरे पर एक कशीश-सी आ गई थी और आंखे तो ऐसी नशीली लगती थी जैसे दो बोतलें शराब पी रखी हो। सुंदरता बढने के साथ साथ उसको संभाल कर रखने का ढंग भी उसे आ गया और वह अपने आप को खुब सजा संवार के रखती थी। बोल-चाल में बहुत तेज-तर्रार थी और सारे घर के काम वह खुद ही नौकरो की सहायता से करवाती थी। उसकी सुंदरता ने उसके पति को भी बांध कर रखा हुआ था। चौधरी अपनी बीवी से डरता भी था इसलिए कहीं और मुंह मारने की हिम्मत उसकी नही होती थी। बीवी जब आई थी तो बहुत सार दहेज ले के आई थी इसलिये उसके सामने मुंह खोलने में भी डरता था, बीवी भी उसके उपर पुरा हुकुम चलाती थी। उसने सारे घर को एक तरह से अपने कबजे में कर के रखा हुआ था। बेचारा चौधरी अगर एक दिन भी घर देर से पहुंचता था तो ऐसी ऐसी बाते सुनाती की उसकी सीट्टी पीट्टी गुम हो जाती थी। काम-वासना के मांमले में भी वह बीवी से थोडा उन्नीश ही पडता था। शीला देवी कुछ ज्यादा ही गरम थी। उसका नाम ऐसी औरतों में सामील होता था जो खुद मर्द के उपर चड जाये। गांव की लग-भग सारी औरते उसका लोहा मानती थी और कभी भी कोई मुसीबत में फसने पर उसे ही याद करती थी। चौधरी बेचारा तो बस नाम का ही चौधरी था असली चौधरी तो चौधराईन थी। उन दोनो का एक ही बेटा था नाम उसका राजेश था प्यार से सब उसे राजु कहा करते थे। देखने में बचपन से सुंदर था, थोडी बहुत चंचलता भी थी मगर वैसे सीधा सादा लडका था। जैसे ही थोडा बडा हुआ तो शीला देवी को लगा की इसको गांव के माहोल से दूर भेज दिया जाये ताकि इसकी पढाई लिखाई अच्च्छे से हो और गांव के लौंडों के साथ रह कर बिगड ना जाये। चौधरी ने थोडा बहुत विरोध करने की भी कोशीश की हमार एक ही तो लडका है उसको भी क्यों बाहर भेज रही हो ?  मगर उसकी कौन सुनता, लडके को उसके मामा के पास भेज दिया गया जो की शहर में रह कर व्यापार करता था। मामा को भी बस एक लडकी ही थी। शीला देवी का यह भाई उस से उमर में बडा था और वह खुशी खुशी अपने भांजे को अपने घर रखने के लिये तैयार हो गया था।

दिन इसी तरह बित रहे थे। चौधराईन के रुप में और ज्यादा निखार आता जा रहा था और चौधरी सूखता जा रहा था। अब अगर किसी को बहुत ज्यादा दबाया जाये तो वह चीज इतना दब जाती है की उठना ही भूल जाती है। यही हाल चौधरी का भी था। उसने भी सब कुछ लगभग छोड ही दीया था और घर के सबसे बाहर वाले कमरे में चुप चाप बैठा दो-चार निठ्ठले मर्दों के साथ या तो दिन भर हुक्का पीता या फिर तास खेलता। शाम होने पर चुप चाप सटक लेता और एक बोतल देसी चढा के घर जल्दी से वापस आ कर बाहर के कमरे में पड जाता। नौकरानी खाना दे जाती तो खा लेता नहिं तो अगर पता चल जाता की चौधराईन जली-भूनी बैठी है तो खाना भी नही मांगता और सो जाता। लडका छुट्टियों में घर आता तो फिर सब की चांदी रहती थी क्यों की चौधराईन बहुत खुश रहती थी। घर में तरह तरह के पकवान बनते और किसी को भी शीला देवी के गुस्से का सामना नहि करना पडता था।

एसे ही दिन महिने साल बितते गये, लडका अब सत्रह बरस का हो चुका था। थोडा बहुत चंचल तो हो ही चुका था और बारहवी कि परीक्षा उसने दे दी थी। परीक्षा जब खतम हुई तो शहर में रह कर क्या करता ?, शीला देवी ने बुलवा लिया। अप्रेल में परीक्षा के खतम होते ही वह गांव वापस आ गया। लौंडे पर नई-नई जवानी चढी थी। शहर की हवा लग चुकी थी जीम जाता था सो बदन खूब गठीला हो गया था। गांव जब वह आया तो उसकी खूब आव-भगत हुई। मां ने खूब जम के खिलया पीलया। लडके का मन भी लग गया। पर दो चार दिन बाद ही उसका इन सब चीजों से मन उब-सा गया। अब शहर में रहने पर स्कुल जाना ट्युशन जाना और फिर दोस्तो यारो के साथ समय कट जाता था पर यहां गांव में तो करने धरने के लिये कुछ था ही नही, दिन भर बैठे रहो। ईसलिये उसने अपनी समस्या अपनी शीला देवी को बता दी। शीला देवी ने कहा कि "देख बेटा मैं तो तुझे गांव के ईसी गन्दे माहौल से दूर रखने के लिये शहर भेजा था, मगर अब तु जिद कर रहा है तो ठीक है, गांव के कुछ अच्छे लडकों के साथ दोस्ती कर ले और उन्ही के साथ क्रिकेट या फूटबाल खेल ले या फिर घुम आया कर मगर एक बात और शाम में ज्यादा देर घर से बाहर नही रह सकता तु"। राजु इस पर खुश हो गया और बोला "ठीक है मम्मी तुझे शिकायत का मौका नही दुन्गा"। राजु लडका था, गांव के कुछ बचपन के दोस्त भी थे उसके, उनके साथ घुमना फिरना शुरु कर दिया। सुबह शम उनकी क्रिकेट भी शुरु हो गई। राजु का मन अब थोडा बहुत गांव में लगना शुरु हो गया था। घर में चारो तरफ खुशी का वातावरण था क्यों की आज राजु का जनम-दिन था। सुबह उठ कर शीला देवी ने घर की साफ सफाई करवाई, हलवाई लगवा दीया और खुद भी शाम की तैयारियों में जुट गई। राजु सुबह से बाहर ही घुम रहा था। पर आज उसको पुरी छूट मीली हुई थी। तकरीबन १२ बजे के आस पास जब शीला देवी अपने पति को कुछ काम समझा कर बाजार भेज रही थी तो उसकी मालिश करने वाली आया आ गई।

शीला देवी उसको देख कर खुश होती हुई बोली "चल अच्छा किया आज आ गई, मैं तुझे खबर भिजवाने ही वाली थी, पता नही दो तीन दिन से पीठ में बडी अकडन-सी हो रही है"। आया बोली "मैं तो जब सूनी की आज मुन्ना बाबु का जनम-दिन है तो चली आई की कहीं कोई काम न नीकल आये"। काम क्या होना था, ये जो आया थी वह बहुत मुंह लगी थी चौधराईन की। आया चौधराईन की कामुकता को मानसिक संतृष्टी प्रदान करती थी। अपने दिमाग के साथ पुरे गांव की तरह तरह की बाते जैसे कि कौन किसके साथ लगी है, कौन किससे फसी है और कौन किसपे नजर रखे हुए है आदि करने में उसे बडा मजा आता था। आया भी थोडी कुत्सित प्रवृत्ती की थी उसके दिमाग में जाने क्या क्या चलता रहता था। गांव, मुहल्ले की बाते खूब नमक मिर्च लगा कर और रंगीन बना कर बताने में उसे बडा मजा आता था। ईसलिये दोनो की जमती भी खूब थी। तो फिर चौधराईन सब कामो से फूरसत पा कर अपनी मलीश करवाने के लिये अपने कमरे में जा घुसी। दरवजा बंध करने के बाद चौधराईन बिस्तर पर लेट गई और आया उसके बगल में तेल की कटोरी ले कर बैठ गई। दोनो हाथो में तेल लगा कर चौधराईन की साडी को घुटनो से उपर तक उठाते हुए उसने तेल लगाना शुरु कर दिया। चौधराईन की गोरी चीकनी टांगो पर तेल लगाते हुए आया की बातो का सिलसिला शुरु हो गया था। आया ने चौधराईन की तारिफों के फूल बांधना शुरु कर दिया था। चौधराईन ने थोडा सा मुस्कुराते हुए पुछा "और गांव का हाल चाल तो बता, तु तो पता नही कहां मुंह मारती रहती है, मेरी तारिफ तु बाद में कर लेना"। आया के चेहरे पर एक अनोखी चमक आ गई "क्या हाल चाल बताये मलकिन, गांव में तो अब बस जिधर देखो उधर जोर जबरदस्ती हो रही है, परसों मुखिया ने नंदु कुम्भार को पिटवा दीया पर आप तो जानती ही हो आज कल के लडकों को, ****का बेटा, उंच नीच का उन्हे कुछ ख्याल तो है नहि, नन्दु का बेटा शहर से पढाई कर के आया है पता नहि क्या क्या **** के आया है, उसने भी कल मुखिया को अकेले में धरदबोचा और लगा दी चार-पांच पटखानी, मुखिया पडा हुआ है अपने घर पर अपनी टूटी टान्ग ले के और नन्दु का बेटा गया थाने"| "हा रे, इधर काम के चक्कर में तो पता ही नही चला, मं भी सोच रही थी की कल पुलिस क्यों आई थी, पर एक बात तो बता मैने तो यह भी सुना है की मुखिया की बेटी का कुछ चक्कर था नन्दु के बेटे से"| "सही सुना है मलकिन, दोनो मेइं बडा जबरदस्त नैन-मटक्का चल रहा है, इसी से मुखिया खार खाये बैठा था"| "बडा खराब जमाना आ गया है, लोगों में एक तो उंच नीच का भेद मीट गया है, कौन किसके साथ घुम फिर रहा है यह भी पता नही चलता है, खैर और सुना, मैने सुना है तेरा भी बडा नैन-मटक्का चल रहा है आज कल उस सरपंच के छोरे के साथ, साली बुढिया हो के कहां से फांस लेती है जवान जवान लौन्डो को"|

आया का चेहरा कान तक लाल हो गया था, छिनाल तो वो थी मगर चोरी पकडे जाने पर चेहरे पर शरम की लाली दौड गई। शरमाते और मुस्कुराते हुए बोली "अरे मलकिन आप तो आज कल के लौंडो का हाल जानती ही हो, सब साले छेद के चक्कर में पगलाये घुमते रहते है।"

"पगलाये घुमते है या तु पागल कर देती है,,,,,,,,,,,अपनी जवानी दीखा के" |आया के चेहरे पर एक शर्मिली मुस्कुराहट दौड गई, "क्या मालकिन मैं क्या दीखाउन्गी, फिर थोडा बहुत तो सब करते है"

"थोडा सा साली क्यों झूट बोलती है तु तो पूरी की पूरी छिनाल है, सारे गांव के लडको को बिगाड के रख देगी......"

"अरे मालकिन बिगडे हुए को मैं क्या बिगाडुंगी, गांव के सारे छोरे तो दिन रात इसि चक्कर में लगे रहते हैं"।

"चल साली, तु जैसे दूध की धुली है"|

"अब जो समझ लो मालकिन, पर एक बात बता दुं आपको की ये लौंडे भी कम नहीं है गांव के तालाब पर जो पेड लगा हुआ है ना उस पर बैठ कर खूब तांक झांक करते है"

"अच्छा, पर तुम लोग क्या भगाती नही उन लौन्डो को ?"

"घने घने पेड है चारो तरफ, अब कोइ उनके पीछे छुपा बैठा रहेगा तो कैसे पता चलेगा, कभी दिख जाते है कभी नही दिखते"

"बडे हरामी लौंडे है, औरतो को चैन से नहाने भी नही देते"

"लौंडे तो लौंडे, छोरिया भी कोइ कम हरामी नही है"

"क्यों वो क्या करती है"

"अरे मालकिन दीखा दीखा के नहाती है"

"आच्छा, बडा गन्दा महौल हो गया है गांव का"

"जो भी है मालकिन अब जीना तो इसी गांव में है ना"

"हारे वो तो है, मगर मुझे तो मेरे लडके के कारण डर लगता है, कहीं वो भी ना बिगड जाये"

इस पर आया के होंठों की कमान थोडी-सी खींच गयी। उसके चेहरे की कुटील मुस्कान जैसे कह रही थी की बिगडे हुए को और क्या बिगाडना। मगर आया ने कुछ बोला नहि। शीला देवी हसते हुए बोली "अब तो लडका भी जवान हो गया है, तेरे जेसी रन्डीयों की नजरों से तो बचाना ही पडेगा नहि तो तुम लोग कब उसको हजम कर जाओगी ये भी पता नही लगेगा"

"अब मालकिन झुठ नही बोलुन्गी पर अगर आप सच सुन सको तो एक बात बोलु"

"हा बोल क्या बात"

"चलो रहने दो मालकिन" कह कर आया ने पुरा जोर लगा के चौधराईन की कमर को थोडा कस के दबाया, गोरी चमडी लाल हो गई, चौधराईन के मुंह से हल्की सी आह निकल गई, आया का हाथ अब तेजी से कमर पर चल रहा था। आया के तेज चलते हाथो ने चौधराईन को थोडी देर के लिये भूला दिया की वो क्या पुछ रही थी। आया ने अपने हाथो को अब कमर से थोडा निचे चलाना शुरु कर दीया था। उसने चौधराईन की पेटीकोट के अन्दर खुसी हुइ साडी को अपने हाथो से निकाल दीया और कमर की साइड में हाथ लगा कर पेटीकोट के नाडे को खोल दिया। पेटीकोट को ढीला कर उसने अपने हाथो को कमर के और निचे उतार दिया। हाथो में तेल लगा कर चौधराईन के मोटे-मोटे चुतडो के मांसो को अपनी हथेलीं में दबोच-दबोच कर दबा रही थी। शीला देवी के मुंह से हर बार एक हल्की-सी आनन्द भरी आह निकल जाती थी। अपने तेल लगे हाथो से आया ने चौधराईन की पीठ से लेकर उसके मंसल चुतडों तक के एक-एक कस बल को ढीला कर दिया था। आया का हाथ चुतडों को मसलते मसलते उनके बीच की दरार में भी चला जाता था। चुतडों की दरार को सहलाने पर हुई गुद-गुदी और सिहरन के करण चौधराईन के मुंह से हल्की-सी हसी के साथ कराह निकल जाती थी। आया के मालिश करने के इसी मस्ताने अन्दाज की शीला देवी दिवानी थी। आया ने अपना हाथ चुतडों पर से खींच कर उसकी साडी को जांघो तक उठा कर उसके गोरे-गोरे बिना बालों की गुदाज मांसल जांघो को अपने हाथो में दबा-दबा के मालिश करना शुरु कर दिया। चौधराईन की आंखे आनन्द से मुंदी जा रही थी। आया का हाथ घुटनो से लेकर पुरे जान्घो तक घुम रहे थे। जांघो और चुतडों के निचले भाग पर मालिश करते हुए आया का हाथ अब धीरे धीरे चौधराईन की चुत और उसकी झांठों को भी टच कर रहा था। आया ने अपने हाथो से हल्के हल्के चुत को छुना करना शुरु कर दिया था। चुत को छुते ही शीला देवी के पुरे बदन में सिहरन-सी दौड गई थी। उसके मुंह से मस्ती भरी आह निकल गई। उस से रहा नही गया और पीठ के बल होते हुए बोली "साली तु मानेगी नही"

"मालकिन मेरे से मालिश करवाने का यही तो मजा है"

"चल साली, आज जल्दी छोड दे मुझे बहुत सारा काम है"

"अरे काम-धाम तो सारे नौकर चाकर कर ही रहे है मालकिन, जरा अच्छे से मालिश करवा लो इतने दिनो के बाद आइ हुं, बदन हल्का हो जायेगा"

चौधराईन ने अपनी जांघो को और चौडा कर दिया और अपने एक पैर को घुटनो के पास से मोड दिया, और अपनी छातीयों पर से साडी को हटा दी। मतलब आया को ये सीधा संकेत दे दिया था की कर ले अपनी मरजी की जो भी करना है मगर बोली "हट्ट साली तेरे से बदन हल्का करवाने के चक्कर में नही पडना मुझे आज, आग लगा देती है साली"|

चौधराईन ने अपनी बात अभी पुरी भी नही की थी और आया का हाथ सीधा सारी और पेटीकोट के नीचे से शीला देवी की बुर पर पहुंच गया था। बुर की फांको पर उन्गलियां चलाते हुए अपने अंगुठे से हलके से शीला देवी की चुत की क्लीट को आया सहलाने लगी। चुत एकदम से पनीया गई। आया ने बुर को एक थपकी लगाई और मालकिन की ओर देखते हुए मुस्कुराते हुए बोली "पानी तो छोड रही हो मालकिन"। ईस पर शीला देवी सिसकते हुए बोली "साली ऐसे थपकी लगायेगी तो पानी तो निकलेगा ही"| फिर अपने ब्लाउस के बटन को खोलने लगी। आया ने पुछा "पुरा करवाओगी क्या मालकिन ?"

"पुरा तो करवाना ही पडेगा साली अब जब तुने आग लगा दी है तो"

आया ने मुस्कुराते हुए अपने हाथो को शीला देवी की चुंचियों कि ओर बढा दिया और उनको हल्के हाथो से पकड कर सहलाने लगी जैसे की पुचकार रही हो। फिर अपने हाथो में तेल लगा के दोनो चुचों को दोनो हाथो से पकड के हल्के से खिंचते हुए निप्पलो को अपने अंगुठे और उन्गलियों के बिच में दबा कर खिंचने लगी। चुचियों में धिरे-धिरे तनाव आना शुरु हो गया। निप्पल खडे हो गये और दोनो चुचों में उमर के साथ जो थोडा बहुत थल-थलापन आया हुआ था वो अब मांसल कठोरता में बदल गया। उत्तेजना बढने के कारण चुचियों में तनाव आना स्वाभाविक था। आया की समज में आ गया था की अब मालकिन को गरमी पुरी चढ गई है। आया को औरतो के साथ खेलने में उतना ही मजा आता था जीतना मजा उसको लडको के साथ खेअलने में आता था। चुचियों को तेल लगाने के साथ-साथ मसलते हुए आया ने अपने हाथो को धीरे धीरे पेट पर चलाना शुरु कर दिया था। चौधराईन की गोल-गोल नाभि में अपने उन्गलियों को चलाते हुए आया ने फिर से बाते छेडनी शुरु कर दी।

"मालकिन अब क्या बोलु, मगर मुन्ना बाबु (चौधराईन का बेटा) भी कम उस्ताद नहि है" मस्ती में डुबी हुई अधखुली आंखो से आया को देखते हुए शीला देवी ने पुछा,

"क्यों, क्या किया मुन्ना ने तेरे साथ"

"मेरे साथ क्या करेन्गे मुन्ना बाबु, आप गुस्सा ना हो तो एक बात बताउ आपको"। चौधराईन ने अब अपनी आंखे खोल दी और चौकन्नी हो गई

"हा हा बोल ना क्या बोलना है"

"मालकिन अपने मुन्ना बाबु भी कम नही है, उनकी भी संगत बिगड गई है"

"ऐसा कैसे बोल रही है तु"

"ऐसा इसलिये बोल रही हुं क्यों की, अपने मुन्ना बाबु भी तालाब के चक्कर खूब लगाते है"

"इसका क्या मतलब हुआ, हो सकता है दोस्तों के साथ खेलने या फिर तैरने चला जाता होगा"

"खाली तैरने जाये तब तो ठीक है मालकिन मगर, मुन्ना बाबु को तो मैने कल तालाब किनारे वाले पेड पर चढ कर छुप कर बैठे हुए भी देखा है"

"सच बोल रही है तु "

"और क्या मालकिन, आप से झुठ बोलुन्गी", कह कर आया ने अपना हाथ फिर से पेटीकोट के अंदर सरका दिया और चुत से खेलने लगी। अपनी मोटी मोटी दो उन्गलियों को उसने गचक से शीला देवी की बुर में पेल दिया। चुत में उन्गली के जाते ही शीला देवी के मुंह से आह निकल गई मगर उसने कुछ बोला नही। अपने बेटे के बारे में जानकर उसका ध्यान सेक्ष से हट गया था और वो उसके बारे और ज्यादा जानना चाहती थी। इसलिये फिर आया को कुरेदते हुए कहा -

"अब मुन्ना भी तो जवान हो गया है थोडी बहुत तो उत्सुकता सब के मन में होती है, वो भी देखने चला गया होगा इन मुए गांव के छोरो के साथ"

"पर मालकिन मैने तो उनको शाम में अमिया (आमो का बागीचा) में गुलाबो के चुचे दबाते हुए भी देखा है"
चौधराईन का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा, उसने आया को एक लात कस के मारी, आया गीरी तो नही मगर थोडा हील जरुर गई। आया ने अपनी उन्गलिओं को अभी भी चुत से नही निकलने दिय। लात खाकर भी हसती हुइ बोली "मालकिन जीतना गुस्सा निकालना हो निकाल लो मगर में एकदम सच-सच बोल रही हु। झुठ बोलु तो मेरी जुबान कट के गीर जाये मगर मुन्ना बाबु को तो कई बार मैने गांव की औरते जीधर दिशा-मैदान करने जाती है उधर भी घुमते हुए देख है"

"हाय दैय्या उधर क्या करने जाता है ये सुवर"

"बसन्ती के पीछे भी पडे हुए है छोटे मालिक, वो भी साली खूब दिखा दिखा के नहाती है,,,,,, साली को जैसे ही छोटे मालिक को देखती है और ज्यादा चुतड मटका मटका के चलने लगती है, छोटे मालिक भी पुरे लट्टु हुए बैठे है"

"क्या जमाना आ गया है, इतना पढने लिखने का कुछ फायदा नही हुआ, सब मीट्टी में मीला दिया, इन्हि भन्गिनो और धोबनो के पिछे घुमने के लिये इसे शहर भेजा था"

दो मोटी-मोटी उन्गलियों को चुत में कचा-कच पेलते, निकालते हुए आया ने कहा -
"आप भी मालकिन बेकार में नाराज हो रही हो, नया खून है थोडा बहुत तो उबाल मरेगा ही, फिर यहां गांव में कौन-सा उनका मन लगता होगा, मन लगाने के लिये थोडा बहुत इधर उधर कर लेते है"

"नही रे, मैन सोचती थी कम से कम मेरा बेटा तो ऐसा ना करे"

"वाह मालकिन आप भी कमाल की हो, अपने बेटे को भी अपने ही जैसा बना दो"

"क्या मतलब है रे तेरा"

"मतलब क्या है आप भी समझती हो, खुद तो आग में जलती रहती हो और चाहती हो की बेटा भी जले"
नजरे छुपाते हुए चौधराईन ने कहा

"मैन कौन सी आग में जलती हु रे कुतिया"

"क्यों जलती नही हो क्या, मुझे क्या नही पता की मर्द के हाथो की गरमी पाये आपको ना जाने कितने साल बित चुके है, जैसे आपने अपनी इच्छाओं को दबा के रखा हुअ है वैसे ही आप चाहती हो छोटे मालिक भी करे"

"ऐसा नही है रे, ये सब काम करने की भी एक उमर होती है वो अभी बच्चा है"

"बच्चा है, अरे मालकिन वो ना जाने कितनो को अपने बच्चे की मां बना दे और आप कहती हो बच्चा है"।

"चल साली क्या बकवास करती है"

आया ने बुर की क्लिट को सहलाते हुए और उन्गलियों को पेलते हुए कहा "मेरी बाते तो बकवास ही लगेन्गी मगर क्या आपने कभी छोटे मालिक का औजार देखा है"

"दूर हट कुतिया, क्या बोल रही है बेशरम तेरे बेटे की उमर का है"

आया ने मुस्कुराते हुए कहा- "बेशरम बोलो या फिर जो मन में आये बोलो मगर मालकिन सच बोलु तो मुन्ना बाबु का औजार देख के तो मेरी भी पनिया गई थी"| कह कर चुप हो गई और चौधराईन की दोनो टांगो को फैला कर उसके बिच में बैठ गई। फिर धीरे से अपनी जीभ को बुर की क्लिट पर लगा कर चलाने लगी। चौधराईन ने अपनी जांघो को और ज्यादा फैला दिया, चुत पर आया की जीभ गजब का जादु कर रही थी। आया के पास २५ साल का अनुभव था हाथो से मालिश करने का मगर जब उसका आकर्षण औरतों की तरफ बढा तो धीरे धीरे उसने अपने हाथो के जादु को अपनी जुबान में उतार दिया था। जब वो अपनी जीभ को चुत के उपरी भाग में नुकिला कर के रगडती थी तो शीला देवी की जलती हुई बुर ऐसे पानी छोडती थी जैसे कोइ झरना छोडता था। बुर के एक एक पपोटे को अपने होठों के बिच दबा दबा के ऐसे चुसती थी की शीला देवी के मुंह से बार-बार सिसकारियां फुटने लगी थी। गांड हवा में ४ इन्च उपर उठा-उठा के वो आया के मुंह पर रगड रही थी। शीला देवी काम-वासना की आग में जल उठी थी। आया ने जब देखा मालकिन अब पुरे उबाल पर आ गई है तो उसको जलदी से झडाने के इरादे से उसने अपनी जुबान हटा के फिर कचाक से दो मोटी उन्गलियां पेल दी और गचा-गच अन्दर बाहर करने लगी। आया ने फिर से बातों का सिलसिला शुरु कर दिया

"मालकिन, अपने लिये भी कुछ इन्तजाम कर लो अब"

"क्या मतलब है रीएए तेराआ उईईई श्श्श्शीईई जलदी जलदी हाथ चला साली"

"मतलब तो बडा सीधा सादा है मालकिन, कब तक ऐसे हाथो से करवाती रहोगी"

"तो फिर क्या करु रे, साली ज्यादा दीमाग मत चला हाथ चला"

"मालकिन आपकी बुर मंगती है लंड का रस और आप हो की इसको खीरा ककडी खीला रही हो"

"चुप साली, अब कोइ उमर रही है मेरी ये सब काम करवाने की"

"अच्छा आपको कैसे पता की आपकी उमर बित गई है, जरा सा छु देती हु उसमे तो पनिया जाती है आपकी और बोलती हो अब उमर बित गई"

"नही रे,,, लडका जवान हो गया, बिना मर्द के सुख के इतने दिन बित गये अब क्या अब तो बुढिया हो गई हुं"

"क्या बात करती हो मालकिन, आप और बुढिया ! अभी भी अच्छे अच्छो के कान कट दोगी आप, इतना भरा हुआ नशिला बदन तो इस गांव के आस-पास के चार सौ गांव में ढुंढे नही मिलेगा।"

"चल साली क्यों चने के झाड पर चढा रही है"

"क्या मालकिन मैन् क्यों ऐसा करुन्गी, फिर लडका जवान होने का ये मतलब थोडे ही है की आप बुढिया हो गई हो क्यों अपना सत्यानाश करवा रही हो"

"तु मुझे बिगाडने पर क्यों तुली हुइ है"

आया ने इस पर हस्ते हुए कहा, "थोडा आप बिगडो और थोडा छोटे मालिक को भी बिगडने का मौका दो"

"छी रण्डी कैसी कैसी बाते करती है ! मेरे बेटे पर नजर डाली तो मुंह नोच लुन्गी"

"मालकिन मैं क्या करुन्गी, छोटे मालिक खुद ही कुछ ना कुछ कर देन्गे"

"वो क्यों करेगा रे॥॥॥।वो कुछ नही करने वाला"

"मालकिन बडा मस्त हथियार है छोटे मालिक का, गांव की छोरियां छोडने वाली नही"

"हरामजादी, छोरियों की बात छोड मुझे तो लगता है तु ही उसको नही छोडेगी, शरम कर बेटे की उमर का है
"हाय मालकिन औजार देख के तो सब कुछ भुल जाती हु मैं"

इतनी देर से अपने बेटे की बढाई सुन-सुन के शीला देवी के मन में भी उत्सुकता जाग उठी थी। उसने आखिर आया से पुछ ही लिया ....
" कैसे देख लिया तुने मुन्ना का। "

आया ने अन्जान बनते हुए पुछा, "मुन्ना बाबु का क्या मालकिन। "

फिर आया को चौधराईन की एक लात खानी पडी, फिर चौधराईन ने हसते हुए कहा,
" कमीनी सब समझ के अन्जान बनती है। "

आया ने भी हसते हुए कहा,
" मालकिन मैने तो सोचा की आप अभी तो बेटा बेटा कर रही थी फिर उसके औजार के बारे में कैसे पुछोगी ?। "

आया की बात सुन कर चौधराईन थोडा शरमा गई। उसकी समज में ही नही आ रहा था की क्या जवाब दे. वो आया को, फिर भी उसने थोडा झेपते हुए कहा,
" साली मैं तो ये पुछ रही थी की तुने कैसे देख लिया. '

" मैने बताया तो था मालकिन की छोटे मालिक जीधर गांव की औरतें दिशा-मैदान करने जाती है, उधर घुमते रहते है, फिर ये साली बसन्ती भी उनपे लट्टु हुइ बैठी है। एक दिन शाम में मैं जब पाखाना करने गई थी तो देखा झडियों में खुशुर पुसुर की अवाज आ रही है। मैने सोचा देखु तो जरा कौन है, देखा तो हक्की-बक्की रह गई क्या बताउ, मुन्ना बाबु और बसन्ती दोनो खुशुर पुसुर कर रहे थे। मुन्ना बाबु का हाथ बसन्ती की चोली में और बसन्ती का हाथ मुन्ना बाबु की हाफ पेन्ट में घुसा हुआ था। मुन्न बाबु रिरयाते हुए बसन्ती से बोल रहे थे, ' एक बार अपना माल दिखा दे. ' और बसन्ती उनको मना कर रही थी। "

इतना कह कर आया चुप हो गई और एक हाथ से शीला देवी की चुची दबाते हुए अपनी उन्गलियां चुत के अन्दर तेजी से घुमाने लगी। शीला देवी सिसकारते हुए बोली,
" हा, फिर क्या हुआ, मुन्ना ने क्या किया। " चौधराईन के अन्दर अब उत्सुकता जाग उठी थी.

" मुन्ना बाबु ने फिर जोर से बसन्ती की एक चुची को एक हाथ में थाम लिया और दुसरी हाथ की हथेली को सीधा उसकी दोनो जांघो के बिच रख के पुरी मुठ्ठी में उसकी चुत को भर लिया और फुसफुसाते हुए बोले, ' हाय दीखा दे एक बार, चखा दे अपनी लालमुनीया को बस एक बार रानी फिर देख मैं इस बार मेले में तुझे सबसे महंगा लहंगा खरीद दुन्गा, बस एक बार चखा दे रानी॑. ' , इतनी जोर से चुची दबवाने पर साली को दर्द भी हो रहा होगा मगर साली की हिम्मत देखो एक बार भी छोटे मालिक के हाथ को हटाने की उसने कोशीश नही की, खाली मुंह से बोल रही थी, ' हाय छोड दो मालिक. छोड दो मालिक. ' मगर छोटे मालिक हाथ आई मुर्गी को कहां छोडने वाले थे। "

शीला देवी की बुर एक पसीज रही थी, अपने बेटे की करतुत सुन कर उसे पता नही क्यों गुस्सा नही आ रहा था। उसके मन में एक अजीब तरह का कौतुहल भरा हुआ था। आया भी अपनी मालकिन के मन को खुब समझ रही थी इसलिये वो और नमक मिर्च लगा कर मुन्ना की करतुतों की कहानी सुनाये जा रही थी।

" फिर मालकिन मुन्ना बाबु ने उसके गाल का चुम्मा लिया और बोले, ' बहुत मजा आयेगा रानी बस एक बार चखा दो, हाय जब तुम गांड मटका के चलती हो तो क्या बताये कसम से कलेजे पर छूरी चल जाती है, बसन्ती बस एक बार चखा दो॑. ' बसन्ती शरमाते हुए बोली, ' नही मालिक आपका बहुत मोटा है, मेरी फट जायेगी॑, ' इस पर मुन्ना बाबु ने कहा, ' हाथ से पकडने पर तो मोटा लगता ही है, जब चुत में जायेगा तो पता भी नही चलेगा॑. ' फिर बसन्ती के हाथ को अपनी नीकर से निकाल के उन्होंने झट से अपनी नीकर उतार दी, हाय मालकिन क्या बताउ कलेजा धक-से मुंह को आ गया, बसन्ती तो चीख कर एक कदम पिछे हट गई, क्या भयंकर लौडा था मालिक का एक दम से काले सांप की तरह, लपलपाता हुआ, मोटा मोटा पहाडी आलु के जैसा नुकिला गुलाबी सुपाडा और मालकिन सच कह रही हु कम से कम १० इंच लम्बा और कम से कम २.५ इंच मोटा लौडा होगा छोटे मालिक का, उफफ ऐसा जबरदस्त औजार मैने आज तक नही देखा था, बसन्ती अगर उस समय कोशिश भी करती तो चुदवा नही पाती, वहीं खेत में ही बेहोश हो के मर जाती साली मगर छोटे मालिक का लंड उसकी चुत में नही जाता. "

चौधराईन एक टक गौर से अपने बेटे की काली करतुतों का बखान सुन रही थी। उसका बदन काम-वासना से जल रहा था और आया की वासना भरी बातें जो कहने को तो उसके बेटे के बारे में थी पर फिर भी उसके अन्दर एक अनोखी कसक पैदा कर रही थी। आया को चुप देख कर उस से रहा नही गया और वो पुछ बैठी,
"आगे क्या हुआ। "

आया ने फिर हसते हुए बताया, " अरे मालकिन होना क्या था, तभी अचानक झाडियों में सुरसुराहट हुई, मुन्ना बाबु तो कुछ समझ नही पाये मगर बसन्ती तो चालु है, मालकिन, साली झट से लहंगा समेट कर पिछे की ओर भागी और गायब हो गई। और मुन्ना बाबु जब तक सम्भलते तब तक उनके सामने बसन्ती की भाभी आ के खडी हो गई। अब आप तो जानती ही हो की इस साली लाजवन्ती ठीक अपने नाम की उलट बिना किसी लाज शरम की औरत है। जब साली बसन्ती की उमर की थी और नई नई शादी हो के गांव में आई थी तब से उसने २ साल में गांव के सारे जवान मर्दों के लंड का पानी चख लिया होगा। अभी भी हरामजादी ने अपने आप को बना संवार के रखा हुआ है। " इतना बता कर आया फिर से चुप हो गई।

" फिर क्या हुआ, लाजवन्ती तो खुब गुस्सा हो गई होगी. "

"अरे नही मालकिन, उसे कहां पता चला की अभी अभी २ सेकंड पहले मुन्ना बाबु अपना लंड उसकी ननद को दिखा रहे थे। वो साली तो खुद अपने चक्कर में आई हुइ थी। उसने जब मुन्ना बाबु का बलिश्त भर का खडा मुसलंड देखा तो उसके मुंह में पानी आ गया और मुन्ना बाबु को पटाने के इरादे से बोली ॑यहां क्या कर रहे है छोटे मालिक आप कब से हम गरिबों की तरह से खुले में दिशा करने लगे॑। छोटे मालिक तो बेचारे हक्के बक्के से खडे थे, उनकी समझ में नही आ रहा था की क्या करें, एक दम देखने लायक नजारा था। हाफ पेन्ट घुटनो तक उतरी हुइ थी और शर्ट मोड के पेट पर चढा रखी थी, दोनो जांघो के बिच एक दम काला भुजंग मुसलंड लहरा रहा था ।"

" छोटे मालिक तो बस. ' उह आह उह ' कर के रह गये। तब तक लाजवन्ती छोटे मालिक के एक दम पास पहुंच गई और बिना किसी जिझक या शरम के उनके हथियार को पकड लिया और बोली, 'क्या मालिक कुछ गडबड तो नही कर रहे थे पुरा खडा कर के रखा हुआ है। इतना क्यों फनफना रहा है आपका औजार, कहीं कुछ देख तो नहि लिया॑। ' इतना कह कर हसने लगी ।"

"छोटे मालिक के चेहरे की रंगत देखने लायक थी। एक दम हक्के-बक्के से लाजवन्ती का मुंह ताके जा राहे थे। अपना हाफ पेन्ट भी उन्होंने अभी तक नही उठाया था। लाजवन्ती ने सीधा उनके मुसल को अपने हाथो में पकड लिया और मुस्कुराती हुइ बोली ॑क्या मालिक औरतन को हगते हुए देखने आये थे क्या॑ कह कर खी खी कर के हसते हुए मुन्ना बाबु के औजार को ऐसे कस के मसला साली ने की उस अन्धेरे में भी मालिक का लाल लाल मोटे पहाडी आलु जैसा सुपाडा एक दम से चमक गया जैसे की उसमें बहुत सारा खून भर गया हो और लौडा और फनफना के लहरा उठा"।

"बडी हरामखोर है ये लाजवन्ती, साली को जरा भी शरम नही है क्या"

"जिसने सारे गांव के लौंडो क लंड अपने अन्दर करवाये हो वो क्या शरम करेगी"

"फिर क्या हुआ, मेरा मुन्ना तो जरुर भाग गया होगा वहां से बेचारा"

"मालकिन आप भी ना हद करती हो अभी २ मीनट पहले आपको बताया था की आपका लाल बसन्ती के चुचो को दबा रहा था और आप अब भी उसको सीधा सीधा समझ रही हो, जबकी उन्होंने तो उस दिन वो सब कर दिया जिसके बारे में आपने सपने में भी नही सोचा होगा"

चौधराईन एक दम से चौंक उठी, "क्या कर दिया, क्यों बात को घुमा फिरा रही है"

"वही किया जो एक जवान मर्द करता है "

"क्यों झुट्त बोलती हो, जलदी से बताओ ना क्या किया"

" छोटे मालिक में भी पुरा जोश भरा हुआ था और उपर से लाजवन्ती की उकसाने वाली हरकते दोनो ने मिल कर आग में घी का काम किया।" लाजवन्ती बोली "छोरियों को पेशाब और पाखाना करते हुए देख कर हिलाने की तैय्यारी में थे क्या, या फिर किसी लौन्डिया के इन्तेजार में खडा कर रखा है॑ मुन्ना बाबु क्या बोलते पर उनके चेहरे को देख से लग रहा था की उनकी सांसे तेज हो गयी है। उन्होंने भी अब की बार लाजवन्ती के हाथो को पकड लिया और अपने लंड पर और कस के चीपका दिया और बोले 'हाय भौजी मैं तो बस पेशाब करने आया था॑'| इस पर वो बोली ॑तो फिर खडा कर के क्यों बैठे हो मालिक कुछ चाहीये क्या॑ मुन्ना बाबु की तो बांछे खिल गई। खुल्लम खुल्ला चुदाई का निमंत्रण था। झट से बोले चाहीये तो जरुर अगर तु दे दे तो मेले में से पायल दिलवा दुन्गा॑। खुशी के मारे तो साली लाजवन्ती क चेहरा चमकने लगा, मुफ्त में मजा और माल दोनो मिलने के आसार नजर आ रहे थे। झट से वहीं पर घास पर बैठ गई और बोली ॑हाय मालिक कितना बडा और मोटा है आपका, कहां कुवांरीओ के पिछे पडे रहते हो, आपका तो मेरे जैसी शादी शुदा औरतो वाला औजार है, बसन्ती तो साली पुरा ले भी नही पायेगी॑ छोटे मालिक बसन्ती का नाम सुन के चौंक उठे की इसको कैसे पता बसन्ती के बारे में। लाजवन्ती ने फिर से कहा ॑ कितना मोटा और लम्बा है, ऐसा लौडा लेने की बडी तमन्ना थी मेरी॑ इस पर छोटे मालिक ने नीचे बैठ ते हुए कहा आज तमन्ना पुरी कर ले, बस चखा दे जरा सा, बडी तलब लगी है॑ इस पर लाजवन्ती बोली जरा सा चखना है या पुरा मालिक॑ तो फिर मालिक बोले हाय पुरा चखा दे मेले से तेरी पसंद की पायल दिलवा दुन्गा॑।

आया की बात अभी पुरी नही हुइ थी की चौधराईन बिच में बोल पडी "ओह मेरी तो किस्मत ही फुट गई, मेरा बेटा रण्डीयों पर पैसा लुटा रहा है, किसी को लहंगा तो किसी हरामजादी को पायल बांट रहा है, " कह कर आया को फिर से एक लात लगायी और थोडे गुस्से से बोली, "हरामखोर, तु ये सारा नाटक वहां खडी हो के देखे जा रही थी, तुझे जरा भी मेरा खयाल नही आया, एक बार जा के दोनो को जरा सा धमका देती दोनो भाग जाते।" आया ने मुंह बिचकाते हुए कहा, "शेर के मुंह के आगे से निवाला छिनने की औकात नही है मेरी मालकिन मैं तो बुस चुप चाप तमाशा देख रही थी।" कह कर आया चुप हो गई और बुर की मालिश करने लगी। चौधराईन के मन की उत्सुकता दबाये नही दब रही थी कुछ देर में खुद ही कसमसा कर बोली, " चुप क्यों हो गई आगे बता ना "

" फिर क्या होना था मालकिन, लाजवन्ती वहीं घास पर लेट गई और छोटे मालिक उसके उपर, दोनो गुत्थम गुत्था हो रहे थे। कभी वो उपर कभी मालिक उपर। छोटे मालिक ने अपना मुंह लाजवन्ती की चोली में दे दिया और एक हाथ से उसके लहेंगे को उपर उठा के उसकी बुर में उन्गली दाल दी, लाजवन्ती के हाथ में मालिक का मोटा लौडा था और दोनो चिपक चिपक के मजा लुटने लगे। कुछ देर बाद छोटे मालिक उठे और लाजवन्ती की दोनो टांगो के बिच बैठ गये। उस छिनाल ने भी अपनी साडी को उपर उठा दिया और दोनो टांगो को फैला दिया। मुन्ना बाबु ने अपना मुसलंड सीधा उसकी चुत के उपर रख के धक्का मार दिया। साली चुद्दकडी एक दम से मीमीयाने लगी। ईतना मोटा लौडा घुसने के बाद तो कोइ कितनी भी बडी रण्डी हो उसकी हेकडी तो एक पल के लिये गुम हो ही जाती है। पर मुन्ना बाबु तो नया खून है, उन्होंने कोइ रहम नही दिखाया, उलटा और कस कस के धक्के लगाने लगे. "

" ठिक किया मुन्ना ने, साली रण्डी की यही सजा है. " चौधराईन ने अपने मन की खून्नस निकाली, हालांकी उसको ये सुन के बडा मजा आ रहा था की उसके बेटे के लौडे ने एक रण्डी के मुण्ह से भी चीखे निकलवा दी।

" कुछ धक्को के बाद तो मालकिन साली चुदैल ऐसे अपनी गांड को उपर उछालने लगी और गपा गप मुन्ना बाबु के लौडे को निगलते हुए बोल रही थी, ' हाय मालिक फाड दो, हाय ऐसा लौडा आज तक नही मीला, सीधा बच्चेदानी को छु रहा है, लगता है मैं ही चौधरी के पोते को पैदा करुन्गी, मारो कस कस के॑..' मुन्ना बाबु भी पुरे जोश में थे, गांड उठा उठा के ऐसा धक्का लगा रहे थे की क्या कहना, जैसे चुत फाड के गांड से लौडा निकाल देंगे, दोनो हाथ से चुचीयां मसल रहे थे और, पका पक लौडा पेल रहे थे। लाजवन्ती साली सिसकार रही थी और बोल रही थी, ' मालिक पायल दिलवा देना फिर देखना कीतना मजा करवाउन्गी, अभी तो जल्दी में चुदाई हो रही है, मारो मालिक, इतने मोटे लंड वाले मालिक को अब नही तरसने दुन्गी, जब बुलओगे चली आउन्गी, हाय मालिक पुरे गांव में आपके लंड के टक्कर का कोई नही है॑।' " इतना कह कर आया चुप हो गई।

आया ने जब लाजवन्ती के द्वारा कही गई ये बात की, पुरे गांव में मुन्ना के लंड के टक्कर का कोई नही है सुन कर चौधराईन के माथे पर बल पड गये। वो सोचने लगी की क्या सच में ऐसा है। क्या सच में उसके लडके का लंड ऐसा है, जो की पुरे गांव के लंडो से बढ कर है। वो थोडी देर तक चुप रही फिर बोली, " तु जो कुछ भी मुझे बता रही है वो सच है ना ? "

" हां मालकिन सौ-फीसदी सच बोल रही हु. "

" फिर भी एक बात मेरी समझ में नही आती की मुन्ना का इतना बडा कैसे हो सकता है जितना बडा तु बता रही है. "

" क्यों मालकिन ऐसा क्यों बोल रही हो आप ? "

" नही ऐसे ही मैं सोच रही हु इतना बडा आम तौर पे होता तो नही, फिर तेरे मालिक के अलावा और किसी के साथ ......." बात अधुरी छोड कर चौधराईन चुप हो गई।

आया सब समझ गई और धीरे से मुस्कुराती हुइ बोली, " अरे मालकिन, कोइ जरुरी थोडे ही है की जीतना बडा चौधरी साहब का होगा उतना ही बडा छोटे मालिक का भी होगा, चौधरी साहब का तो कद भी थोडा छोटा ही है मगर छोटे मालिक को देखो इसी उमर में पुरे ६ फीट के हो गये है।" बात थोडी बहुत चौधराईन के भेजे में भी घुस गई, मगर अपने बेटे के अनोखे हथियार को देखने की तमन्ना भी शायद उसके दिल के किसी कोने में जाग उठी थी।

मुन्ना उसी समय घर के आंगन से मां ..... मां ..... पुकारता हुआ अपनी मां के कमरे की ओर दौडता हुआ आया और पुरी तेजी के साथ भडाक से चौधराईन के कमरे के दरवाजे को खोल के अन्दर घुस गया। अन्दर घुसते ही उसकी आंखे चौंधिया गई। कलेजे पर जैसे बिजली गीर गई। मुंह से बोल नही फुट रहे थे। चौधराईन लगभग पुरी नंगी और आया अधनंगी हो के बैठी थी। मुन्ना की आंखों ने एक पल में ही अपनी मां का पुरा मुआयना कर डाला। ब्लाउस खुला हुआ था दोनो बडी बडी गोरी गोरी नारियल के जैसी चुचियां अपनी चोंच को उठाये खडी थी , साडी उपर उठी हुइ थी और मोटे मोटे कन्दील के खम्भे जैसी जांघे ट्युब लैट की रोशनी में चमक रही थी। काले घने झाण्टों के जंगल में घीरी चुत तो नही दीख रही थी मगर उन झांटों के उपर लगा चुत का रस अपनी कहानी बयान कर रहा था। ना तो आया ना ही चौधराईन के मुंह से कोई कुछ निकला। कुछ देर तक ऐसे ही रहने के बाद आया को जैसे कुछ होश आया उसने जलदी से जांघो पर साडी खींच दी और साडी के पल्लु से दोनो चुचियों को ढक दिया। अपने नंगे अंगो के ढके जाने पर चौधराईन को जैसे होश आया वो झट से अपने पैरो को समेट ते हुए उठ कर बैठ गई। चुचियों को अच्छी तरह से ढकते हुए झेंप मिटाते हुए बोली,
" क्या बात है मुन्ना, क्या चाहीये।"

मां की आवाज सुन मुन्ना को भी एक झटका लगा और उसने अपना सर नीचे करते हुए कहा,
" कुछ नही मैं तो पुछने आया था की, शाम में फंकशन कब शुरु होगा मेरे दोस्त पुछ रहे थे. "

शीला देवी अब अपने आप को संभाल चुकी थी और अब उसके अंदर ग्लानि और गुस्सा दोनो भावो पैदा हो गये थे। उसने धीमे स्वर में जवाब दिया,
" तुझे पता नही है क्या जो ६-७ बजे से फंकशन शुरु हो जायेगा। और क्या बात थी. "

" वो मुझे भूख भी लगी थी. "

" तो नौकरानी से मांग लेना था, जा उस को बोल के मांग ले. "

मुन्ना वहां से चला गया। आया ने झट से उठ कर दरवाजा बन्ध किया और चौधराईन ने अपने कपडे ठीक किये। आया बोलने लगी की,
" दरवाजा तो ठीक से बन्ध ही था मगर लगता है, पुरी तरह से बन्ध नही हुआ था, पर इतना ध्यान रखने की जरुरत तो कभी रही नही क्यों की आम तौर पर आपके कमरे में तो कोइ आता नही, "

" चल जाने दे जो हुआ सो हुआ क्या कर सकते है. "

इतना बोल कर चौधराईन चुप हो गई मगर उसके मन में एक गांठ बन गई और अपने ही बेटे के सामने नंगे होने का अपराधबोध उस पर हावी हो गया।

मुन्ना जब अपनी मां के कमरे से निकला तब उसका दिमाग एक दम से काम नही कर रहा था। उसने आज तक अपनी मां का ऐसा रुप नही देखा था। मतलब नंगा तो कभी नही देखा था। मगर आज शीला देवी का जो सुहाना रुप उसके सामने आया था उसने तो उसके होश उडा दिये थे। वो एक बदहवाश हो चुका था। मां की गोरी गोरी मखमली जांघे और आल्फोन्सो आम के जैसी चुचीयों ने उसके होश उडा दिये थे। उसके दिमाग में रह रह कर मोटी जांघो के बिच की काली-काली झांटे उभर जाती थी। उसकी भुख मर चुकी थी। वो सीधा अपने कमरे में चला गया और दरवाजा बन्ध कर के तकियों के बिच अपने सर को छुपा लिया। बन्ध आंखो के बिच जब मां के खुबसुरत चेहरे के साथ उसकी पलंग पर अस्त-व्यस्त हालत में लेटी हुइ तसवीर जब उभरी तो धीरे-धीरे उसके लंड में हरकत होने लगी।

वैसे अपने मुन्ना बाबु कोई सीधे-सादे सन्त नहि है, इतना तो पता चल गया होगा। मगर आपको ये जान कर आश्चर्य होगा की अब से २ साल पहले तक सच मुच में अपने मुन्ना बाबु उर्फ राजेश उर्फ राजु बडे प्यारे से भोले भाले लडके हुआ करते थे। जब १५ साल के हुए और अंगो में आये परिवर्तन को समझने लगे तब बेचारे बहुत परेशान रहने लगे। लण्ड बिना बात के खडा हो जाता था। पेशाब लगी हो तब भी और मन में कुछ खयाल आ जाये तब भी। करे तो क्या करे। स्कूल में सारे दोस्तो ने अंडरविअर पहनना शुरु कर दिया था। मगर अपने भोलु राम के पास तो केवल पेन्ट थी। कभी अंडरविअर पहना ही नही था। लंड भी मुन्ना बाबु का औकात से कुछ ज्यादा ही बडा था, फुल-पेन्ट में तो थोडा ठीक रहता था पर अगर जनाब पजामे में खेल रहे होते तो, दौडते समय इधर उधर डोलने लगता था। जो की उपर दिखता था और हाफ पेन्ट में तो और मुसिबत होती थी अगर कभी घुटने मोड कर पलंग पर बैठे हो तो जांघो के पास के ढीली मोहरी से अन्दर का नजारा दिख जाता था। बेचारे किसी को कह भी नही पाते थे की मुझे अंडरविअर ला दो क्योंकि रहते थे मामा-मामी के पास, वहां मामा या मामी से कुछ भी बोलने में बडी शरम आती थी। गांव काफी दिनो से गये नही थे। बेचारे बडे परेशान थे।

सौभाग्य से मुन्ना बाबु की मामी हसमुख स्वभाव की थी और अपने मुन्ना बाबु से थोडा बहुत हसीं-मजाक भी कर लेती थी। उसने कई बार ये नोटिस किया था की मुन्ना बाबु से अपना लंड सम्भाले नही सम्भल रहा है। सुबह-सुबह तो लग-भग हर रोज उसको मुन्ना के खडे लंड के दर्शन हो जाते थे। जब मुन्ना को उठाने जाती और वो उठ कर दनदनाता हुआ सीधा बाथरुम की ओर भागता था। मुन्ना की ये मुसिबत देख कर मामी को बडा मजा आता था। एक बार जब मुन्ना अपने पलंग पर बैठ कर पढाई कर रहा था तब वो भी उसके सामने पलंग पर बैठ गई। मुन्ना ने उस दिन संयोग से खुब ढीला-ढाला हाफ पेन्ट पहन रखा था। मुन्ना पलाठी मार कर बैठ कर पढाई कर रहा था। सामने मामी भी एक मेगेजीन खोल कर देख रही थी। पढते पढते मुन्ना ने अपना एक पैर खोल कर घुटने के पास से हल्का सा मोड कर सामने फैला दिया। इस स्थिती में उसके जांघो के पास की हाफ-पेन्ट की मोहरी निचे ढुलक गई और सामने से जब मामीजी की नजर पडी तो वो दंग रह गई। मुन्ना बाबु का मुस्टंडा लण्ड जो की अभी सोयी हुई हालत में भी करीब तीन-चार इंच लंबा दिख रहा था अपने लाल सुपाडे की आंखो से मामीजी की ओर ताक रहा था।

उर्मिलाजी (मुन्ना बाबु की मामी) इस नजारे को ललचाई नजरों से एकटक देखे जा रही थी। उसकी आंखे वहां से हटाये नही हट रही थी। वो सोचने लगी की जब इस छोकरे का सोया हुआ है, तब इतना लंबा दिख रहा है तो जब जाग कर खडा होता होगा तब कितना बडा दिखता होगा। उसके पति यानी की मुन्ना के मामा का तो बामुश्किल साढे पांच इंच का था। अब तक उसने मुन्ना के मामा के अलावा और किसी का लंड नही देखा था मगर इतनी उमर होने के कारण इतना तो ग्यान था ही की मोटे और लंबे लंड कितना मजा देते है। कुछ देर तक दोनो ऐसे ही शर्मिन्दगी के अहसास में डुबे हुए बैठे रहे फिर उर्मिला देवी वहां से उठ कर चली गई।

उस दिन की घटना ने दोनो के बिच एक हिचक की दिवार खडी कर दी। दोनो अब जब बाते करते तो थोडा नजरे चुरा कर करते थे। उर्मिला देवी अब राजु को बडा गौर से देखती थी। पजामे में उसके हिलते-डुलते लंड और हाफ पेन्ट से झांकते हुए लौडे को देखने की फिराक में रहती थी। राजु भी सोच में डुबा रहता था की मामी उसके लौडे को क्यों देखती और ताकती रहती थी। ऐसा वो क्यों कर रही थी। बडा परेशान था बेचारा। मामीजी भी अलग फिराक में लग गई थी। वो सोच रही थी क्या ऐसा हो सकता है की मैं राजु के इस मस्ताने हथियार का मजा चख सकुं ? कैसे क्या करे ये उनकी समझ में नही आ रहा था। फिर उन्होंने एक रास्ता खोजा।

अब उर्मिला देवी ने नजरे चुराने की जगह राजु से आंखे मिलाने का फैसला कर लिया था। वो अब राजु की आंखो में अपने रुप की मस्ती घोलना चाहती थी। देखने में तो वो माशा-अल्लाह शुरु से खुबसुरत थी। राजु के सामने अब वो खुल कर अंग प्रदर्शन करने लगी थी। जैसे जब भी वो राजु के सामने बैठती थी तो अपनी साडी को घुटनो तक उपर उठा कर बेठती, साडी का आंचल तो दिन में ना जाने कितनी बार ढुलक जाता था (जबकी पहले ऐसा नही होता था), झाडु लगाते समय तो ब्लाउस के दोनो बटन खुले होते थे और उनमे से उनकी मस्तानी चुचियां झलकती रहती थी। बाथरुम से कई बार केवल पेटीकोट और ब्लाउस या ब्रा में बाहर निकल कर अपने बेडरुम में सामान लाने जाती फिर वापस आती फिर जाती फिर वापस आती। नहाने के बाद बाथरुम से केवल एक लंबा वाला तौलिया लपेट कर बाहर निकल जाती थी। बेचारा राजु बिच ड्राइंग रुम में बैठा ये सारा नजारा देखता रहता था। लडकीयों को देख कर उसका लंड खडा तो होने लगा था मगर कभी सोचा नही था की मामी को देख के भी लंडा खडा होगा। लंड तो लंड है वो कहां कुछ देखता है। उसको अगर चिकनी चमडी वाला खुबसुरत बदन दिखेगा तो खडा तो होगा ही। मामीजी उसको ये दिखा रही थी और वो खडा हो रहा था।

राजु को उसी दौरान मस्तराम की एक किताब हाथ लग गई। किताब पढ कर जब लंड खडा हुआ और उसको मुठीया कर जब अपना पानी निकाला तो उसकी तीसरी आंख खुल गई। उसकी समझ में आ गया की चुदाई क्या होती है और उसमे कितना मजा आ सकता है। जब किताब पढ के कल्पना करने और मुठीयाने में इतना मजा है तो फिर सच में अगर बुर में लंड डालने को मिले तो कितना मजा आयेगा। मस्तराम की किताबों में तो रिश्तों में चुदाई की कहानियां भी होती है और एक बार जो वो किताब पढ लेता है फिर रिश्ते की औरतो के बारे में उलटी सीधी बाते सोच ही लेता है चाहे वो ऐसा ना सोचने के लिये कितनी भी कोशिश करे। वही हाल अपने राजु बाबा का भी था। वो चाह रहे थे की अपनी मामी के बारे में ऐसा ना सोचे मगर जब भी वो अपनी मामी के चिकने बदन को देखता तो ऐसा हो जाता था। मामी भी यही चाह रही थी। खुब छलका छलका के अपना बदन दिखा रही थी।

बाथरुम से पेशाब करने के बाद साडी को जांघो तक उठाये बाहर निकल जाती थी। राजु की ओर देखे बिना साडी और पेटीकोट को वैसे ही उठाये हुए अपने कमरे में जाती और फिर चुकने की एक्टींग करते हुए हल्के से मुस्कुराते हुए साडी को निचे गीरा देती थी। राजु भी अब हर रोज इन्तजार करता था की कब मामी झाडु लगायेगी और अपनी गुदाज चुचीयों के दर्शन करायेगी या फिर कब वो अपनी साडी उठा के उसे अपनी मोटी-मोटी जांघो के दर्शन करायेगी। मस्तराम की किताबे तो अब वो हर रोज पढता था। ग्यान बढने के साथ अब उसके दिमाग में हर रोज नई नई तरकीब सुझने लगी की कैसे मामी को पटाया जाये। साडी उठा के उनकी चुत के दर्शन किये जाये और हो सके तो उसमें अपने हलाब्बी लौडे को प्रविष्ट कराया जाये और एक बार ही सही मगर चुदाई का मजा लिया जाये। सभी तरह की तरकीबो को सोचने के बाद उनकी छोटी बुद्धी ने या फिर ये कहें की उनके लंड ने क्योंकि चुदाई की आग में जलता हुआ छोकरा लंड से सोचने लगता है, एक तरकीब खोज ली ...................

एक दिन मामीजी बाथरुम से तौलिया लपेटे हुए निकली, हर रोज की तरह मुन्ना बाबु उनको एक टक घुर घुर कर देखे जा रहे थे। तभी मामी ने राजु को आवाज दी,
" राजु जरा बाथरुम में कुछ कपडे है, मैने धो दिये है जरा बाल्कनी में सुखने के लिये डाल दे। "

राजु जो की एक टक मामीजी की गोरी चिकनी जांघो को देख के आनन्द लुट रहा था को झटका सा लगा, हडबडा के नजरे उठाई और देखा तो सामने मामी अपनी छातीयों पर अपने तौलिये को कस के पकडे हुए थी।

मामी ने हसते हुए कहा, "जा बेटा जल्दी से सुखने के लिये डाल दे नहि तो कपडे खराब हो जायेंगे. "

राजु उठा और जल्दी से बाथरुम में घुस गया। मामी को उसका खडा लंड पजामे में नजर आ गया। वो हसते हुए चुप चाप अपने कमरे में चली गई। राजु ने कपडो की बालटी उठाई और फिर बाल्कनी में जा कर एक एक करके सुखाने के लिये डालने लगा। मामी की पेन्टी और ब्रा को सुखाने के लिये डालने से पहले एक बार अच्छी तरह से छु कर देखता रहा फिर अपने होठों तक ले गया और सुंघने लगा। तभी मामी कमरे से निकली तो ये देख कर जल्दी से उसने वो कपडे सुखने के लिये डाल दिये।

शाम में जब सुखे हुए कपडो को उठाते समय राजु भी मामी की मदद करने लगा। राजु ने अपने मामा का सुखा हुआ अंडरवियर अपने हाथ में लिया और धीरे से मामी के पास गया। मामी ने उसकी ओर देखते हुए पुछा,
"क्या है, कोई बात बोलनी है ?"

राजु थोडा सा हकलाते हुए बोला, " माआम्म्मी ...... एक बात बोलनी थी. "

"हा तो बोल ना. "

"मामी मेरे सारे दोस्त अब बबबबबब् ......"

" अब क्या ...... ? " , उर्मिला देवी ने अपनी तीखी नजरे उसके चेहरे पर गडा रखी थी।

" मामी मेरे सारे दोस्त अब अं ...... अंडर ...... अंडरवियर पहेनते है. "

मामी को हसी आ गई, मगर अपनी हसी रोकते हुए पुछी, "हा तो इसमे क्या है सभी लडके पहेनते है. "

" पर पर मामी मेरे पास अंडरवियर नही है. "

मामी एक पल के लिये ठीठक गई और उसका चेहरा देखने लगी। राजु को लग रहा था इस पल में वो शरम से मर जायेगा उसने अपनी गरदन निचे झुका ली।

उर्मिला देवी ने उसकी ओर देखते हुए कहा, " तुझे भी अंडरवियर चाहीये क्या ? "

" हा मामी मुझे भी अंडरवियर दिलवा दो ना !!"

" हम तो सोचते थे की तु अभी बच्चा है, मगर, ", कह कर वो हसने लगी।

राजु ने इस पर बुरा सा मुंह बनाया और रोआंसा होते हुए बोला, " मेरे सारे दोस्त काफी दिनो से अंडरवियर पहन रहे है, मुझे बहुत बुरा लगता है बिना अंडरवियर के पेन्ट पहनना। "

उर्मिला देवी ने अब अपनी नजरे सीधे पेन्ट के उपर टीका दी और हल्की मुस्कुराहट के साथ बोली, " कोई बात नही, कल बाजार चलेंगे साथ में। "

राजु खुश होता हुआ बोला, " थेंक यु मामी।"

फिर सारे कपडे समेट दोनो अपने अपने कमरो में चले गये।

वैसे तो राजु कई बार मामी के साथ बाजार जा चुका था। मगर आज कुछ नई बात लग रही थी। दोनो खुब बन संवर के निकले थे। उर्मिला देवी ने आज बहुत दिनो के बाद काले रंग की सलवार कमीज पहन रखी थी और राजु को टाईट जीन्स पहनवा दिया था। हांलाकी राजु अपनी ढीली पेन्ट ही पहेनना चाहता था मगर मामी के जोर देने पर बेचार क्या करता। कार मामी खुद ड्राईव कर रही थी। काली सलवार कमीज में बहुत सुंदर लग रही थी। हाई हील की सेंडल पहन रखी थी। टाईट जीन्स में राजु का लंड निचे की तरफ हो कर उसकी जांघो से चिपका हुआ एक केले की तरह से साफ पता चल रहा था। उसने अपनी टी-शर्ट को बहार निकाल लिया पर जब वो कार में मामी की बगल में बैठा तो फिर वही ढक के तीन पत, सब कुछ दिख रहा था। मामी अपनि तिरछी नजरो से उसको देखते हुए मुस्कुरा रही थी। राजु बडी परेशानी महसुस कर रहा था। खैर मामी ने कार एक दुकान पर रोक ली। वो एक बहुत ही बडी दुकान थी। दुकान में सारे सेल्स-रिप्रेसेन्टिव लडकियां थी।

एक सेल्स-गर्ल के पास पहुंच कर मामी ने मुस्कुराते हुए उस से कहा,
" इनके साईज का अंडरवियर दिखाइये।"

सेल्स-गर्ल ने घुर कर उसकी ओर देखा जैसे वो अपनी आंखो से ही उसकी साईज का पता लगा लेगी। फिर राजु से पुछा, " आप बनियान कितने साईज का पहनते हो। "

राजु ने अपना साईज बता दिया और उसने उसी साईज का अंडरवियर ला कर उसे ट्रायल रुम में ले जा कर ट्राय करने को कहा। ट्रायल रुम में जब राजु ने अंडरवियर पहना तो उसे बहुत टाईट लगा। उसने बाहर आ कर नजरे झुकाये हुए ही कहा,
" ये तो बहुत टाईट है। "

इस पर मामी हसने लगी और बोली, "हमारा राजु बेटा निचे से कुछ ज्यादा ही बडा है, एक साईज बडा ला दो। "

उर्मिला देवी की ये बात सुन कर सेल्स-गर्ल का चेहरा भी लाल हो गया। वो हडबडा कर पिछे भागी और एक साईज बडा अंडरवियर ला कर दे दिया और बोली,

" पेक करा देती हु ये फिट आ जायेगी। "

मामी ने पुछा, " क्यों राजु एक बार और ट्राय करेगा या फिर पेक करवा ले। "

" नहि पेक करवा लिजीये. '

" ठीक है, दो अंडरवियर पेक कर दो, और मेरे लिये कुछ दिखाओ। "

मामी के मुंह से ये बात सुन कर राजु चौंक गया। मामी क्या खरिदना चाहती है अपने लिये। यहां तो केवल पेन्टी और ब्रा मिलेगी। सेल्स-गर्ल मुस्कुराते हुए पिछे घुमी और मामी के सामने गुलाबी, काले, सफेद, नीले रंगो के ब्रा और पेन्टीयों का ढेर लगा दिया। मामी हर ब्रा को एक एक कर के उठाती जाती और फैला फैला कर देखती फिर राजु की ओर घुम कर जैसे की उस से पुछ रही हो बोलती, " ये ठिक रहेगी क्या, मोटे कपडे की है, सोफ्ट नहि है. " य फिर " इसका कलर ठीक है क्या.. "

राजु हर बात पर केवल अपना सर हिला कर रह जाता था। उसका तो दिमाग घुम गया था। उर्मिला देवी पेन्टीयों को उठा उठा के फैला के देखती। उनकी इलास्टिक चेक करती फिर छोड देती। कुछ देर तक ऐसे ही देखने के बाद उन्होने तीन ब्रा और तीन पेन्टीयां खरीद ली। राजु को तीनो ब्रा और पेन्टीयां काफी छोटी लगी। मगर उसने कुछ नही कहा। सारा सामान पेक करवा कर कार की पिछली सीट पर डालने के बाद मामी ने पुछा,
" अब कहां चलना है ? "

राजु ने कहा, " घर चलिये, अब और कहां चलना है। "

इस पर मामी बोली, "अभी घर जा कर क्या करोगे चलो थोडा कहीं घुमते है। "

" ठीक है. " ,कह कर राजु भी कार में बैठ गया।

फिर उसका टी-शर्ट थोडा सा उंचा हो गया पर इस बार राजु को कोई फिकर नही थी। मामी ने उसकी ओर देखा और देख कर हल्के से मुस्कुराई। मामी से नजरे मिलने पर राजु भी थोडा सा शरमाते हुए मुस्कुराया फिर खुद ही बोल पडा,
" वो मैं ट्रायल रुम में जा कर अंडरवियर पहन आया था। "

मामी इस पर हसते हुए बोली, "वाह रे छोरे बडा होशियार निकला तु तो, मैने तो अपना ट्राय भी नही किया और तुम पहन कर घुम भी रहे हो, अब कैसा लग रहा है ? "

" बहुत कम्फर्टेबल लग रहा है, बडी परेशानी होती थी ! "

" मुझे कहां पता था की इतना बडा हो गया है, नहि तो कब की दिला देती. "

मामी की इस दुहरे अर्थ वाली बात को समझ कर मुन्ना बेचारा चुपचाप मुस्कुरा कर रह गया। मामी कार ड्राईव करने लगी। घर पर मामा और बडी बहन काजल दोनो नहि थे। मामा अपनी बिजनेस टुर पर और काजल कोलेज ट्रीप पर गये थे। सो दोनो मामी-भांजा शाम के सात बजे तक घुमते रहे। शाम में कार पार्कींग में लगा कर दोनो मोल में घुम रहे थे की बारीश शुरु हो गई। बडी देर तक तेज बारीश होती रही। जब ८ बजने को आया तो दोनो ने मोल से पार्कींग तक का सफर भाग कर तय करने की कोशीश की, और इस चक्कर में दोनो के दोनो पुरी तरह से भीग गये। जल्दी से कार का दरवाजा खोल झट से अन्दर घुस गये। मामी ने अपने गीले दुपट्टे से ही अपने चेहरे और बांहो को पोंछा और फिर उसको पिछली सीट पर फेंक दिया। राजु ने भी हेन्की से अपने चेहरे को पोंछ लिया।

मामी उसकी ओर देखते हुए बोली, " पुरे कपडे गीले हो गये. "

" हां, मैं भी गीला हो गया हुं। "

बारीश से भीग जाने के कारण मामी की कमीज उनके बदन से चिपक गई थी और उनकी सफेद ब्रा के स्ट्रेप नजर आ रहे थे। कमीज चुंकी स्लीवलेस थी इसलीये मामी की गोरी गोरी बांहे गजब की खुबसुरत लग रही थी। उन्होंने दाहिनी कलाई में एक पतला सा सोने का कडा पहन रखा था और दुसरे हाथ में पतले स्ट्रेप की घडी बांध रखी थी। उनकी उन्गलियां पतली पतली थी और नाखून लंबे लंबे थे जीन पर पिंक कलर की चमकीली नेईल पोलिश लगी हुई थी। स्टियरिंग को पकडने के कारण उनका हाथ थोडा उंचा हो गया था जीस के कारण उनकी चिकनी चिकनी कांखो के दर्शन भी राजु को आराम से हो रहे थे। बारीश के पानी से भीग कर मामी का बदन और भी सुनहरा हो गया था। बालों की एक लट उनके गालों पर अठखेलियां खेल रही थी। मामी के इस खुबसुरत रुप को निहार कर राजु का लंड खडा हो गया था।

घर पहुंच कर कार को पर्कींग में लगा कर लोन पार करते हुए दोनो घर के दरवाजे की ओर चल दिये। बारीश दोनो को भिगा रही थी। दोनो के कपडे बदन से पुरी तरह से चिपक गये थे। मामी की कमीज उनके बदन से चिपक कर उनकी चुचियों को और भी ज्यादा उभार रही थी। चुस्त सलवारा उनके बदन उनकी जांघो से चीपक कर उनकी मोटी जांघो का मदमस्त नजार दिखा रही थी। कमीज चिपक कर मामी के गांड की दरार में घुस गई थी। राजु पिछे पिछे चलते हुए अपने लंड को खडा कर रहा था। तभी लोन की घास पर मामी का पैर फिसला और वो पिछे की तरफ गीर पडी। उनका एक पैर लग भग मुड गया था और वो राजु के उपर गीर पडी जो ठीक उनके पिछे चल रहा था। मामी राजु के उपर गीरी हुइ थी। मामी के मदमस्त चुतड राजु के लंड से सट गये। मामी को शायद राजु के खडे लंड का एहसास हो गया था उसने अपने चुतडो को लंड पर थोडा और दबा दिया और फिर आराम से उठ गई। राजु भी उठ कर बैठ गया।

मामी ने उसकी ओर मुस्कुराते हुए देखा और बोली, " बारीश में गीरने का भी अपना अलग ही मजा है। "

" कपडे तो पुरे खराब हो गये मामी. "

" हा, तेरे नये अंडरवियर का अच्छा उदघाटन हो गया. "

राजु हसने लगा। घर के अन्दर पहुंच कर जल्दी से अपने अपने कमरो की ओर भागे। राजु ने फिर से हाफ पेन्ट और एक टी-शर्ट डाल ली और गन्दे कपडो को बाथरुम में डाल दिया। कुछ देर में मामी भी अपने कमरे से निकली। मामी ने अभी एक बडी खुबसुरत सी गुलाबी रंग की नाईटी पहन रखी थी। मेक्षी के जैसी स्लिवलेस नाईटी थी। नाईटी कमर से उपर तक तो ट्रान्सपरेन्ट लग रही थी मगर उसके निचे शायद मामी ने नाईटी के अन्दर पेटीकोट पहन रखा था इसलिये वो ट्रान्सपरेन्ट नही दीख रही थी।

उर्मिला देवी किचन में घुस गई और राजु ड्राईंग रुम में मस्ती से बैठ कर टेलीवीजन देखने लगा। उसने दुसरा वाला अंडरवियर भी पहन रखा था अब उसे लंड के खडा होने पर पकडे जाने की कोई चिन्ता नही थी। किचन में दिन की कुछ सब्जीयां और दाल पडी हुई थी। चावल बना कर मामी उसके पास आई और बोली,
" चल कुछ खाना खा ले। "

खाना खा कर सारे बर्तन सिन्क में डाल कर मामी ड्राईंग रुम में बैठ गई और राजु भी अपने लिये मेन्गो शेक ले कर आया और सामने के सोफे पर बैठ गया। मामी ने अपने पैर को उठा कर अपने सामने रखी एक छोटी टेबल पर रख दिये और नाईटी को घुटनो तक खींच लिया था। घुटनो तक के गोरे गोरे पैर दिख रहे थे। बडे खुबसुरत पैर थे मामी के। तभी राजु का ध्यान उर्मिला देवी के पैरों से हट कर उनके हाथो पर गया। उसने देखा की मामी अपने हाथो से अपनी चुचीयों को हल्के हल्के खुजला रही थी। फिर मामी ने अपने हाथो को पेट पर रख लिया। कुछ देर तक ऐसे ही रखने के बाद फिर उनका हाथ उनके दोनो जांघो के बिच पहुंच गया।

राजु बडे ध्यान से उनकी ये हरकते देख रहा था। मामी के हाथ ठीक उनकी जांघो के बिच पहुंच गये और वो वहां खुजली करने लगे। जांघो के ठीक बिच में बुर के उपर हल्के हल्के खुजली करते-करते उनका ध्यान राजु की तरफ गया। राजु तो एक टक अपनी मामी को देखे जा रहा था। उर्मिला देवी की नजरे जैसे ही राजु से टकराई उनके मुंह से हंसी निकल गई। हसते हुए वो बोली,
" नई पेन्टी पहनी है ना इसलिये खुजली हो रही है। "

राजु अपनी चोरी पकडे जाने पर शर्मिन्दगी के साथ हस कर मुंह घुमा कर अपनी नजरो को टी वी से चिपका दिया। उर्मिला देवी ने अपने पैरो को और ज्यादा फैला दिया। ऐसा करने से उनकी नाईटी निचे की तरफ लटक गई थी। राजु के लिये ये बडा बढीया मौका था, उसने अपने हाथो में एक रबर की बोल पकडी हुइ थी जीसे उसने जान बुज के निचे गिरा दिया। बोल लुढकता हुआ ठीक उस छोटे से टेबल के निचे चला गया जीस पर मामी ने पैर रखे हुए थे।

राजु, " ओह !! " कहता हुआ उठा और टेबल के पास जाकर बोल लेने के बहाने से लटकी हुई नाईटी के अन्दर झांकने लगा। एक तो नाईटी और उसके अन्दर मामी ने पेटीकोट पहन रखा था, लाईट वहां तक पुरी तरह से नही पहुंच पा रही थी पर फिर भी राजु को मामी की मस्त जांघो के दर्शन हो ही गये। उर्मिला देवी भी राजु की इस हरकत पर मन ही मन मुस्कुरा उठी। वो समझ गई की छोकरे के पेन्ट में भी हलचल हो रही है और उसी हलचल के चक्कर में उनकी पेन्टी के अन्दर झांकने के चक्कर में पडा हुआ है।

राजु बोल लेकर फिर से सोफे पर बैठ गया तो उर्मिला देवी ने उसकी तरफ देखते हुए कहा,
" अब इस रबर की बोल से खेलने की तेरी उमर बित गई है, अब दुसरे बोल से खेला कर। "

राजु थोडा सा शरमाते हुए बोला," और कौन सी बोल होती है मामी, खेलने वाली सारी बोल तो रबर से ही बनी होती है. "

" हां, होती तो है मगर तेरे इस बोल की तरह इधर उधर कम लुढकती है. ", कह कर फिर से राजु की आंखो के सामने ही अपनी बुर पर खुजली करके हसते हुए बोली,
" बडी खुजली सी हो रही है पता नही क्यों, शायद नई पेन्टी पहनी है इसलिये। "

राजु तो एक दम से गरम हो गया और एक टक जांघो के बिच देखते हुए बोला,
" पर मेरा अंडरवियर भी तो नया है वो तो नही काट रहा. "

" अच्छा, तब तो ठीक है, वैसे मैने थोडी टाईट फिटींग वाली पेन्टी ली है, हो सकता है इसलिये काट रही होगी. "

"वाह मामी, आप भी कमाल करती हो इतनी टाईट फिटींग वाली पेन्टी खरीदने की क्या जरुरत थी आपको ? "

" टाईट फिटींग वाली पेन्टी हमारे बहुत काम की होती है, ढीली पेन्टी में परेशानी हो जाती है, वैसे तेरी परेशानी तो खतम हो गई ना. "

" हां, मामी, बिना अंडरवियर के बहुत परेशानी होती थी, सारे लडके मेरा मजाक उडाते थे। "

" पर लडकियों को तो अच्छा लगता होगा, क्यों ? "

" हाये, मामी, आप भी नाआआ ...... "

" क्यों लडकियां तुझे नही देखती क्या ? "

" लडकियां मुझे क्यों देखेन्गी, मेरे में ऐसा क्या है ? "

" तु अब जवान हो गया है, मर्द बन गया है. "

" कहां मामी, आप भी क्या बात करती हो !!? "

" अब जब अंडरवियर पहन ने लगा है, तो इसका मतलब ही है की तु अब जवान हो गया है. "

राजु इस पर एक दम से शरमा गया,
" धत् मामी ............ !!! "

" तेरा खडा होने लगा है क्या ? "

मामी की इस बात पर तो राजु का चेहर एकदम से लाल हो गया। उसकी समझ में नही आ रहा था क्या बोले। तभी उर्मिला देवी ने अपनी नाईटी को एकदम घुटनो के उपर तक खींचते हुए बडे बिन्दास अन्दाज में अपना एक पैर जो की टेबल पर रखा हुआ था उसको राजु की जांघो पर रख दिया (राजु दर-असल पास के सोफे पर पलाठी मार के बैठा हुआ था।) राजु को एकदम से झटका सा लगा। मामी अपने गोरे गोरे पैर की एडी से उसकी जांघो को हल्के हल्के दबाने लगी और एक हाथ को फिर से अपने जांघो के बिच ले जा कर बुर को हल्के हल्के खुजलाते हुए बोली,
"क्यों मैं ठीक बोल रही हु ना ?"

"ओह मामी,"

"नया अंडरवियर लिया है, दिखा तो सही कैसा लगता है ?"

"अरे क्या मामी आप भी ना बस ऐसे ...... अंडरवियर भी कोई पहन के दिखाने वाली चीज है."

"क्यों लोग जब नया कपडा पहनते है तो दिखाते नही है क्या ?", कह कर उर्मिला देवी ने अपने एडी का दबाव जांघो पर थोडा सा और बढा दिया, पैर की उन्गलियों से हल्के से पेट के निचले भाग को कुरेदा और मुस्कुरा के सीधे राजु की आंखो में झांक कर देखती हुई बोली,
" दिखा ना कैसा लगता है, फिट है या नही ?"

"छोडो ना मामी ...... "

'अरे नये कपडे पहन कर दिखाने का तो लोगो को शौक होता है और तु है की शरमा रहा है, मैं तो हंमेशा नये कपडे पहनती हु तो सबसे पहले तेरे मामा को दिखाती हु, वही बताते है की फिटींग कैसी है या फिर मेरे उपर जचता है या नही, अभी तेरे मामा नही है ...... "

"पर मामी ये कौन सा नया कपडा है, आपने भी तो नई पेन्टी खरीदी है वो आप दिखायेन्गी क्या ??"

उर्मिला देवी भी समझ गई की लडका लाईन पर आ रहा है, और पेन्टी देखने के चक्कर में है। फिर मन ही मन खुद से कहा की बेटा तुझे तो मैं पेन्टी भी दिखाउन्गी और उसके अन्दर का माल भी पर जरा तेरे अंडरवियर का माल भी तो देख लु नजर भर के फिर बोली,
"हां दिखाउन्गी ना, तेरे मामा को तो मैं सारे कपडे दिखाती हु."

"धत् मामी ...... तो फिर जाने दो मैं भी मामा को ही दिखाउन्गा."

"अरे तो इसमे शरमाने की क्या बात है, आज तो तेरे मामा नही है इसलिये मामी को ही दिखा दे."

और उर्मिला देवी ने अपने पुरे पैर को सरका कर उसकी जांघो के बिच में रख दिया जहां पर उसका लंड था। राजु का लंड खडा तो हो ही चुका था। उर्मिला देवी ने हल्के से लंड की औकात पर अपने पैर को चला कर दबाव डाला और मुस्कुरा कर राजु की आंखो में झांकते हुए बोली,
"क्यों मामी को दिखाने में शरमा रहा है, क्या ?"

राजु की तो सीट्टी पीट्टी गुम हो गई थी। मुंह से बोल नही फुट रहे थे। धीरे से बोला, "रहने दिजीये मामी मुझे शरम आती है."

उर्मिला देवी इस पर थोडा झिडकने वाले अन्दाज में बोली,
"इसीलिये तो अभी तक इस रबर की बोल से खेल रहा है."

राजु ने अपनी गरदन उपर उठायी तो देखा की उर्मिला देवी अपनी चुचीयों पर हाथ फिरा रही थी। राजु बोला, "तो और कौन सी बोल से खेलु ?"

"ये भी बताना पडेगा क्या, मैं तो सोचती थी तु समझदार हो गया होगा, चल आज तुझे समझदार बनाती हु।"

"हाय मामी, मुझे शरम आ रही है."

उर्मिला देवी ने अपने पंजो का दबाव उसके लंड पर बढा दिया और ढकी छुपी बात करने की जगह सीधा हमला बोल दिया,
"बिना अंडर्विअयर के जब खडा कर के घुमता था तब तो शरम नही आती थी ...... ?, दिखा ना।"

और लंड को कस के अपने पंजो से दबाया ताकी राजु अब अच्छी तरह से समज जाये की ऐसा अन्जाने में नही बलकी जान-बुझ कर हो रहा है। इस काम में उर्मिला देवी को बडा मजा आ रहा था। राजु थोडा परेशान सा हो गया फिर उसने हिम्मत कर के कहा, "ठीक है मामी, मगर अपन पैर तो हटाओ।"

"ये हुई ना बात." कह कर उर्मिला देवी ने अपना पैर हटा लिया।

राजु खडा हो गया और धीरे से अपनी हाफ पेन्ट घुटनो के निचे तक सरका दी। उर्मिला देवी को बडा मजा आ रहा था। लडको को जैसे स्ट्रीप टीज देखने में मजा आता है, आज उर्मिला देवी को अपने भांजे के सौजन्य से वैसा ही स्ट्रीप तीज देखने को मिल रहा था।

उसने कहा, "पुरा पेन्ट उतार ना, और अच्छे से दिखा।"

राजु ने अपना पुरा हाफ पेन्ट उतार दिया और शरमाते-संकोचते सोफे पर बैठने लगा तो उर्मिला देवी ने अपना हाथ आगे बढा कर राजु का हाथ पकड कर अपनी ओर खींच लिया और अपने पास खडा कर लिया और धीरे से उसकी आंखो में झांकते हुए बोली, "जरा अच्छे से देखने दे ना कैसी फिटींग आई है।"

राजु ने अपने टी-शर्ट को अपने पेट पर चढा रखा था और मामी बडे प्यार से उसके अंडरवियर कि फिटींग चेक कर रही थी। छोटा सा वी शेप का अंडरवियर था। इलास्टिक में हाथ लगा कर देखते हुए मामी बोली,
"हमम् फिटींग तो ठीक लग रही है, ये नीला रंग भी तेरे उपर खुब अच्छा लग रहा है मगर थोडी टाईट लगती है."

"वो कैसे मामी, मुझे तो थोडा भी टाईट नही लग रहा."

राजु का खडा लंड अंडरवियर में एकदम से उभरा हुआ सीधा डंडे की शकल बना रहा था। उर्मिला देवी ने अपने हाथ को लौडे की लंबाई पर फिराते हुए कहा,
"तु खुद ही देख ले, पुरा पता चल रहा है की तेरा औजार खडा हो गया है।"

लण्ड पर मामी का हाथ चलते ही मारे सनसनी के राजु की तो हालत खराब होने लगी, कांपती हुई आवाज में, ".....ओह...आहहहह....." करके रह गया।

उर्मिला देवी ने मुस्कुराते हुए पुछा, "हर समय ऐसे ही रहता है क्या ?"

"नाहही मामी, हंमेशा ऐसे नही रहता."

"और समय ढीला रहता है ?"

"हा मामी।"

"अच्छा, तब तो ठीक फिटींग का है, मैं सोच रही थी की अगर हर समय ऐसे ही खडा रहता होगा तो तब तो तुझे थोडा और ढीला लेना चाहिये था, वैसे ये खडा क्यों है ?"

"ओह, मुझे नही पता मामी।"

"बहुत बडा दिख रहा है, पेशाब तो नही लगी है तुझे ?"

'नही मामी."

"तब तो कोई और ही कारण होगा, वैसे वो सेल्स-गर्ल भी हस रही थी, जब मैने बोला की मेरे मुन्ना बेटे का थोडा ज्यादा ही बडा है," कह कर उर्मिला देवी ने लौडे को अंडरवियर के उपर से कस कर दबाया। राजु के मुंह से एक सिसकारी निकल गई।

उर्मिला देवी ने लंड को एक बार और दबा दिया और बोली,
"चल जा सोफे पर बैठ।"

राजु सीधे धरती पर आ गया। लौडे पर मामी के कोमल हाथो का स्पर्श जो मजा दे रहा था वो बडा अनूठा और अजब था। मन कर रहा था की मामी थोडी देर और लौडा दबाती पर मन मार कर चुप चाप सोफे पर आ के बैठ गया और अपनी सांसो को ठीक करने लगा। उर्मिला देवी भी बडी सयानी औरत थी जानती थी की लौंडे के मन में अगर एक बार तडप जाग जायेगी तो फिर लौंडा खुद उसके चंगुल में फस जायेगा। कमसिन उमर के नौजवान छोकरे के मोटे लंड को खाने के चक्कर में वो मुन्ना को थोडा तडपाना चाहती थी। उर्मिला देवी ने अभी भी अपनी नाईटी को अपने घुटनो से उपर तक उठाया हुआ था और अपने दोनो पैर फिर से सामने की टेबल पर रख लिये थे। राजु ने धीरे से अपनी हाफ पेन्ट को उठाया और पहनने लगा।

उर्मिला देवी तभी बोल पडी, "क्यों पहन रहा है ?, घर में और कोई तो है नही, और मैने तो देख ही लिया है."

"हाय नही मामी, मुझे बडी शरम आ रही है."

तभी उर्मिला देवी ने फिर से अपनी चुत के उपर खुजली की। राजु का ध्यान भी मामी के हाथो के साथ उसी तरफ चला गया।

उर्मिला देवी मुस्कुराती हुई बोली, "अभी तक तो शायद केवल पेन्टी काट रही थी पर अब लगता है पेन्टी के अन्दर भी खुजली हो रही है।"

राजु इसका मतलब नही समझा चुप-चाप मामी को घुरता रहा। उर्मिला देवी ने सोचा खुद ही कुछ करना पडेगा, लौंडा तो कुछ करेगा नही। अपनी नाईटी को और उपर सीधा जांघो तक उठा कर उसके अन्दर हाथ घुसा कर हल्के हल्के सहलाने लगी। और बोली, "जा जरा पाउडर ले आ तो।"

राजु अंडरवियर में ही बेडरुम में जाने को थोडा हिचका मगर मामी ने फिर से कहा, "ले आ जरा सा लगा लेती हु।"

राजु उठा और अपनी गांड मटकाते हुए पाउडर ले आया। उर्मिला देवी ने पाउडर ले लिया और थोडा सा पाउडर हाथो में ले कर अपनी हथेली को नाईटी में घुसा दिया। और पाउडर लगाने लगी। राजु तिरछी निगाहों से अपनी मामी हरकतो को देख रहा था और सोच रहा था काश मामी उसको पाउडर लगाने को कहती। उर्मिला देवी शायद उसके मन की बात को समझ गई और बोली,
"राजु क्या सोच रहा है ?"

"कुछ नही मामी, मैं तो बस टी वी देख रहा हु."

"तु बस टी वी देखता ही रह जायेगा, तेरी उमर के लडके ना जाने क्या-क्या कर लेते है ?, तुझे पता है दुनिया कितनी आगे निकल गई है ?"

"क्या मामी आप भी क्या बात करती हो, मैं अपने क्लास का सब्से तेज बच्चा हु ?"

"तेरी तेजी तो मुझे कहीं भी देखने को नही मीली."

"क्या मतलब है, आपका मामी ?"

"अभी तु कमसिन उमर का लडका है, तेरा मन तो करता होगा ?,"

"क्या मन करता होगा मामी ?"

"तांक-झांक करने का", अपनी चुत पर नाईटी के अन्दर से हाथ चलाते हुए बोली,
"अब तो तेरा पुरा खडा होने लगा है."

"क्या मामी ...... ?"

"क्यों मन नही करता क्या ?, मैं जैसे ऐसे तेरे सामने पाउडर लगा रही हु तो तेरा मन करता होगा ...... "

"धत् मामी ...... "

"मैं सब समझती हु ...... तु शरमाता क्यों है ?, तेरी उमर में तो हर लडका यही तमन्ना रखता है की कोई खोल के दिखा दे ...... तेरा भी मन करता होगा ...... फिर बात बदलते बोली तेरे मामा होते तो उनसे पाउडर लगवा लेती."

फिर राजु के चेहरे की तरफ देखते हुए बोली,
"खोलने की बात सुनते ही सब समझ गया, कैसे चेहरा लाल हो गया है तेरा, मैं सब समझती हु तेरा हाल."

राजु का चेहरा और ज्यादा शरम से लाल हो गया और अपनी नजरे झुकाते हुए बोला,
"आप बात ही ऐसी कर रही हो ...... लाओ मैं पाउडर लगा देता हु."

"हाय, लगवा तो लु मगर तु कहीं बहक गया तो !?"

"हाय मामी मैं क्यों बहकुन्गा ?"

"नही तेरी उमर कम है, देख के ही जब तेरा इतना खडा था तो हाथ लगा के क्या हाल हो जायेगा, फिर बदनामी ...... "

राजु का चेहरा खुशी से दमक उठा था, उसको समझ में आ गया था की गाडी अब पटरी पर आ चुकी है बोला,
"आपकी कसम मामी किसी को भी नही बताउन्गा."

इस पर उर्मिला देवी ने राजु का हाथ पकड अपनी तरफ खींचा, राजु अब मामी के बगल में बैठ गया था। उर्मिला देवी ने अपने हाथो से उसके गाल को हल्का सा मसलते हुए कहा,
"हाय, बडी समझदारी दिखा रहा है पर है तो तु बच्चा ही ना कहीं बोल दिया तो ?"

"हाय मामी ...... नही किसी से नही ...... "

"खाली पाउडर ही लगायेगा या फिर ...... देखेगा भी ...... मैं तो समझती थी की तेरा मन करता होगा पर ...... "

"हाय मामी पर क्या ...... "

"ठीक है, चल लगा दे पाउडर."

उर्मिला देवी खडी हो गई और अपनी नाईटी को अपनी कमर तक उठा लिया। राजु की नजर भी उस तरफ घुम गई। मामी अपनी नाईटी को कमर तक उठा कर उसके सामने अपनी पेन्टी के इलास्टीक में हाथ लगा कर खडी थी। मामी की मोटी मोटी खम्भे के जैसी सफेद खुबसुरत जांघे और उनके बीच कयामत बरसाती उनकी काली पेन्टी को देख पाउडर का डिब्बा हाथ से छुट कर गीर गया और पाउडर लगाने की बात भी दिमाग से निकल गई।

पेन्टी एकदम छोटी सी थी और मामी की चुत पर चिपकी हुई थी। राजु तो बिना बोले एक टक घुर घुर कर देखे जा रहा था। उर्मिला देवी चुप-चाप मुस्कुराते हुए अपनी नशिली जवानी का असर राजु पर होता हुआ देख रही थी। राजु का ध्यान तोडने की गरज से वो हसती हुई बोली,
कैसी है मेरी पेन्टी की फिटींग ठीक ठाक है, ना ?"

राजु एकदम से शरमा गया। हकलाते हुए उसके मुंह से कुछ नही निकला। पर उर्मिला देवी वैसे ही हसते हुए बोली,
"कोई बात नही, शरमाता क्यों है, चल ठीक से देख कर बता कैसी फिटींग आई है ?"

राजु कुछ नही बोला और चुप-चाप बैठा रहा। इस पर खुद उर्मिला देवी ने उसका हाथ पकड के खींच कर उठा दिया और बोली,
"देख के बता ना, कही सच-मुच में टाईट तो नही, अगर होगी तो कल चल के बदल लेंगे।"

राजु ने भी थोडी सी हिम्मत दिखाई और सीधा मामी के पैरों के पास घुटनो के बल खडा हो गया और बडे ध्यान से देखने लगा। मामी की चुत पेन्टी में एकदम से उभरी हुई थी। बुर के दोनो फांक के बीच में पेन्टी फस गई थी और चुत के छेद के पास थोडा स गीलापन दिख रहा था। राजु को इतने ध्यान से देखते हुए देख कर उर्मिला देवी ने हसते हुए कहा,"
क्यों फिट है या नही, जरा पिछे से भी देख के बता ?"

कह कर उर्मिला देवी ने अपने मोटे मोटे गठीले चुतड राजु की आंखो के सामने कर दिये। पेन्टी का पिछे वाला भग तो पतला सा स्टाईलीश पेन्टी (थोन्ग पेन्टी) की तरह था। उसमे बस एक पतली सी कपडे की लकीर सी थी जो की उर्मिला देवी की गांड की दरार में फसी हुई थी। गोरे-गोरे मैदे के जैसे गुदाज चुतडो को देख कर तो राजु के होश ही उड गये, बेशक्ता उसके मुंह से निकल गया,
"मामी पिछे से तो आपकी पेन्टी और भी छोटी है चुतड भी कवर नही कर पा रही।"

इस पर मामीजी ने हसते हुए कहा, "अरे ये पेन्टी ऐसी ही होती है, पिछे की तरफ केवल एक पतला सा कपडा होता है जो बीच में फस जाता है, देख मेरे चुतडो के बीच में फसा हुआ है, ना ?"

"हा मामी, ये एकदम से बीच में घुस गया है."

"तु पिछे का छोड, आगे का देख के बता ये तो ठीक है, ना ?"

"मुझे तो मामी ये भी छोटा लग रहा है, साईड से थोडे बहुत बाल भी दिख रहे है, और आगे का कपडा भी कहीं फसा हुआ लग रहा है।"

इस पर उर्मिला देवी अपने हाथो से पेन्टी के जांघो के बीच वाले भाग के किनारो को पकडा और थोडा फैलाते हुए बोली,
"वो उठने बैठने पर फस ही जाता है, अब देख मैने फैला दिया है, अब कैसा लग रहा है ?"

"अब थोडा ठीक लग रहा है मामी, पर उपर से पता तो फिर भी चल रहा है."

"अरे तु इतने पास से देखेगा तो, उपर से पता नही चलेगा क्या, मेरा तो फिर भी ठीक है तेरा तो साफ दिख जाता है।"

"पर मामी, हम लोगों का तो खडा होता है ना, तो आप लोगों का खडा नही होता ?"

"हां हमारे में छेद होता है, इसी से तो हर चीज इसके अन्दर घुस जाती है।"

कह कर उर्मिला देवी खिलखिला कर हसने लगी। राजु ने भी थोडा सा शरमाने का नाटक किया। अब उसकी भी हिम्मत खुल चुकी थी। अब अगर उर्मिला देवी चुची पकडाती तो आगे बढ कर पुरा चोद देता। उर्मिला देवी भी इस बात को समझ चुकी थी। ज्यादा नाटक चोदने की जगह अब सीधा खुल्लम-खुल्ला बाते करने में दोनो की भलाई थी, ये बात अब दोनो समझ चुके थे। उर्मिला देवी ने इस पर राजु के गालों को अपने हाथो से मसलते हुए कहा,
"देखने से तो बडा भोला भाला लगता है मगर जानता सब है, की किसका खडा होता है और किसका नही, लडकी मिल जाये तो सबसे पहले ...... बिगड गया है तु"

कह कर उर्मिला देवी ने अपनी नाईटी को जिसको उन्होंने कमर तक उठा रखा था निचे गीरा दिया।

"क्या मामी आप भी ना, मैं कहां बिगडा हु, लओ पाउडर लगा दु."

"अच्छा बिगडा नही है, तो फिर ये जो तेरी अंडरवियर में है, उसको क्यों खडा कर के रखा हुआ है।"

मुन्ना ने चौंक कर अपने अंडरवियर की तरफ देखा, सच-मुच उसका लंड एकदम से तन गया था और अंडरवियर को एक टेन्ट की तरह से उभारे हुए था। उसने शरमा कर अपने एक हाथ से अपने उभार को छुपाने की कोशिश की।

" हाय मामी छोडो लओ पाउडर लगा दु."

"तु रहने दे पाउडर, वो मैने लगा लिया है, कहीं कुछ उलटा सीधा हो गया तो।"

"क्या उलटा सीधा होगा मामी ?, मैं तो इसलिये कह रहा था की आपको खुजली हो रही थी तो फिर ...... ", बात बीच में ही कट गई।

"खुब समझती हु क्यों बोल रहे थे ?"

"हाय मामी नही, मैं तो बस आप को खुजली ...... ।"

"मैं अच्छी तरह से समझती हु तेरा इरादा क्या है, और तु कहां नजर गडाये रहता है, मैं तुझे देखती थी पर सोचती थी ऐसे ही देखता होगा मगर अब मेरी समझ में अच्छी तरह से आ गया है."

मामी के इतना खुल्लम-खुल्ला बोलने पर राजु के लंड में एक सनसनी दौड गई.

"हाय मामी नही ...... ...... ",

राजु की बाते उसके मुंह में ही रह गई और उर्मिला देवी ने आगे बढ कर राजु के गाल पर हल्के से चिकोटी काटी।

मामी के कोमल हाथो का स्पर्श जब राजु के गालों पर हुआ तो उसका लंड एक बार फिर से लहरा गया। मामी की नंगी जांघो के नजारे की गरमाहट अभी तक लंड और आंख दोनो को गरमा रही थी। तभी मामी ने उसकी ठुड्डी पकड के उसके चेहरे को थोडा सा उपर उठाया और अपनी चुचीयों को एक हाथ से सहलाते हुए बोली,
"बहुत घुर घुर के देखत है ना इनको, दिल चाहता होगा की नंगी करके देखुं, है ना ?

मामी की ये बात सुन कर राजु का चेहरा लाल हो गया और गला सुख गया फसी हुई आवाज में, "माआआआम्म्म्म्मीईईई ...... " करके रह गया।

मामी ने इस बार राजु का एक हाथ पकड लिया और हल्के से उसकी हथेली को दबा कर कहा, "क्यों मन करता है की नही, की किसी की देखुं।"

राजु का हाथ मामी के कोमल हाथो में कांप रहा था। राजु को अपने और पास खींचते हुए उर्मिला देवी ने लगभग राजु को अपने से सटा लिया था। राजु और उसकी मामी के बीच केवल इंच भर का फासला था। मामी की गर्म सांसो क अहसास उसे चेहरे पर हो रहा था। राजु अगर थोडा सा आगे की तरफ हिलता तो उसकी छाती मामी के नुकीले चुंचो से जरुर टकरा जाती। इतने पास से राजु पहली बार मामी को देख रहा था। दोनो की सांसे तेज चल रही थी। मामी की उठती गीरती छातीयों से राजु की नजर हटाये नही हट रही थी।

उर्मिला देवी ने राजु का हाथ पकड के अपनी छातीयों पर रख दिया और अपने हाथो से उसको दबाते हुए बोली,
"मन करता होगा की देखे, देख तेरा हाथ कैसे कांप रहा है, मन करता है, ना ?"

थुक निगल के गले को तर करता हुआ राजु बोला, "हांआआ मामी मन ...... करता ...... ।"

उर्मिला देवी ने हल्के से फिर उसके हाथ को अपनी चुचियों पर दबाते हुए कहा, 'देख मैं कहती थी ना तेरा मन करता होगा, पुरा नंगा देखे, लौंडा जैसे ही जवान होता है उसके मन में सबसे पहले यही आता है की किसी औरत की देखे।"

अब राजु भी थोडा खुल गया और हकलाते हुए बोला,
"हाय, मामी बहुत मन करता है की देखे."

"मैं तो दिखा देती मगर....."

"हाय मामी, मगर क्या ?"

"तुने कभी किसी की देखी नही है, क्या ?"

"नही, माआआअमीईईइ...!!"

"तेरी उमर कम है, फिर मैं तेरी मामी हुं."

"मामी मैं अब बडा हो गया हु."

"मैं दिखा देती मगर तेरी उमर कम है, तेरे से रहा नही जायेगा."

"नही मामी, मैं रह लुंगा, बस दिखा दो एक बार."

"तु नही रह पायेगा", कह कर उर्मिला देवी ने अपना एक हाथ राजु के अंडरवियर के उपर से उसके लंड पर रख दिया। राजु एकदम से लहरा गया। मामी के कोमल हाथो का लंड पर दबाव पा कर मजे के कारण से उसकी पलके बन्ध होने को आ गई। उर्मिला देवी बोली,
" देख कैसे खडा कर के रखा हुआ है ?, अगर दिखा दुन्गी तो तेरी बेताबी और बढ जायेगी."

"हाय नही मामी, प्लीज एक बार दिखा दो."

"पेन्टी खोल के दिखा दुं ?"

"हां मामी, दिखा दो बस एक बार, किसी की नही देखी."

राजु का एक हाथ जो अभी तक उर्मिला देवी की चुचियों पर ही था, उसको अपने हाथो से दबाते हुए और अपनी चुचियों को थोडा और उंचकते हुए उर्मिला देवी बोली,
"मैने नई ब्रा भी पहनी हुई, उसको नही देखेगा क्या ??

"हाय मामी उसको भी ...... "

"चल दिखा दुन्गी मगर एक शर्त पर."

"बताओ मामी, मैं आपकी हर बात मानुंगा."

"ठीक है फिर जा और मुत कर के अपना अंडरवियर उतार के आ."

राजु को एकदम से झटका लग गया। उसकी समझ में नही आ रहा था की क्या जवाब दे। मामी और उसके बीच खुल्लम-खुल्ला बाते हो रही थी मगर मामी अचानक से ये खेल इतना कुल्लम-खुल्ला हो जायेगा, ये तो राजु ने सोचा भी ना था। कुछ घभराता और कुछ सकपकाता हुआ वो बोला,
"मामी अंडरवियर ...... "

"हा, जल्दी से अंडरवियर उतार के मेरे बेडरुम में आ जा फिर दिखाउन्गी.", कह कर उर्मिला देवी उस से अलग हो गई और टी वी ओफ कर के अपने बेडरुम की तरफ चल दी।

मामी को बेडरुम की तरफ जाता देख जल्दी से बाथरुम की तरफ भागा। अंडरवियर उतार कर जब राजु मुतने लगा तो उसके लंड से पेशाब की एक मोटी धार कमोड में छर छरा कर गीरने लगी। जल्दी से पेशाब कर अपने फनफनाते लौडे को काबु में कर राजु मामी के बेडरुम की तरफ भागा। अन्दर पहुंच कर देखा की मामी ड्रेसिंग टेबल के सामने खडी हो कर अपने बालों का जुडा बना रही थी।

राजु को देखते ही टपाक से बोली, "चल बेड पर बैठ मैं आती हुं.",

और अटेच्ड बाथरुम में चली गई। बाथरुम से मामी के मुतने की सीटी जैसी आवाज सुनाई दे रही थी। कुछ पल बाद ही मामी बाथरुम से अपनी नाईटी को जांघो तक उठाये हुए बाहर निकली। राजु का लंड एक बार फिर से सनसनाया। उसका दिल कर रहा था की मामी की दोनो जांघो के बीच अपने मुंह को घुसा दे और उनकी रसीली चुत को कस के चुम ले। तभी उर्मिला देवी जो की, बेड तक पहुंच चुकी थी की आवाज ने उसको वर्तमान में लौटा दिया,
"तु अभी तक अंडरवियर पहने हुए है, उतारा क्यों नही ?

राजु थोडा शरमाया, "हाय मामी शरम आ रही है ...... तुम तो दिखाने को बोल रही थी."

"धत् बेवकुफ, चल अंडरवियर उतार."

"हाय् मामी, अंडरवियर उतार के क्या होगा ...... !"

"असली गेंदो का मजा चखाउन्गी.", कह कर हल्के से अपनी चुचीयों पर हाथ फेरा।
राजु का लौडा और भी ज्यादा खडा हो गया।

"पर मामी मैं पुरा नंगा हो जाउन्गा."

"तो क्या हुआ ?, मुझे पेन्टी खोल के दिखाने के लिये बोलता है उसमे शरम नही आती तुझे, खोल ना अंडरवियर फिर मैं तुझे बताउन्गी की तेरी मामी को कहां कहां खुजली होती है और खुजली मिटाने की दुसरी दवा भी बताउन्गी."

"मामी, दुसरी कौन सी दवा है ?"

"बताउन्गी बेटा, पहले जरा अपना बेलन तो दिखा।"

राजु ने थोडा सा शरमाने का नाटक करते हुए अपना अंडरवियर धीरे धीरे सरका दिया। उर्मिला देवी की आंखो की चमक बढती जा रही थी। आज दस इंच मोटे तगडे लौडे का दर्शन पहली बार खुल्लम-खुल्ला ट्युब लाईट की रोशनी में हो रहा था। नाईटी जिसको अब तक एक हाथ से उन्होंने उठा कर रखा हुआ था, निचे छुट कर गीर गई राजु की आंखो को गरमी देने वाली चीज तो ढक चुकी थी मगर उसकी मामी के मजे वाली चीज अपनी पुरी औकात पर आ के फुफकार रही थी। उर्मिला देवी ने एक बार अपनी नाईटी के उपर से ही अपनी चुत को दबाया और खुजली करते हुए बोली,
"इससससस बडा हथियार है तेरा, देख के तो खुजली और बढ गई."


राजु जो की थोडा बहुत शरमा रहा था बोला,
"खुजली बढ गई है तो पेन्टी उतार लो ना मामी, वो काम तो करती नही हो, पर अंडरवियर बेकार में उतरवा दिया."

"अभी उतारती हु, फिर तुझे बताउन्गी अपनी खुजली की दवाई, हाय कैसा मुसल जैसा है तेरा."

फिर उर्मिला देवी ने अपनी नाईटी के बटन खोलने शुरु कर दिये। नाईटी को बडे आराम से धीरे कर के पुरा उतार दिया। अब उर्मिला देवी के बदन पर केवल एक काले रंग की ब्रा और नाईटी के अन्दर पहनी हुइ पेटीकोट थी। गोरा मैदे के जैसा मांसल पेट, उसके बीच गहरी गुलाबी नाभी, दो मोटी मोटी चुचीयां, जो की ऐसा लग रहा था की ब्रा को फाड के अभी निकल जायेगी उनके बीच की गहरी खाई, ये सब देख कर तो राजु एकदम से बेताब हो गया था। लंड फुफकार मार रहा था और बार-बार झटके ले रहा था। राजु एकदम से पागल हो कर अपने हाथो से अपने लंड को पकड कर जोर जोर से दबाने लगा।

उर्मिला देवी ने जब उसकी बेताबी देखी तो आगे बढ कर खुद अपने हाथो से उसके लंड को पकड लिया और मुस्कुराती हुई बोली,
"मैं कहती थी ना की तेरे बस का नही है, तु रह नही पायेगा, अभी तो मैने पुरा खोला भी नही है और तु शुरु हो गया."

बाहर खुब जोरो की बारीश शुरु हो गई थी। ऐसे मस्ताने मौसम में मामी-भांजे क मस्ताना खेल अब शुरु हो गया था। ना तो अब उर्मिला देवी रुकने वाली थी ना ही राजु।

उर्मिला देवी ने राजु का हाथ अपनी ब्रा में कैद चुचीयों के उपर रख दिया और बोली,
"तु ऐसे तो मानेगा नही इधर मैं खोल के दिखाती रहुन्गी इधर तु मुठ मारता रहेगा, ले अब खुद ही खोल के देख,"

राजु ने कांपते हुए हाथो से अपनी मामी की ब्रा के स्ट्रेप्स खोलने की कोशीश की मगर ब्रा इतनी टाईट थी की खुल नही रही थी। उर्मिला देवी ने हसते हुए अपने बदन को थोडा ढील किया खुद अपने हाथो को पिछे ले जा कर अपनी ब्रा के स्ट्रेप्स को खोल दिये और हसते हुए बोली.
"ब्रा भी नही खोलना जानता है, चल कोई बात नही मैं तुझे पुरा ट्रेईन कर दुन्गी, ले देख अब मेरी नंगी चुचियां जीनको देखने के लिये इतना तरसता था."

मामी के कन्धो से ब्रा के स्ट्रेप्स को उतार कर राजु ने जल्दी से ब्रा को एक झटके में निकाल फेंका। उर्मिला देवी हसते हुए बोली,
"बडी जल्दी है, आराम से उतार, अब जब बोल दिया है की दिखा दुन्गी तो फिर मैं पिछे नही हटने वाली।"

मामी के उठे हुए मोटे मोटे मम्मे देख कर राजु तो जैसे पागल ही हो गया था। एक टक घुर घुर कर देख रहा था उनके मलाई जैसे चुचों को। एकदम बोल के जैसी ठोस और गुदाज चुचियां थी। निप्पल भी काफी मोटे मोटे और हल्का गुलाबीपन लिये हुए थे उनके चारो तरफ छोटे छोटे दाने थे।

मामी ने जब राजु को अपनी चुचियों को घुरते हुए देखा तो राजु का हाथ पकड कर अपनी चुचियों पर रख दिया और मुस्कुराती हुई बोली,
"कैसा लग रहा है, पहली बार देखी है, ना ?"

"हां मामी पहली बार देखी है, बहूऊऊत खुबसुरत है."

राजु को लग रहा था जैसे की उसके लंड में से कुछ निकल जायेगा। लौड एकदम से अकड कर अप-डाउन हो रहा था और सुपाडा तो एकदम पहाडी आलु के जैसा लाल हो गया था।

"देख तेरा औजार कैसे फनफना रहा है, थोडी देर और देखेगा तो फट जायेगा."

"हाय मामी फट जाने दो, थोडा सा और पेन्टी खोल के भीईइ ........ "

इस पर उर्मिला देवी ने उसके लंड को अपनी मुठ्ठी में थाम लिया और दबाती हुइ बोली, "अभी ये हाल है तो पेन्टी खोल दी तो क्या होगा ?"

"हाय मामी, जरा बस सा खोल के ........ "

इस पर उर्मिला देवी ने उसके लंड को अपनी मुठ्ठी में और कस के दबोच लिया और उपर नीचे करने लगी। लंड के सुपाडे से चमडी पुरी तरह से हट जाती थी और फिर जब मुठ्ठी उपर होती तो चमडी फिर से ढक जाती थी। इतनी जोर से तो मुन्ना ने भी कभी अपने हाथो से मुठ नही मारी थी जितनी जोर से आज मामी मुठ मर रही थी। सनसनी के कारण राजु की गांड फट रही थी। उसकी समझ में नही आ रहा था की क्या करे। सब-कुछ भुल कर सिसकारी लेते हुए मामी के हाथो से मुठ मराई का मजा लुट रहा था। लंड तो पहले से ही पके आम के तरह से कर रखा था। दो चार हाथ मारने की जरुरत थी, फट से पानी फेंक देता मगर कयामत तो तब हो गयी जब उर्मिला देवी ने आगे झुक कर लंड को अपने मुंह में ले लिया। अपने पतले गुलाबी होथों के बिच लंड को दबोच कर जैसे पाईप से पानी चुस कर निकालते है वैसे ही कस के जो चुसाई शुरु की तो राजु की आंखे बन्ध होने लगी, गला सुख गया ऐसा लगा जैसे शरीर का सारा खून सीमट कर लंड में भर गया है और मामी उसको चुस लेना चाहती है। मजे के कारण आंखे नही खुल रही थी। मुंह से केवल गोगीयांनी आवाज में बोलता जा रहा था,
"हाय चुस लो, चुस लो, ओह मामी चुस लो ........ "

तभी उर्मिला देवी ने चुसना बन्ध कर अपने होथों को लंड पर से हटा लिया और फिर से अपने हाथो से मुठ मारते हुए बोली,
"अब देख, तेरा कैसे फल फला के निकलेगा जब तु मेरी पेन्टी की सहेली को देखेगा."

चुसाई बन्ध होने से मजा थोडा कम हुआ तो राजु ने भी अपनी आंखे खोल दी। मामी ने एक हाथ से मुठ मारते हुए दुसरे हाथ से अपने पेटीकोट को पुरा पेट तक उपर उठा दिया और अपनी जांघो को खोल कर पेन्टी के किनारे (मयानी) को पकड एक तरफ सरका कर अपनी झांटो भरी चुत के दर्शन कराये तो राजु के लौडे ने भल-भला कर पानी छोडना शुरु कर दिया। राजु के मुंह से एकदम से आनन्द भरी जोर की सिसकारी निकली और आंखे बन्द होने लगी और, "ओह मामी..........ओह मामी...." , करता हुआ अपने लंड का पानी छोडने लगा।

उर्मिला देवी ने उसके झडते लंड का सारा माल अपने हाथो में लिया और फिर बगल में रखे टोवेल में पोंछती हुई बोली,
" देखा मैं कहती थी ना की, देखते ही तेरा निकल जायेगा।"

राजु अब एकदम सुस्त हो गया था। इतने जबरदस्त तरीके से वो आजतक नही झडा था। उर्मिला देवी ने उसके गालो को चुटकी में भर कर मसलते हुए एक हाथ से उसके ढीले लंड को फिर से मसला। राजु अपनी मामी को हसरत भरी निगाहों से देख रहा था। उर्मिला देवी राजु की आंखो में झांकते हुए वहीं पर कोहनी के बल राजु के बगल में अधलेटी सी बैठ कर अपने दुसरे हाथ से राजु के ढीले लौडे को अपनी मुठ्ठी में उसके अंडो समेत कस कर दबाया और बोली, "मजा आया ........ ?"

राजु के चेहरे पर एक थकान भरी मुस्कुराहट फैल गई। पर मुस्कुराहट में हसरत भी थी और चाहत भी थी।

मामी ने राजु के लौडे को जोर से दबोच कर उसके गालो पर अपने दांत गडाते हुए एक हल्की सी पुच्ची ली और अपनी टांगो को उसकी टांगो पर चढा कर रगडते हुए बोली, "पुरा मजा लेगा....?"

राजु थोडा सा शरमाते हुए बोला, "हाय मामी, हां !!।"

उर्मिला देवी की गोरी चीकनी टांगे राजु के पैरो से रगड खा रही थी। उर्मिला देवी का पेटीकोट अब जांघो से उपर तक चड चुका था।

"जानता है पुरे मजे का मतलब ?!"

राजु ने थोडा संकुचते हुए अपनी गरदन हां में हिला दी। इस पर उर्मिला देवी ने अपनी नंगी गदराई जांघो से राजु के लौडे को मसलते हुए उसके गालो पर फिर से अपने दांत गडा दिये और हल्की सी एक प्यार भरी चपत लगाते हुए बोली,
"मुझे पहले से ही शक था, तु हंमेशा घुरता रहता था।"

फिर प्यार से उसके होठों को चुम लिया और उसके लौडे को दबोचा। राजु को थोडा दर्द हुआ। मामी के हाथ को अपनी हथेली से रोक कर सिसकाते हुए बोला,
"हाय मामी...।"

राजु को ये मीठा दर्द सुहाना लग रहा था। वो सारी दुनिया भुल चुका था। उसके दोनो हाथ अपने आप मामी की पीठ से लग गये और उसने उर्मिला देवी को अपनी बाहों में भर लिया। मामी की दोनो बडी बडी चुचियां अब उसकी छाती से लग कर चिपकी हुई थी।

उर्मिला देवी ने फिर से राजु के होठों को अपने होठों में भर लिया और अपनी जीभ को उसके मुंह में डाल कर घुमाते हुए दोनो एक दुसरे को चुमने लगे। औरत के होथों का ये पहला स्पर्श जहां राजु को मीठे रसगुल्ले से भी ज्यादा मीठा लग रहा था वहीं उर्मिला देवी एक नौजवान कमसिन लौंडे के होठों का रस पी कर अपने होश खो बैठी थी। उर्मिला देवी ने राजु के लंड को अपनी हथेलीयों में भर कर फिर से मसलना शुरु कर दिया। कुछ ही देर में मुरझाये लंड में जान आ गई। दोनो के होंठ जब एक दुसरे से अलग हुए तो दोनो हांफ रहे थे ऐसा लग रहा था जैसे मीलो लम्बी रेस लगा कर आये हे। अलग हट कर राजु के चेहरे को देखते हुए उर्मिला देवी ने राजु के हाथ को पकड कर अपनी चुचियों पर रखा और कहा,
"अब तु मजा लेने लायक हो गया है."

फिर उसके हाथो को अपनी चुचियों पर दबाया। राजु इशारा समझ गया।उसने उर्मिला देवी की चुचियों को हल्के हल्के दबाना शुरु कर दिया। उर्मिला देवी ने भी मुस्कुराते हुए उसके लौडे को अपने कोमल हाथो में थाम लिया और हल्के हल्के सहलाने लगी। आज मोटे दस इंच के लंड से चुदवाने की उसकी बरसों की तमन्ना पूरी होने वाली थी। उसके लिये सबसे मजेदार बात तो ये थी की लौंडा एकदम कमसिन उमर का था। जैसे मर्द कमसिन उमर की अनचुदी लडकियों को चोदने की कल्पना से सिहर उठते है, शायद उर्मिलाजी के साथ भी ऐसा ही हो रहा था. मुन्ना बाबु के लौडे को मसलते हुए उनकी चुत पसीज रही थी और इस दस इंच के लौडे को अपनी चुत की दिवारों के बीच कसने के लिये बेताब हुई जा रही थी।

राजु भी अब समझ चुका था की आज उसके लंड का सील तो जरुर तुट जायेगा। दोनो हाथो से मामी की नंगी चुचियों को पकड कर मसलते हुए मामी के होठों और गालो पर बेतहाशा चुम्मीयां काटे जा रहा था। दोनो मामी-भांजे जोश में आकर एक दुसरे से लिपट चीपट रहे थे।

तभी उर्मिलाजी ने राजु के लौडे को कस कर दबाते हुए अपने होंठ भींच कर राजु को उक्साया, "जरा कस कर।"

राजु ने अपनी हथेलीयों में दोनो चुचियों को भर कर जोर से मसलते हुए निप्पल को चुटकी में पकड कर आगे की तरफ खींचते हुए जब दबाया तो उर्मिला देवी के मुंह से आह नीकल गई। दर्द और मजा दोनो ही जब एक साथ मीला तो मुंह से सिसकारीयां फुटने लगी। पैर की एडीयों से बिस्तर को रगडते हुए अपने चुतडों को हवा में उछालने लगी। राजु ने मामी को मस्ती में आते हुए देख और जोर से चुचियों को मसला और अपने दांत गाल पर गडा दिये।

उर्मिला देवी एकदम से तिलमिला गई और राजु के लौडे को कस कर मरोड दिया,
"उईईईईईईईई............माआआआआआ, सस्सस्सस धीरे से ........ ।"

लंड के जोर से मसले जाने के कारण राजु एकदम से दर्द से तडप गया पर उसने चुचियों को मसलना जारी रखा और मामी की पुच्चियां लेते हुए बोला,
"अभी तो बोल रही थी, जोर से और अभी चील्ल रही हो ........ ओह मामी !!!।"

तभी उर्मिला देवी ने राजु के सर को पकडा और उसे अपनी चुचियों पर खींच लिया और अपनी बांयी चुंची के निप्पल को उसके मुंह से सटा दिया और बोली,
"इतनी सारी मस्तराम की किताबे पढ कर क्या खाली चुंची दबाना ही सीखा है ?, चुसना नही सीखाया क्या उसमे ??।"

राजु ने चुंची के निप्पल को अपने होठों के बीच कस लिया। थोरी देर तक निप्पल चुसवाने के बाद मामी ने अपनी चुंची को अपने हाथो से पकड कर राजु के मुंह में ठेला, राजु का मुंह अपने आप खुलता चला गया और निप्पल के साथ जीतनी चुंची उसके मुंह में समा सकती थी उतनी चुंची को अपने मुंह में लेकर चुसने लगा। दुसरे हाथ से दुसरी चुंची को मसलते हुए राजु अपनी मामी के मम्मे चुस रहा था। कभी कभी राजु के दांत भी उसके मम्मो पर गड जाते, पर उर्मिला देवी को यही तो चाहिये था-----एक नौजवान जोश से भरा लौंडा जो उसको नोचे खसोटे और एक जंगली जानवर की तरह उसको चोद कर जवानी का जोश भर दे।

चुंची चुसने के तरीके से उर्मिला देवी को पता चल गया था की लौंडा अभी अनाडी है, पर अनाडी को खिलाडी तो उसे ही बनाना था। एक बार लौंडा जब खिलाडी बन जाये तो फिर उसकी चुत की चांदी ही चांदी थी।

राजु के सर के बालों पर हाथ फेरती हुइ बोली,
".........धीरे.....धीरे...,, चुंची चुस और निप्पल को रबर की तरह से मत खींच आराम से होठों के बीच दबा के धीरे-धीरे जीभ की मदद से चुमला, और देख ये जो निप्पल के चारो तरफ काला गोल गोल घेरा बना हुआ है ना, उस पर और उसके चारो तरफ अपनी जीभ घुमाते हुए चुसेगा तो मजा आयेगा।"

राजु ने मामी के चुंची को अपने मुंह से नीकाल दिया, और मामी के चेहरे की ओर देखते हुए अपनी जीभ नीकाल कर निप्पल के उपर रखते हुए पुछा,
"ऐसे मामी,,??"

"हां, इसी तरह से जीभ को चारो तरफ घुमाते हुए, धीरे धीरे।"

चुदाई की ये कोचिंग आगे जा कर राजु के बहुत काम आने वाली थी जिसका पता दोनो में से किसी को नही था। जीभ को चुंची पर बडे आराम से धीरे धीरे चला रहा था निप्पल के चारो तरफ के काले घेरे पर भी जीभ फिरा रहा था। बीच बीच में दोनो चुंची को पुरा का पुरा मुंह में भर कर भी चुस लेता था। उर्मिला देवी को बडा मजा आ रहा था और उसके मुंह से सिसकारीयां फुटने लगी थी,
" ऊऊउईई ........ आअह्हहहह ........ शशशशश् ........ राजु बेटा ........ आअह्हह्हह ........ ऐसे ही मेरे राजा ........ शीईईईईईई................एक बार में ही सीख गया, हाय मजा आ रहा है,"

"हाय मामी, बहुत मजा है, ओह मामी आपकी चुंची, ........ शशशश...... कितनी खुबसुरत है, हंमेशा सोचता था, कैसी होगी ??, आज ........ "

" उफफफ्फ् शशशशशसीईईईईईई ........ आआराआआम से आराम से, उफफफ् साले, खा जा, तेरी मां का भेजा हुआ लंगडा आम है, भोसडी के ........ चुस के सारा रस पी जा।"

मामी की गद्देदार मांसल चुचियों को राजु, सच में शायद लंगडा आम समझ रहा था। कभी बायीं चुंची मुंह में भरता तो कभी दाहिनी चुंची को मुंह में दबा लेता। कभी दोनो को अपनी मुठ्ठी में कसते हुए बीच वाली घाटी में पुच ........ पुच करते हुए चुम्मे लेता, कभी उर्मिला देवी की गोरी सुराहीदार गरदन को चुमता।

बहुत दिनो के बाद उर्मिला देवी की चुचियों को कीसी ने इस तरह से मथा था। उसके मुंह से लगातार सिसकारीयां निकल रही थी, आहें निकल रही, चुत पनीया कर पसीज रही थी और अपनी उत्तेजना पर काबु करने के लिये वो बार-बार अपनी जांघो को भींच भींच कर पैर की एडीयों को बिस्तर पर रगडते हुए हाथ-पैर फेंक रही थी। दोनो चुचियां ऐसे मसले जाने और चुसे जाने के कारण लाल हो गई थी।

चुंची चुसते-चुसते राजु निचे बढ गया था और मामी के गुदाज पेट पर अपने प्यार का इजहार करते हुए पुचीयां काट रहा था। उर्मिला देवी की चुत एकदम गीली हो कर चू ने लगी। भगनसा खडा होकर लाल हो गया था। इतनी देर से राजु के साथ खिलवाड करने के कारण धीरे-धीरे जो उत्तेजना का तुफान उसके अन्दर जमा हुआ था, वो अब बाहर निकलने के लिये बेताब हो उठा था।

एकदम से बेचैन होकर सिसयाते हुए बोली,
" कितना दुध पीयेगा मुये, उईई ........ शिईईईईईईईईई ........ साले, चुचीं देख के चुचीं में ही खो गया, इसी में चोदेगा क्या, भोसडी के ?।"

राजु मामी के होठों को चुम कर बोला,
"ओह मामी बहुत मजा आ रहा है सच में, मैने कभी सोचा भी नही था. हाय, मामी आपकी चुचीं को चोद दुं, ........ ?"

उर्मिला देवी ने एक झापड उसके चुतड पर मारा और उसके गाल पर दांत गडाते हुए बोली, "साले, आभी तक चुचीं पर ही अटका हुआ है।"

राजु बिस्तर पर उठ कर बैठ गया और एक हाथ में अपने तमतमाये हुए लौडे को पकड कर उसकी चमडी को खींच कर पहाडी आलु के जैसे लाल-लाल सुपाडे को मामी की चुचियों पर रगडने लगा।

उत्तेजना के मारे राजु का बुरा हाल हो चुका था, उसे कुछ भी समझ में नही आ रहा था। खेलने के लिये मिले इस नये खिलौने के साथ वो जी भर के खेल लेना चाहता था। लंड का सुपाडा रगडते हुए उसके मुंह से मजे की सिसकारीयां फुट रही थी,
"ओह मामी, शशशीईईईईईई मजा आ गया मामी, शशशशीईईईईईईईई और लो मामी।"

उर्मिला देवी की चुत में तो आग लगी हुइ थी उन्होंने झट से राजु को धकेलते हुए बिस्तर पर पटक दिया और उसके उपर चड कर अपने पेटीकोट को उपर किया एक हाथ से लौडे को पकडा और अपनी झांटेदार पनीयायी हुइ चुत के गुलाबी छेद पर लगा कर बैठ गई। गीली चुत ने सटाक से राजु के पहाडी आलु जैसे सुपाडे को निगल लिया।

राजु का क्यों की ये पहली बार था इसलिये जैसे ही सुपाडे पर से चमडी खीसक कर नीचे गई राजु थोडा सा चीहुंक गया।
" ओह मामी, !!!"

"पहली बार है ना, सुपाडे की चमडी निचे जाने से ........"

और अपनी गांड उठा कर खचाक से एक जोरदार धक्का मारा। गीली चुत ने झट से पुरे लौडे को निगल लिया। पुरा लंड अपनी चुत में लेकर, पेटीकोट को कमर के पास समेट कर खोस लिया और चुतड उठा कर दो-तीन और धक्के लगा दिये।

राजु की समझ में खुछ नही आ रहा था। बस इतना लग रहा था जैसे उसके लौडे को किसी ने गरम भठ्ठी में डाल दिया है। गरदन उठा कर उसने देखने की कोशीश की। मामी ने अपने चुतड को पुरा उपर उठाया, चुत के रस से चमचमाता हुआ लौडा बाहर निकला, फिर तेजी के साथ मामी के गांड नीचे करते ही झांठों के जंगल में समा गया।

"शशशीईईईईईई मामी, आप ने तो अपना नीचे वाला ठीक से देखने भी नही ........ "

"बाद में ........ अभी तो नीचे आग लगी हुई है."

"हाय मामी ........ ........ दिखा देती तोओओओओओओओओओ.."

"अभी मजा आ रहा है ........ ?"

"हाय, हां, आ रहा हैएएएएए ........ !"

"तो फिर मजा लुट ना भोसडी के, देख के क्या अचार डालेगा ?"

"उफफ् मामी,,,,,,,,,,,,,,,,शीईईईईईईईई ओह, आपकी नीचेवाली तो एकदम गरम,,,,,,,।"

"हां ........ बहुत गरमी है इसमे, अभी इसकी सारी गरमी निकाल दे. फिर बाद में ........ भठ्ठी देखना,,,,,,,,,,,अभी बहुत खुजली हो रही थी, ऐसे ही चुदाई होती है समझा, पुरा मजा इसी को शीईईईईईई ........ जब चुत में लंड अन्दर बाहर होता है तभी ........ हाय पहली चुदाई है ना तेरीईईईईईईईई.."

"हां मामी ........ हाय शीईईईईईई."

"क्यों, क्या हुआ ........ ?? ........ ,शीईईईईईई.."

"ऐसा लग रहा है, जैसे उफफफ्फ्फ्, ........ जैसे ही आप नीचे आती है, एकदम से मेरे लंड की चमडी नीचे उतर जाती है ........ उफफफ्फ्फ् माआआमीईईईई बहुत गुदगुदी हो रही है"

"तेरा बहुत मोटा है, ना ........ इसलिये मेरी में एकदम चिपक कर जा रहा है "

इतना कह कर उर्मिला देवी ने खचाक-खाचाक धक्के लगाना शुरु कर दिया। चुत में लौडा ऐसे फिट हो गया था जैसे बोतल में कोर्क !!। उर्मिला देवी की चुत जो की चुद चुद के भोसडी हो गई थी, आज १० इंच मोटे लंड को खा कर अनचुदी चुत बनी हुइ थी और इठला कर, इतरा कर पानी छोड रही थी। लंड चुत की दिवारों से एकदम चिपक कर रगडता हुआ पुरा अन्दर तक घुस जाता था, और फिर उसी तरह से चुत की दिवारों को रगडते हुए सुपाडे तक सटाक से निकल कर फिर से घुसने के लिये तैयार हो जाता था। चुत के पानी छोडने के कारण लंड अब सटा-सट अन्दर बाहर हो रहा था।

राजु ने गरदन उठा कर अपना देखने की कोशिश की मगर उर्मिला देवी के धक्को की रफतार इतनी तेज और झटकेदार थी, की उसकी गरदन फिर से तकिये पर गीर गई। उर्मिला देवी के मुंह से तेज तेज सिसकारीयां निकल रही थी और वो गांड उठा उठा के तेज-तेज झटके मार रही थी। लंड सीधा उसकी बच्चेदानी पर ठोकर मार रहा था और बार बार उसके मुंह से चीख निकल जाती थी। आज उसको बहुत दिनो के बाद ऐसा अनोखा मजा आ राह था। दोनो मामी-भांजा कुतिया-कुत्ते की तरह से हांफ रहे थे और कमरे में गच-गच, फच-फच की आवाजें गुंज रही थी।

"ओहहह, ........ शीईईईईईई ........ राजु बहुत मस्त लौडा है ........ उफफफफ्फ्फ्फ्."

"हां ........ मामी ........ बहुत मजा आ रहा है ........ चुचींईईईई ???..."

"हां, हां, दबा ना, चुचीं दबा ........ बहुत दिनो के बाद ऐसा मजा आ रहा है ........ "

"सच माआमीईइ ........ आआज तो आपने स्वर्ग में पहुंचा दिया ........ "

"हाये तेरे इस घोडे जैसे लंड ने तो ........ आआआज्ज्ज्ज् मेरी बरसो की प्यास बुझाआअ ........ "

खच-खच, करता हुआ लौडा, बुर में तेजी से अन्दर बाहर हो रहा था। उर्मिला देवी की मोटी-मोटी गांड राजु के लंड पर तेजी से उछल-कूद कर रही थी। मस्तानी मामी की दोनो चुचियां राजु के हाथों में थी, और उनको अपने दोनो हाथों के बीच दबा कर मथ रहा था।

"ओह हो, राआजूऊऊऊउ बेटाआआआआ ........ मेरा निकलेगा अब श्श्श्श्शीशीईईईईईई हाये निकल जायेगा ........ ,ओओओओओओओओगगगगगगगगगग ........ (फच-फच-फच) ........ शीईईईईईईईई हायरेएएएएएए कहा था ततततततूऊऊउ ........ मजा आआआ गयाआआआ रेएएएएए, गई मैं ........ हाय आआआआआज तो चुत फाड के पानी निकाल दियाआआआ तुनेएएए ........ उफफफ्फ्.."

"हाय मामी, और तेज मारो ........ मारो और तेज ........ और जोर सेएएएएएए, उफफफफ्फ्फ्फ् बहुत गुदगुदीईइ होओओओओओओ ........ "

तभी उर्मिला देवी एक जोर की चीख मारते हुए,
" ........ शीईईईईईईईईईईई..."
करते हुए राजु के उपर ढेर हो गई। उसकी चुत ने फलफला कर पानी छोड दिया। चुत का छेद पकपकाते हुए लंड को कभी अपनी गिरफ्त में कस रहा था कभी छोड रहा था। राजु भी शायद झडने के करीब था मगर उर्मिला देवी के रुकने के कारण चुदाई रुक गई थी और वो बस कसमसा कर रह गया। उर्मिला देवी के भारी शरीर को अपनी बाहों में जकडे हुए नीचे से हल्के हल्के गांड उठा उठा कर अपने आप को सन्तुष्ट करने की कोशिश कर रहा था। मगर कहते है की थुक चाटने से प्यास नही बुजती।

राजु का लंड ऐसे तो झडने वाला नही था। हां अगर वो खुद उपर चढ कर चार पांच धक्के भी जोर से लगा देता तो शायद उसका पानी भी निकल जाता। पर ये तो उसकी पहली चुदाई थी, उसे ना तो इस बात का पता था ना ही उर्मिला देवी ने ऐसा किया। लुंड चुत के अन्दर ही फुल कर और मोटा हो गया था। दिवारों से और ज्यादा कस गया था। धीरे धीरे जब मामी की सांसे स्थिर हुई तब वो फिर से उठ कर बैठ गई और राजु के बालों में हाथ फेरते हुए उसके होठों से अपने होठों को सटा कर एक गहरा चुम्बन लिया।


"हाय ........ मामी रुक क्यों गई ? ........ और धक्का लगाओ ना ........ "

"मुझे पता है ........ तेरा अभी निकला नही है ........ मेरी तो इतने दिनो से प्यासी थी ........ की ठहर ही नही पाई ........ "

कहते हुए उर्मिला देवी थोडा सा उपर उठ गई। पक की आवाज करते हुए राजु का मोटा लौडा उर्मिला देवी की बित्ते भर की चुत से बाहर निकल गया। उर्मिला देवी जो की अभी भी पेटीकोट पहने हुई थी ने पेटीकोट को चुत के उपर दबा दिया। उसकी चुत पानी छोड रही थी और पेटीकोट को चुत के उपर दबाते हुए उसके कपडे को हल्के से रगडते हुए पानी पोंछ रही थी। अपनी दाहिनी जांघ को उठाते हुए राजु की कमर के उपर से वो उतर गई और धडाम से बिस्तर पर अपनी दोनो जांघो को फैला कर तकीये पर सर रख कर लेट गई। पेटीकोट तो पुरी तरह से उपर था ही, उसका बस थोडा सा भाग उसकी झांठो भरी चुत को ढके हुए था। वो अब झडने के बाद सुस्त हो गई थी। आंखे बन्ध थी और सांसे अब धीरे धीरे स्थिर हो रही थी।


राजु अपनी मामी के बगल में लेटा हुआ उसको देख रहा था। उसका लंड एकदम सीधा तना हुआ छत की ओर देख रहा था। लंड की नसें फुल गई थी और सुपाडा एकदम लाल हो गया था। राजु बस दो-चार धक्को का ही मेहमान था, लेकीन ठीक उसी समय मामी ने उसके लौडे को अपनी चुत से बे-दखल कर दिया था। झडने की कगार पर होने के कारण लंड फुफकार रहा था, मगर मामी तो अपना झाड कर उसकी बगल में लेटी थी।

सुबह से तरह तरह के आग भडकाने वाले कुतेव करने के कारण उर्मिला देवी बहुत ज्यादा चुदास से भरी हुइ थी. राजु का मोटा लौडा अपनी चुत में लेकार झड गई पर राजु का लंड तो एक बार चुस कर झाड चुकी थी इसलिये नही झडा। उर्मिला देवी अगर चाहती तो चार-पांच धक्के और मार कर झाड देती, मगर उसने ऐसा नही किया। क्योंकी वो राजु को तडपाना चाहती थी वो चाहती थी की राजु उसका गुलाम बन जाये। जब उसकी मरजी करे तब वो राजु से चुदवाये अपनी गांड चटवाये मगर जब उसका दिल करे तो वो राजु की गांड पे लात मार सके, और वो उसकी चुत के चक्कर में उसके तलवे चाटे, लंड हाथ में ले कर उसकी गांड के पिछे घुमे।

उर्मिला देवी की आंखे बन्ध थी और सांसो के साथ धीरे धीरे उसकी नंगी चुचियां उपर की ओर उभर जाती थी। गोरी चुचियों का रंग हल्का लाल हो गया था। निप्पल अभी भी खडे और गहरे काले रंग के भुरे थे, शायद उनमें खून भर गया था, राजु ने उनको खुब चुसा जो था। मामी का गोरा चिकना मांसल पेट और उसके बीच की गहरी नाभी ........ राजु का बस चलता तो लौडा उसी में पेल देता। बीच में पेटीकोट था और उसके बाद मामी की कन्दली के खम्भे जैसी जांघे और घुटना और मोटी पिंडीयां और पैर। मामी की आंखे बंध थी इसलिये राजु अपनी आंखे फाड फाड कर देख शकता था। वो अपनी मामी के मस्ताने रुप को अपनी आंखों से ही पी जाना चाहता था, राजु अपने हाथों से मामी की मोटी मोटी जांघो को सहलाने लगा। उसके मन में आ रहा था की इन मोटी-मोटी जांघो पर अपना लंड रगड दे और हल्के हल्के काट काट कर इन जांघो को खा जाये।

ये सब तो उसने नही किया मगर अपनी जीभ निकाल कर चुमते हुए जांघो को चाटना जरुर शुरु कर दिया। बारी-बारी से दोनो जांघो को चाटते हुए मामी की रानों की ओर बढ गया। उर्मिला देवी ने एक पैर घुटनो के पास मोड रखा था और दुसरा पैर पसार रखा था। ठीक जांघो के जोड के पास पहुंच कर हल्के हल्के चाटने लगा और एक हाथ से धीरे से पेटीकोट का चुत के उपर रखा कपडा हल्के से उठा कर चुत देखने की कोशिश करने लगा।


तभी उर्मिला देवी की आंखे खुल गई। देखा तो राजु उसकी चुत के पास झुका हुआ आंखे फाड कर देख रहा है। उर्मिला देवी के होठों पर एक मुस्कान फैल गई और उन्होंने अपनी दुसरी टांग को भी सीधा फैला दिया।

मामी के बदन में हरकत देख कर राजु ने अपनी गरदन उपर उठाई। मामी से नजर मिलते ही राजु झेंप गया। उर्मिला देवी ने बुरा-सा मुंह बना कर नींद से जागने का नाटक किया,
"ऊहहह उह, क्या कर रहा है ?"

फिर अपने दोनो पैरो को घुटनो के पास से मोड कर पेटीकोट के कपडे को समेट कर जांघो के बीच रख दिया और गरदन के पिछे तकीया लगा कर अपने आप को उपर उठा लिया और एकदम बुरा सा मुंह बनाते हुए बोली,
"तेरा काम हुआ नही क्या ? ........ नींद से जगा दिया ........ सो जा।"

राजु अब उसके एकदम सामने बैठा हुआ था। उर्मिला देवी की पुरी टांग रानो तक नंगी थी। केवल पेटीकोट समेट कर रानो के बीच में बुर को ढक रखा था।

राजु की समझ में नही आया की मामी क्या बोल रही है। वो गिगयाते हुए बोला, "मामी ........ वो ........ मैं बस जरा सा देखना ........ "

"हां, क्या देखना,,?? ........ चुत ........ ??"

"हां हां, मामी वही."

उर्मिला देवी मुंह बिचकाते हुए बोली, "क्या करेगा,,? ........ झांठ गीनेगा ?।"

राजु चौंक गया, हडबडाहट में मुंह से निकल गया, "जी,,,जी मामी ........ "

"हरामी ........ झांठ गीनेगा ?"

"ओह नही मामी, ........  प्लीज बस देखनी है ........ अच्छी तरह से ........ ,"

चुत पर रखे पेटीकोट के कपडे को एक बार अपने हाथ से उठा कर फिर से निचे रखा जैसे वो उसे अच्छी तरह से ढक रही हो और बोली,
"पागल हो गया है क्या,,? ........ जा सो जा।"

उर्मिला देवी के कपडा उठाने से चुत की झांठो की एक झलक मीली तो राजु का लौडा सिहर उठा, खडा तो था ही। उर्मिला देवी ने सामने बैठे राजु के लौडे को अपने पैर के पंजो से हल्का सी ठोकर मारी।

"बहनचोद ........ खडा कर के रखा है ........ ?"

राजु ने अपना हाथ उर्मिला देवी की जांघो पर धीरे से रख दिया, और जांघो को हल्के हल्के दबाने लगा, जैसे कोई चमचा अपना कोई काम निकलवाने के लिये किसी नेता के पैर दबाता है, और बोला,
"ओह मामी ........ बस एक बार अच्छे से दिखा दो ........ सो जाउन्गा फिर,,"

उर्मिला देवी ने राजु का हाथ जांघो पर से झटक दिया, और झीडकते हुए बोली,
छोड ........ हाथ से कर ले ........ खडा है, इसलिये तेरा मन कर रहा है ........ निकाल लेगा तो आरम से नींद आ जायेगी ........ कल दीखा दुन्गी."

"हाये नही मामी ........ अभी दीखा दो ना !"

"नही, मेरा मन नही है ........ ला हाथ से कर देती हु."

"ओह मामी ........ हाथ से ही कर देना पर ........ दिखा तो दो ........ "

अब उर्मिला देवी ने गुस्सा होने का नाटक किया।

"भाग भोसडी के ........ रट लगा रखी है दिखा दो ........ दिखा दो ........ "

"हाय मामी, मेरे लिये तो ........ हाये प्लीज ........ "

अपने पैर पर से उसके हाथो को हटाते हुए बोली,
"चल छोड, बाथरुम जाने दे."

राजु ने अभी भी उसकी जांघो पर अपना एक हाथ रखा हुआ था। उसकी समझ में नही आ रहा था की क्या करे। तभी उर्मिला देवी ने जो सवाल उससे किया उसने उसका दिमाग घुमा दिया।

"कभी किसी औरत को पेशाब करते हुए देखा है ........ ?"

"क् क् क्क्या मामी ........ ?"

"चुतीये, एक बार में नही सुनता क्या ? ........ पेशाब करते हुए देखा है ........ किसी औरत को ........ ?"

"नननही मामी ........ अभी तक तो चुत ही नही देखी ........ तो पेशाब करते हुए कहां से ?"

"ओह हां, मैं तो भुल ही गई थी ........ तुने तो अभी तक ........ चल ठीक है ........ इधर आ जांघो के बीच में ........ उधर कहां जा रहा है ........ ?"

राजु को दोनो जांघो के बीच में बुला कर मामी ने अपने पेटीकोट को अब पुरा उपर उठा दिया, गांड उठा कर उसके नीचे से भी पेटीकोट के कपडे को हटा दिया अब उर्मिला देवी पुरी नंगी हो चुकी थी। उसकी चौडी चकली झांठेदार चुत राजु की आंखो के सामने थी। अपनी गोरी रानो को फैला कर अपनी बित्ते भर की चुत की दोनो फांको को अपने हाथो से फैलाती हुई बोली,
"चल देख ........ "

राजु की आंखो में भुखे कुत्ते के जैसी चमक आ गई थी। वो आंखे फाड कर उर्मिला देवी की खुबसुरत डबल रोटी जैसी फुली हुई चुत को देख रहा था। काली काली झांठो के जंगल के बीच गुलाबी चुत।

"देख, ये चुत की फांके है, और उपर वाला छोटा छेद पेशाब वाला, और नीचे वाला बडा छेद चुदाई वाला ........ यहीं पर थोडी देर पहले तेरा लंड ........ ।"

"ओह मामी, कितनी सुंदर चुत है ........ एकदम गद्देदार फुली हुई ........ ।"

"देख, ये गुलाबी वाला बडा छेद ........ ,इसी में लौडा ........ ठहर जा, हाथ मत लगा ........ "

"ओह, बस जरा सा छु कर, ........ "

"बहनचोद ........ अभी बोल रहा था, दिखा दो ........ दिखा दो, और अब छुना है ........ ,"
कहते हुए उर्मिला देवी ने राजु के हाथो को परे धकेला।

राजु ने फिर से हाथ आगे बढाते हुए चुत पर रख दिया, और बोला,
"ओह मामी प्लीज, ऐसा मत करो, ........ ,अब नही रहा जा रहा, प्लीज ........ "

उर्मिला देवी ने इस बार उसका हाथ तो नही हटाया मगर उठ कर सीधा बैठ गई, और बोली,
"ना ........ रहने दे, छोड, तु आगे बढता जा रहा है,,,,,वैसे भी मुझे पेशाब लगी है ।"

"उफफफफफ्फ् मामी, बस थोडा सा ........ "

"थोडा सा क्या ? ........ ,मुझे बहुत जोर पेशाब लगी है ........ "

"वो नही मामी, मैं तो बस थोडा छु कर,,,,,,,"

"ठीक है, चल छु ले ........ पर एक बात बता चुत देख कर तेरा मन चाटने का नही करता ........ ?"

"चाटने का ........ ?"

"हां, चुत चाटने का ........ देख कैसी पनीया गई है ........ देख गुलाबी वाले छेद को ........ ठहर जा पुरा फैला कर दीखाती हुं ........ देख अन्दर कैसा पानी लगा है ........ इसको चाटने में बहुत मजा आता है ........ चाटेगा ........ ? चल आ जा ........ "

और बिना कुछ पुछे उर्मिला देवी ने राजु के सिर को बालों से पकड कर अपनी चुत पर झुका दिया।

राजु भी मस्तराम की किताबों को पढ कर जानता तो था ही की चुत चाटी और चुसी जाती है, और इनकार करने का मतलब नही था. क्या पता मामी फिर इरादा बदल दे ?

इसलिये चुपचाप मामी की दोनो रानो पर अपने हाथो को जमा कर अपनी जीभ निकाल कर चुत के गुलाबी होठों को चाटने लगा। उर्मिला देवी उसको बता रही थी की कैसे चाटना है ।

"हां, पुरी चुत पर उपर से नीचे तक जीभ फिरा के चाट ........ । हां, ऐसे ही शशशशशीईई ईईईईईईई ठीक इसी तरह से, हांआआ, उपर जो दाने जैसा दिख रहा है ना, सो चुत का भगनशा है ........ उसको अपनी जीभ से रगडते हुए हल्के हल्के चाट ........ शशश शशीईईईईईईईईई शाबाश ........ बहनचोद, टीट को मुंह मेअं लेएएएए।"

राजु ने बुर के भगनशे को अपने होठों के बीच ले लिया और चुसने लगा। उर्मिला देवी की चुत, टीट-चुसाई पर मस्त हो कर पानी छोडने लगी। पहली बार चुत चाटने को मीली थी, तो पुरा जोश दिखा रहा था। जंगली कुत्ते की तरह लफड-लफड करता हुआ अपनी खुरदरी जीभ से मामी की चुत को घायल करते हुए चाटे जा रहा था। चुत की गुलाबी पंखुडीयों पर खुरदरी जीभ का हर प्रहार उर्मिला देवी को अच्छा लग रहा था। वो अपने बदन के हर अंग को रगडवाना चाहती थी, चाहती थी की राजु पुरी चुत को मुंह में भर ले और स्लररप स्लररप करते हुए चुसे।

राजु के सर को अपनी चुत पर और कस के दबा कर सिसयायी,
"ठीक से चुअस ........ राजु बेटा ........ पुरा मुंह में ले कर ........ हां ऐसे ही ........ शशश शशीईईईईईईईईई मादरचोद्द्द्द्द्द ........ बहुत मजा दे रहा है। हाये ........ ........ आआआअह्हाआअ, ........ सही चुस रहा है कुत्तेएएएएए, हांआआ ऐसे ही चूऊउस ........ एएएस्स्स्स्सेएएए ही."

राजु भी पुरा ठरकी था। इतनी देर में समझ गया था की, उसकी मामी एक नंबर की चुदैल, रण्डी, मादरचोद किस्म की औरत है। साली छीनाल चुत देगी, मगर तडपा-तडपा कर।

वैसे उसको भी मजा आ रहा था, ऐसे नाटक करने में। उसने बुर की दोनो फांको को अपनी उन्गलियों से फैला कर पुरा चीडोर दिया, और जीभ को नुकीला कर के गुलाबी छेद में डाल कर घुमाने लगा। चुत एकदम पसीज कर पानी छोड रही थी। नुकीली जीभ को चुत के गुलाबी छेद में डाल कर घुमाते हुए चुत की दिवारों से रीस रहे पानी को चाटने लगा।

उर्मिला देवी मस्त हो कर गांड हवा में लहरा रही थी। अपने दोनो हाथो से चुचियों को दबाते हुए, राजु के होथों पर अपनी फुद्दी को रगडते हुए चिल्लायी,
"ओह राजु ........ मेरा बेटाआआ ........ बहुत मजा आ रहा है, रेएएए ........ ऐसे ही चाट ........ पुरी बुर चाट ले, ........ तुने तो फिर से चुदास से भर दिया ........ हरामी ठीक से पुरा मुंह लगा कर चाआट नही तो मुंह में ही मुत दुन्गीईईइ ........ अच्छी तरह से चाआट ........ "

ये अब एकदम नये किस्म की धमकी थी। राजु एकदम आश्चर्यचकित हो गया। अजीब कमजर्फ, कमीनी औरत थी। राजु जहां सोचता था अब मामला पटरी पर आ गया है, ठीक उसी समय कुछ नया शगुफा छोड देती थी।

चुत पर से मुंह हटा दिया और बोला,
"ओह मामी ........ तुमको पेशाब लगी है, तो जाओ कर आओ ........ "

चुत से मुंह हट ते ही उर्मिला देवी का मजा कीरकीरा हुआ. राजु के बालो को पकड लिया, और गुस्से से भनभनाती हुई उसको जोर से बिस्तर पर पटक दिया, और छाती पर चड कर बोली,
"चुप मादरचोद ........ अभी चाट ठीक से ........ अब तो तेरे मुंह में ही मुतुंगी ........ पेशाब करने जा रही थी, तब क्यों रोकाआ था ........ ?"

कहते हुए अपनी बुर को राजु के मुंह पर रख कर जोर से दबा दिया। इतनी जोर से दबा रही थी, की राजु को लग रहा था की उसका दम घुट जायेगा। दोनो चुतड के नीचे हाथ लगा कर किसी तरह से उसने चुत के दबाव को अपने मुंह पर से कम किया, मगर उर्मिला देवी तो मान ही नही रही थी। चुत फैला कर ठीक पेशाब वाले छेद को राजु के होठों पर दबा दिया, और रगडते हुए बोली,
"चाट ना ........ !!? ........ चाट जरा मेरी पेशाब वाली छेद को ........ नही तो अभी मुत दुन्गी तेरे मुंह पर,,,,,,,,,हरामी,,,,,,,,,,कभी किसी औरत को मुत ते हुए नही देखा है ना ?,,,,,,,, अभी दिखाती हु, तुझे."

और सच में एक बुंद पेशाब टपका दिया,,,,,,,,,,अब तो राजु की समझ में नही आ रहा था की क्या करें कुछ बोला भी नही जा रहा था। राजु ने सोचा साली ने अभी तो एक बुंद ही मुत पिलाया है, पर कहीं अगर कुतिया ने सच में पेशाब कर दिया तो क्या करुन्गा ?? चुप-चाप चाटने में ही भलाई है, ऐसे भी पुरी बुर तो चटवा ही रही है। पेशाब वाले छेद को मुंह में भर कर चाटने लगा। बुर के भगनशे को भी अपनी जीभ से छेडते हुए चाट रहा था।

पहले तो थोडी घिन्न सी लगी थी मगर फिर राजु को भी मजा आने लगा। अब वो बडे आराम से पुरी फुद्दी को चाट रहा था। दोनो हाथो से गुदाज चुतडो को मसलते हुए बुर का रस चख रहा था।

उर्मिला देवी अब चुदास से भर चुकी थी,
"उफफफ्फ् ........ शीईईईईई बहुत ........ मजा, ........ हाय रेएएएएएएए तुने तो खुजली बढा दी, कंजरे ........ अब तो फिर चुदवाना पडेगा ........ भोसडी के, लौडा खडा है की, ?!"

राजु जल्दी से चुत पर से मुंह हटा कर बोला.
"ख्...खडा है, मामी ........ एकदम खडा हैएएएएएए.."

"कैसे चोदना है ?? ........ चल छोड मैं खुद, ........ "

"हाय, नही मामी ........ ,इस बाआर ........ ,मैं ........ "

"फिर आजा मां के लौडे ........ ,जल्दी से ........ बहुत खुजली हो ........ ",
कहते हुए उर्मिला देवी नीचे पलंग पर लेट गई। दोनो टांग घुटनो के पास से मोड कर जांघ फैला दी, चुत की फांको ने अपना मुंह खोल दिया था।

राजु लंड हाथ में लेकर जल्दी से दोनो जांघो के बीच में आया, और चुत पर लगा कर कमर को हल्का सा झटका दिया। लंड का सुपाडा उर्मिला देवी की भोसडी में घुस गया। सुपाडा घुसते ही उर्मिला देवी ने अपनी गांड उचका दी। मोटा पहाडी आलु जैसा सुपाडा पुरा घुस चुका था। मामी की फुद्दी एकदम गरम भठ्ठी की तरह थी। चुत की गरमी को पाकर राजु का लौडा फनफना गया।

' मस्तराम ' को याद करते हुए उसने पानी छोड रही चुत में लंड को गांड तक का जोर लगा कर ठेला। लंड कच से मामी की बुर में फिसलता चला गया। कुंवारी लौंडिया होती तो शायद रुकता, मगर यह तो उर्मिला देवी की सेंकडो बार चुदी चुत थी, जिसकी दिवारों ने आराम से रास्ता दे दिया। उर्मिला देवी को लगा जैसे किसी ने उसकी चुत में मोटा लोहे का डन्डा गरम करके डाल दिया हो। लंड चुत के आखीरी कोने तक पहुंच कर ठोकर मार रहा था।

उफफफफ्फ्फ्,....हरामी, आराम से नहीं डाल सकता था ? ........ एक बार में ही पुराआआआ ........ "

आवाज गले में ही घुट के रह गई, क्योंकि ठरकी राजु अब नही रुकने वाला था। गांड उछाल उछाल कर पका-पक लंड पेले जा रहा था। मामी की बातों को सुन कर भी उनसुनी कर दी। मन ही मन उर्मिला देवी को गाली दे रहा था,
" ........ साली कुतिया ने इतना नाटक करवाया है ........ बहन की लौडी ने ........ अब इसकी बातों को सुन ने का मतलब है, फिर कोई नया नाटक खडा कर देगी ........ ,जो होगा बाद में देखुन्गा ........ ,पहले लंड का माल इसकी चुत में निकाल दुं, ........ "

सोचते हुए धना-धन गांड उछाल-उछाल कर पुरे लंड को सुपाडे तक खींच कर चुत में डाल रहा था। कुछ ही देर में चुत की दिवारों से पानी का सैलाब बहने लगा। लंड अब सटा-सट फच-फच की आवाज करते हुए अन्दर बाहर हो रहा था। उर्मिला देवी भी बेपनाह मजे में डुब गई। राजु के चेहरे को अपने हाथो से पकड उसके होठों को चुम रही थी, राजु भी कभी होठों कभी गालो को चुमते हुए चोद रहा था।

उर्मिला देवी के मुंह से सिसकारीयां निकल रही थी,,,,,,,,
"शीईईईईईईईई ........ आईईईईईई ........ और जोर सेएएएएएएएएए राजु ........ उफफफफ्फ्फ् बहुत मजा आआआककक्क्क्क्क्, ........ फाआआड देएएएएएगाआआ, ........ ,उफफफफ्फ्फ् मादरच्,,"

"उफफफफ्फ्फ् मामी, बहुत मजा आ रहा हैएएएए ........ "

"हां, राजु बहुत मजा आ रहा है ........ ,ऐसे ही धक्के माआर ........ बहुत मजा दे रहा तेरा हथियार ........ हाआये शीईईईईई चोद्, ........ अपने घोडे जैसे ........ लंड सेएएएएए"

तभी राजु ने दोनो चुचियों को हाथो में भर लिया, और खुब कस कर दबाते हुए एक चुंची को मुंह में भर लिया, और धीरे धीरे गांड उछालने लगा। उर्मिला देवी को अच्छा तो लगा मगर उसकी चुत पर तगडे धक्के नही पड रहे थे।

"मादरचोद, रुकता क्यों है ? दुध बाद में पीना, पहले गांड तक का जोर लगा के चोद."

"हाये मामी, थोडा दम तो लेने दो ........ ,पहली बार, ........ ?"

"चुप हरामी ........ गांड में दम नही, ........ तो चोदने के लिये क्यों मर रहा था ? ........ मामी की चुत में मजा नही आ रहा क्या ........ ?"

"ओह्ह्हह मामी, मेरा तो सपना सच हो गयाआ ........ हर रोज सोचता था कैसे आपको चोदु ?! आज ........ मामी ........ ओह मामी ........ ,बहुत मजा आ रहा हैएएएएए ........ बहुत गरम हैएएएएए आपकी चुत."

"हां, गरम और टाईट भी है ........ चोदो ........ आह्ह्ह ........ चोदो अपनी इस चुदासी मामी को ओह्ह्ह्ह ........ बहुत तडपी हुं ........ मोटा लौडा खाने के लिये ........ तेरा मामा, बहन का लौडा तो बस्सस ........ तु ........ ,अब मेरे पास ही रहेगा ........ तेरी मां चाहे गांड मरा ले, मगर उसके पास नही भेजने वाली ........ यहीं पर अपनी जांघो के बीच में दबोच कर रखुन्गी ........ "

"हां मामी, अब तो मैं आपको छोड कर जाने वाला नहीईईई ........ ओह मामी, सच में चुदाई में कितना मजा है ........ गांव में मां के पास कहां से ऐसा मजा मिलेगा ........ हाय मामी देखो ना कितने मजे से मेरा लंड आपकी चुत में जा रहा है और आप उस समय बेकार में चील्ला ........ ?

"भोसडी के लंड वाला है ना, तुझे क्या पता ........ इतना मोटा लौडा किसी कुंवारी लौंडिया में घुसा देता तो ........ अब तक बेहोश ........ ,मेरे जैसी चुतमरानी औरत को भी एक बार ........ बहुत मस्त लौडा है ऐसे ही पुरा जड तक ठेल ठेल कर चोद आआआआ ........ शीईईईईईईईईई बहनचोद्द्द्द्द्द्द ........ तु तो पुरा खिलाडी हो,,,,,"

लंड फच फच करता हुआ चुत के अन्दर बाहर हो रहा था। उर्मिला देवी गांड उछाल उछाल कर लौडा ले रही थी। उसकी बहकी हुई चुत को मोटे १० इंच के लंड का सहारा मील गया था। चुत इतरा-इतरा कर लंड ले रही थी।

राजु का लंड पुरा बाहर तक निकल जाता था, और फिर कच से चुत की गुलाबी दिवारों को रौंदता हुआ सीधा जड तक ठोकर मारता था। दोनो अब हांफ रहे थे। चुदाई की रफतार में बहुत ज्यादा तेजी आ गई थी। चुत की नैया अब किनारा खोज रही थी।

उर्मिला देवी ने अपने पैरो को राजु की कमर के इर्द गीर्द लपेट दिया था और गांड उछालते हुए सिसकाते हुए बोली,
"शीईईईईई राजा अब मेरा निकल जायेगा ........ जोर जोर से चोद ........ पेलता रह ........ तेरी मां को चोदु ........ मार जोर शीईईईईई ........ निकाल दे, अपना माआआल्ल अपनी मामी की चुत के अन्दर ........ ओह ओहहहहह्ह्ह्ह्ह?

"हाये मामीईई, मेरा भी निकलेगा शीईईईईईईईईई तुम्हारी बूऊऊर में डाल दुन्गाआआ ........ मेरे लौडे काआआ पानीईईई ........ ओह मामीईईईइ...। हायेएएए,,,,,,,,,मामी चुतमरानी,,,,,,,उफफफफ्फ्फ्।"

"हाये मैं गईईईईईईई, ओह आआअहहह्ह्हाआआ शीईईईइए....",
करते हुए उर्मिला देवी ने राजु को अपनी बाहों में कस लिया, उसकी चुत ने बहुत सारा पानी छोड दिया। राजु के लंड से तेज फुव्वारे की तरह से पानी निकलने लगा। उसकी कमर ने एक तेज झटका खाया और लंड को पुरा चुत के अन्दर पेल कर वो भी हांफते हुए ओहहहह्ह्ह्ह्ह्ह करते हुए झडने लगा। लंड ने चुत की दिवारों को अपने पानी से सरोबर कर दिया। दोनो मामी-भांजा एक दुसरे से पुरी तरह से लिपट गये। दोनो पसीने से तर-बतर एक दुसरे की बाहों में खोये हुए बेशुध हो गये।

करीब पांच मीनट तक इसी अवस्था में रहने के बाद जैसे उर्मिला देवी को होश आया उसने राजु को कन्धो के पास से पकड कर हिलाते हुए उठाया,
"राजु उठ,,,,,मेरे उपर ही सोयेगा क्या ?"

राजु जैसे ही उठा पक की आवाज करते हुए उसका मोटा लौडा चुत में से निकल गया। वो अपनी मामी के बगल में ही लेट गया। उर्मिला देवी ने अपने पेटीकोट से अपनी चुत पर लगे पानी पोंछा और उठ कर अपनी चुत को देखा तो उसकी की हालत को देख कर उसको हसी आ गई। चुत का मुंह अभी भी थोडा सा खुला हुआ था। उर्मिला देवी समझ गई की राजु के हाथ भर के लंड ने उसकी चुत को पुरा फैला दिया है। अब उसकी चुत सच में भोसडा बन चुकी है और वो खुद भोसडेवाली। माथे पर छलक आये पसीने को वहीं रखे टोवेल से पोंछने के बाद उसी टोवेल से राजु के लंड को बडे प्यार से साफ कर दिया।"

राजु मामी को देख रहा था। उर्मिला देवी की नजरे जब उस से मीली तो वो उसके पास सरक गई, और राजु के माथे का पसीना पोंछ कर पुछा,
"मजा आया ........ ?"

राजु ने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "हां मामी ........ बहुत !!!।"

अभी ठीक ५ मीनट पहले रण्डी के जैसे गाली गलोच करने वाली बडे प्यार से बाते कर रही थी।

"थक गया क्या ? ........ सो जा, पहली बार में ही तुने आज इतनी जबरदस्त मेहनत की है, जीतनी तेरे मामा ने सुहागरात को नही की होगी."

राजु को उठता देख बोली, "कहां जा रहा है ?"

"अभी आया मामी ........ । बहुत जोर की पेशाब लगी है."

"ठीक है, मैं तो सोने जा रही हु ........ अगर मेरे पास सोना है, तो यहीं सो जाना नही तो अपने कमरे में चले जाना ........ केवल जाते समय लाईट ओफ कर देना."

पेशाब करने के बाद राजु ने मामी के कमरे की लाईट ओफ की, और दरवाजा खींच कर अपने कमरे में चला गया। उर्मिला देवी तुरंत सो गई, उन्होंने इस ओर ध्यान भी नही दिया। अपने कमरे में पहुंच कर राजु धडाम से बिस्तर पर गिर पडा, उसे जरा भी होश नही था।

सुबह करीब सात बजे की उर्मिला देवी की नींद खुली। जब अपने नंगेपन का अहसास हुआ, तो पास में पडी चादर खींच ली। अभी उसका उठने का मन नही था। बन्ध आंखो के नीचे रात की कहानी याद कर, उनके होठों पर हल्की मुस्कुराहट फैल गई। सरा बदन गुद-गुदा गया। बिती रात जो मजा आया, वो कभी ना भुलने वाला था। ये सब सोच कर ही उसके गालो में गड्ढे पड गये, की उसने राजु के मुंह पर अपना एक बुंद पेशाब भी कर दिया था। उसके रंगीन सपने साकार होते नजर आ रहे थे।

उपर से उर्मिला देवी भले ही कितनी भी सीधी सादी और हसमुख दिखती थी, मगर अन्दर से वो बहुत ही कामुक-कुत्सीत औरत थी। उसके अन्दर की इस कामुकता को उभारने वाली उसकी सहेली हेमा शर्मा थी। जो अब उर्मिला देवी की तरह ही एक शादी शुदा औरत थी, और उन्ही के शहर में रहती थी।

हेमा, उर्मिला देवी के कोलेज के जमाने की सहेली थी। कोलेज में ही जब उर्मिला देवी ने जवानी की दहलीज पर पहला कदम रखा था, तभी उनकी इस सहेली ने जो हर रोज अपने चाचा-चाची की चुदाई देखती थी, उनके अन्दर काम-वासना की आग भडका दी। फिर दोनो सहेलीयां एक दुसरे के साथ लिपटा-चीपटी कर तरह-तरह के कुतेव करती थी, गन्दी-गन्दी किताबे पढती थी, और शादी के बाद अपने पतियों के साथ मस्ती करने के सपने देखा करती।

हेमा का तो पता नही, मगर उर्मिला देवी की किस्मत में एक सीधा सादा पति लिखा था, जिसके साथ कुछ दिनो तक तो उन्हे बहुत मजा आया मगर, बाद में सब एक जैसा हो गया। और जब से लडकी थोडी बडी हो गई राजु का मामा हफ्ते में एक बार नियम से उर्मिला देवी की साडी उठाता लंड डालता धकाम पेल करता, और फिर सो जाता।

उर्मिला देवी का गदराया बदन कुछ नया मांगता था। वो बाल-बच्चे, घर-परिवार सब से निश्चिंत हो गई थी. सब कुछ अपनी रुटीन अवस्था में चल रहा था। ऐसे में उसके पास करने धरने के लिये कुछ नही था, और उसकी कामुकता अपने उफान पर आ चुकी थी। अगर पति का साथ मील जाता तो फिर ........ मगर उर्मिला देवी की किस्मत ने धोखा दे दिया। मन की कामुक भावनाओं को बहुत ज्यादा दबाने के कारण, कोमल भावनायें कुत्सीत भावनाओं में बदल गई थी। अब वो अपने इस नये यार के साथ तरह-तरह के कुतेव करते हुए मजा लुटना चाहती थी।

आठ बजने पर बिस्तर छोडा, और भाग कर बाथरुम में गई. कमोड पर जब बैठी और चुत से पेशाब की धारा निकलने लगी, तो रात की बात फिर से याद आ गई और चेहरा शरम और मजे की लाली से भर गया। अपनी चुदी चुत को देखते हुए, उनके चेहरे पर मुस्कान खेल गई की, कैसे रात में राजु के मुंह पर उन्होंने अपनी चुत रगडी थी, और कैसे लौंडे को तडपा तडपा कर अपनी चुत की चटनी चटाई थी।

नहा धो कर, फ्रेश हो कर, निकलते निकलते ९ बज गये, जल्दी से राजु को उठाने उसके कमरे में गई, तो देखा लौंडा बेशुध होकर सो रहा है। थोडा सा पानी उसके चेहरे पर डाल दिया।

राजु एकदम से हडबडा कर उठता हुआ बोला, "पेशशशा ........ मत् ........ ।"

आंखे खोली तो सामने मामी खडी थी। वो समझ गई की, राजु शायद रात की बातो को सपने में देख रहा था, और पानी गीरने पर उसे लगा शायद मामी ने उसके मुंह पर फिर से कर दिया। राजु आंखे फाड कर उर्मिला देवी को देख रहा था।

"अब उठ भी जाओ ........ ९ बज गये है, अभी भी रात के ख्वाबो में डुबे हो क्या ........ "

फिर उसके शोर्टस् के उपर से लंड पर एक ठुंकी मारती हुई बोली,
"चल, जल्दी से फ्रेश हो जा.."

उर्मिला देवी कीचन में नास्ता तैयार कर रही थी। बाथरुम से राजु अभी भी नही निकला था।

"अरे जल्दी कर ........ नास्ता तैयार है ........ इतनी देर क्यों लगा रहा है बेटा ........ ?"

ये मामी भी अजीब है। अभी बेटा, और रात में क्या मस्त छिनाल बनी हुई थी। पर जो भी हो बडा मजा आया था। नास्ते के बाद एक बार चुदाई करुन्गा तब कही जाउन्गा।

ऐसा सोच कर राजु बाथरुम से बाहर आया तो देखा मामी डाईनींग टेबल पर बैठ चुकी थी। राजु भी जल्दी से बैठ गया और नास्ता करने लगा। कुछ देर बाद उसे लगा, जैसे उसके शोर्टस् पर ठीक लंड के उपर कुछ हरकत हुई। उसने मामी की ओर देखा, उर्मिला देवी हल्के हल्के मुस्कुरा रही थी। नीचे देखा तो मामी अपने पैरो के तलवे से उसके लंड को छेड रही थी।

राजु भी हस पडा और उसने मामी के कोमल पैरो को, अपने हाथो से पकड कर उनके तलवे ठीक अपने लंड के उपर रख कर, दोनो जांघो के बीच जकड लिया। दोनो मामी-भांजे हस पडे। राजु ने जल्दी जल्दी ब्रेड के टुकडो को मुंह में ठुसा और हाथो से मामी के तलवे को सहलाते हुए, धीरे-धीरे उनकी साडी को घुटनो तक उपर कर दिया। राजु का लंड फनफना गया था। उर्मिला देवी लंड को तलवे से हल्के हल्के दबा रही थी। राजु ने अपने आप को कुर्सी पर एडजस्ट कर, अपने हाथो को लम्बा कर, साडी के अन्दर और आगे की तरफ घुसा कर जांघो को छुते हुए सहलाने की कोशिश की।

उर्मिला देवी ने हस्ते हुए कहा,
"उईइ क्या कर रहा है ? ........ कहां हाथ ले जा रहा है ........ ??"

"कोशिश कर रहा हुं, कम से कम उसको छु लु, जिसको कल रात आपने बहुत तडपा कर् छुने दिया.."

"अच्छा, बहुत बोल रहा है ........ रात में तो मामी ........ ,मामी कर रहा था.."

"कल रात में तो आप एकदम अलग तरह से बीहेव कर रही थी.."

"शैतान, तेरे कहने का क्या मतलब है, कल रात मैं तेरी मामी नही थी तब.."

"नहीं मामी तो आप मेरी सदा रहोगी, तब भी और अब भी मगर ....."

"तो रात वाली मामी अच्छी थी, या अभी वाली मामी.....?"

"मुझे तो दोनो अच्छी लगती है ........ पर अभी जरा रात वाली मामी की याद आ रही है.",
कहते हुए राजु कुर्सी के नीचे खिसक गया, और जब तक उर्मिला देवी,
"रुक, क्या कर रहा है ?"
कहते हुए रोक पाती, वो डाईनींग टेबल के नीचे घुस चुका था और उर्मिला देवी के तलवो और पींडलीयों चाटने लगा था। उर्मिला देवी के मुंह सिसकारी निकल गई. वो भी सुबह से गरम हो चुकी थी।

"ओये ........ क्या कर रहा है ? ........ नास्ता तो कर लेने दे ........ "

'''पच्च पच्च, ........ओह, तुम नास्ता करो मामी. मुझे अपना नास्ता कर लेने दो."

"उफफफ्फ् ........ मुझे बाजार जाना है. अभीईई छोड दे ........ बाद मेंएएए ........ "

उर्मिला देवी की आवाज उनके गले में ही रह गई। राजु अब तक साडी को जांघो से उपर तक उठा कर उनके बीच घुस चुका था। मामी ने आज लाल रंग की पेन्टी पहन रखी थी। नहाने के कारण उनकी स्कीन चमकीली और मख्खन के जैसी गोरी लग रही थी, और भीनी भीनी सुगंध आ रही थी। राजु गदराई गोरी जांघो पर पुच्चीयां काटता हुआ आगे बढा, और पेन्टी के उपर एक जोरदार चुम्मी ली।

उर्मिला देवी ने मुंह से, "आऊचाआ ........ ऐस्स्सेएएए क्या कर रहा है ?, निकल।"

"मामीईइ, ........ मुझे भी ट्युशन जानाआ है ........ पर अभी तो तुम्हारा फ्रुट ज्युस पी कर हीईइ ........ ,"

कहते हुए राजु ने पुरी चुत को पेन्टीके उपर से अपने मुंह भर कर जोर से चुसा।

"इसससस् ........ एक ही दिन में ही उस्ताददद,,,,बन गया हैएएए ........ चुत काआ पानी फ्रुट ज्युस लगता हैएएएएएए !!! ........ उफफ ........ पेन्टीई मत उताररररा,,,,"

मगर राजु कहां मान ने वाला था। उसके दिल का डर तो कल रात में ही भाग गया था। जब वो उर्मिला देवी के बैठे रहने के कारण पेन्टी उतारने में असफल रहा, तो उसने दोनो जांघो को फैला कर चुत को ढकने वाली पट्टी के कीनारे को पकड खींचा और चुत को नंगा कर उस पर अपना मुंह लगा दिया। झांटो से आती भीनी-भीनी खुश्बु को अपनी सांसो मे भरता हुआ, जीभ निकाल चुत के भगनसे को भुखे भेडीयें की तरह काटने लगा।

फिर तो उर्मिला देवी ने भी हथीयार डाल दिये, और सुबह-सुबह ब्रेकफास्ट में चुत चुसाई का मजा लेने लगी। उनके मुंह से सिसकारीयां फुटने लगी। कब उन्होंने कुर्सी पर से अपनी गांड उठाई, कब पेन्टी नीकाली, और कब उनकी जांघे फैल गई, उसका उन्हे पता भी न चला। उन्हे तो बस इतना पता था, की उनकी फैली हुइ चुत के मोटे मोटे होठों के बीच राजु की जीभ घुस कर उनकी बुर की चुदाई करीरही थी. और उनके दोनो हाथ उसके सिर के बालो में घुम रहे थे और उसके सिर को जीतना हो सके अपनी चुत पर दबा रहे थे।

थोडी देर की चुसाई-चटाई में ही उर्मिला देवी पस्त होकर झड गई, और आंख मुंदे वहीं कुर्सी पर बैठी रही। राजु भी चुत के पानी को पी कर अपने होठों पर जीभ फेरता जब डाईनींग टेबल के नीचे से बाहर नीकला तब उर्मिला देवी उसको देख मुस्कुरा दी और खुद ही अपना हाथ बढा कर उसके शोर्टस् को सरका कर घुटनो तक कर दिया।

"सुबह सुबह तुने ........ ये क्या कर दिया ........ !?", कहते हुए उसके लंड पर मुठ लगाने लगी।

"ओह मामी, मुठ मत लगाओ ना ........ चलो बेडरुम में डालुन्गा।"

"नही, कपडे खराब हो जायेन्गे ........ चुस कर निकाल ........ "

और गप से लंड के सुपाडे को अपने गुलाबी होठों के बीच दबोच लिया। होठों को आगे पीछे करते हुए लंड को चुसने लगी। राजु मामी के सिर को अपने हाथो से पकड कर हल्के हल्के कमर को आगे पीछे करने लगा। तभी उसके दिमाग में आय की क्यों ना पिछे से लंड डाला जाये, कपडे भी खराब नही होंगे।

"मामी, पिछे से डालु  ,कपडे खराब नही होन्गे,,,।"

लंड पर से अपने होठों को हटा कर, उसके लंड को मुठीयाते हुए बोली,
"नही, बहुत टाईम लग जायेगा,,,,,,,,,रात में पिछे से डालना"

राजु ने उर्मिला देवी के कन्धो को पकड कर उठाते हुए कहा,
"प्लीज मामी,,,,,,,,,,,,उठो ना, चलो उठो,,,,,,,,,,"

"अरे, नही रे बाबा,,,,,,,मुझे मारकेट भी जाना है,,,,,,,,ऐसे ही देर हो गई है,,,,,,,,,"

"ज्यादा देर नही लगेगी, बस दो मीनट,,,,,,,"

"अरे नही रे, तु छोड दे, मेरा काम तो वैसे भी हो,,,,,,,,,"

"क्या मामी ???,,,,,,,,,,थोडा तो रहम करो,,,,,,,,,,,,हर समय क्यों तडपाती...?"

"तु मानेगा नही,,,,,,,,"

"ना, बस दो मीनट दे दो,,,,,,,,,"

"ठिक है, दो मीनट में नही निकला तो खुद अपने हाथ से करना,,,,,,,,मैं नही रुकने वाली."

उर्मिला देवी उठ कर, डाईनींग टेबल के सहारे अपने चुतडों को उभार कर घोडी बन गई। राजु पिछे आया, और जल्दी से उसने मामी की साडी को उठा कर कमर पर कर दिया। पेन्टी तो पहले ही खुल चुकी थी। उर्मिला देवी की मख्खन मलाई सी, चमचमाती गोरी गांड राजु की आंखो के सामने आ गई। उसके होश फखता हो गये।

ऐसे खुबसुरत चुतड तो शायद उन अंग्रेजनो के भी नही थे, जिनको उसने अंग्रेजी फिल्मो में देखा था। उर्मिला देवी अपने चुतडो को हिलाते हुए बोली,
"क्या कर रहा है ?, जल्दी कर देर हो रही है,,,,,,,,,।"

चुतड हिलाने पर थल-थला गये। एकदम गुदाज और मांसल चुतड, और उनके बीच की खाई। राजु का लंड फुफकार उठा।

"मामी,,,,,,,आपने रात में अपना ये तो दीखाया ही नही,,,,,,,उफफ्, कीतना सुंदर है मामी,,,,,,,,,!!!।"

"जो भी देखना है, रात में देखना पहली रात में क्या तुझ्से गांड भी,,?,,,,,,,तुझे जो करना है, जल्दी कर,,,,,,,,,,,"

"ओह, शीईईईईई मामी, मैं हंमेशा सोचता था, आप का पिछवाडा कैसा होगा। जब आप चलती थी और आपके दोनो चुतड जब हीलते थे. तो दिल करता था की उनमे अपने मुंह को घुसा कर रगड दु,,,,,,उफफफ् !!!"

"ओह होओओओओओओओ,,,,,,,,जल्दी कर ना,,,,,,,,"
कह कर चुतडो को फिर से हिलाया।

"चुतड पर एक चुम्मा ले लुं,,,,,,,?"

"ओह हो, एकदम कमीना है तु,,,,,,,जो भी करना है, जल्दी कर. नही तो मैं जा रही हुं,,,,,"

राजु तेजी के साथ नीचे झुका, और पच पच करते हुए चुतडो को चुमने लगा। दोनो मांसल चुतडो को अपनी मुठ्ठी में ले कर मसलते हुए, चुमते हुए, चाटने लगा। उर्मिला देवी का बदन भी सिहर उठा। बिना कुछ बोले उन्होंने अपनी टांगे और फैला दी।

राजु ने दोनो चुतडो को फैला दिया, और उसके बीच की खाई में भुरे रंग की मामी की गोल सीकुडी हुई गांड का छेद नजर आ गया। दोनो चुतडो के बीच की खाई में जैसे ही राजु ने हल्के से अपनी जीभ चलायी। उर्मिला देवी के पैर कांप उठे। उसने कभी सोचा भी नही था, की उसका ये भांजा इतनी जल्दी तरक्की करेगा।

राजु ने देखा की चुतडो के बीच जीभ फिराने से गांड का छेद अपने आप हल्के हल्के फैल्ने और सीकुडने लगा है, और मामी के पैर हल्के-हल्के थर-थरा रहे थे।

"ओह मामी, आपकी गांड कितनी,,,???,,,,,,,,उफफफफ्फ्फ् कैसी खुशबु है ?,,,, 'पच'."

इस बार उसने जीभ को पुरी खाई में उपर से नीचे तक चलाया, और गांड के सीकुडे हुए छेद के पास ला कर जीभ को रोक दिया और कुरेदने लगा।

उर्मिला देवी के पुरे बदन में सनसनी दौड गई। उसने कभी सपने में भी नही सोचा था, की घर में बैठे बीठाये उसकी गांड चाटने वाला मिल जायेगा। मारे उत्तेजना के उसके मुंह से आवज नही निकल रही थी। गु गु की आवाज करते हुए, अपने एक हाथ को पिछे ले जा कर, अपने चुतडो को खींच कर फैलाया।

राजु समझ गया था की मामी को मजा आ रहा है, और अब समय की कोई चिन्ता नही है। उसने गांड के छेद के ठीक पास में दोनो तरफ अपने दोनो अंघुठे लगाये, और छेद को चौडा कर जीभ नुकीली कर के पेल दी। गांड के छेद में जीभ चलाते हुए चुतडो पर हल्के हल्के दांत भी गडा देता था। गांड की गुदगुदी ने मामी को एकदम बेहाल कर दिया था। उनके मुंह से सिसकारीयां निकलने लगी,
"ओह राजु, क्या कर रहा है, बेटा ??,,,,,,,उफफफ्फ्,,,,,,,,मुझे तो लगता था तुझे कुछ भी नही,,,,,,पगले, शशशशीईईईईईईईई उफफफफ गाआंड चाआट्ट रहा हैएएएए,,,,,,मेरी तो समझ में नहीईई,,,,,,,,।"

समझ में तो राजु के भी कुछ नही आ रहा था मगर गांड पर चुम्मीया काटते हुए बोला,
" पच्च पच्च,,,,मामी शीईईईईई,,,,,,,मेरा दिल तो आपके हर अंग को चुमने और चाटने को करता है,,,,,,आप इतनी खुबसुरत हो,,,मुझे नही पता था गांड चाटी जाती है या नहीई,,,,,,हो सकता है नही चाटी जाती होगी मगर,,,,,,मैं नही रुक सकता,,,,,,,मैं तो इसको चुमुन्गा और चाट कर खा जाउन्गा, जैसे आपकी चुत,,,,।"

"शीईईई,,,,,,,एक दिन में ही तु कहां से कहां पहुंच गया ?,,,,,उफफफ्फ् तुझे अपनी मामी की गांड इतनी पसंद है तो चाट,,,,,,चुम,,,,,,उफफफ शीईईईईई राजु बेटा,,,,,,बात मत कर,,,,,मैं सब समझती हु,,,,,,,तु जो भी करना चाहता है करता रह,,,,,,,कुत्तेएएए,,,,,,,गांड में ऐसे ही जीभ पेल कर चाटट्ट्ट्ट्।"

राजु समझ गया की रात वाली छीनाल मामी फिर से वापस आ गई है। वो एक पल को रुक गया अपनी जीभ को आराम देने के लिये, मगर उर्मिला देवी को देरी बरदाश्त नही हुई। पिछे पलट कर राजु के सिर को दबाती हुइ बोली,
"उफफफ् रुक मत,,,,,,,,,जल्दी जल्दी चाट....."

मगर राजु भी उसको तडपाना चाहता था। उर्मिला देवी पिछे घुमी और राजु को उसके टी-शर्ट के कोलर से पकड कर खिंचती हुइ डाईनींग टेबल पर पटक दिया। उसके नथुने फुल रहे थे, चेहरा लाल हो गया था। राजु को गरदन के पास से पकड, उसके होठों को अपने होठों से सटा कर खुब जोर से चुम्मा लिया। इतनी जोर से जैसे उसके होठों को काट खाना चाहती हो, और फिर उसके गाल पर दांत गडा कर काट लिया। राजु ने भी मामी के गालो को अपने दांतो से काट लिया।

"उफफ्फ् कमीने, निशान पड जायेगा,,,,,,,,,रुकता क्यों है,?,,,,,,,जल्दी कर, नही तो बहुत गाली सुनेगा,,,,,,,,,,और रात के जैसा छोड दुन्गी..."

राजु उठ कर बैठता हुआ बोला, "जीतनी गालीयां देनी है, दे दो,,,,,"
और चुतड पर कस कर दांत गडा कर काट लिया।

"उफफफ,,,,,,,हरामी, गाली सुन ने में मजा आता है, तुझेएए,,,,????"

राजु कुछ नही बोला, गांड की चुम्मीयां लेता रहा,

",,,,,,आह, पच पच।"

उर्मिला देवी समझ गई की, इस कम उमर में ही छोकरा रसिया बन गया है।

चुत के भगनशे को अपनी उन्गली से रगड कर, दो उन्ग्लीयोन को कच से बुर में पेल दिया. बुर एकदम पसीज कर पानी छोड रही थी। चुत के पानी को उन्गलीयों में ले कर, पिछे मुड कर राजु के मुंह के पास ले गई. जो की, गांड चाटने में मशगुल था और अपनी गांड और उसके मुंह के बीच उन्गली घुसा कर पानी को रगड दिया। कुछ पानी गांड पर लगा, कुछ राजु के मुंह पर।

"देख, कितना पानी छोड रही है चुत ?, अब जल्दी कर,,,,,,,,"

पानी छोडती चुत का इलाज राजु ने अपना मुंह चुत पर लगा कर किया। चुत में जीभ पेल कर चारो तरफ घुमाते हुए चाटने लगा।

"ये क्या कर रहा है, सुवर ??,,,,,,,,खाली चाटता ही रहेगा क्या,,,,,मादरचोद ?, उफफ् चाट, गांड, चुत सब चाट लेएएएए,,,,,,,,,,भोसडी के,,,,,,,लंड तो तेरा सुख गया है नाआअ,,,,!!!,,,,,,,हरामी...गांड खा के पेट भर, और चुत का पानि पीईईईईई,,,,,,,,,ऐसे ही फिर से झड गई, तो हाथ में लंड ले के घुमनाआ,,,,,,"


अब राजु से भी नही रहा जा रहा था. जल्दी से उठ कर लंड को चुत के पनीयाये छेद पर लगा, धचाक से घुसेड दिया। उर्मिला देवी का बेलेन्स बिगड गया, और टेबल पर ही गीर पडी. चिल्लाते हुए बोली,
"हरामजादे, बोल नही सकता था क्या ?,,,,,,,,,,तेरी मां की चुत में घोडे का लंड,,,,,,,,,गांडमारे,,,,,,,,आराम सेएएएएए......."

पर राजु ने सम्भलने का मौका नही दिया। धचा-धच लौडा पेलता रहा। पानी से सरोबर चुत ने कोई रुकावट नही पैदा की। दोनो चुतडो के मोटे-मोटे मांस को पकडे हुए, गपा-गप लंड डाल कर, उर्मिला देवी को अपने धक्को की रफतार से पुरा हिला दिया था, उसने। उर्मिला देवी मजे से सिसकारीयां लेते हुए बुर में गांड उचका-उचका कर लौडा लेएल रही थी।

फच-फच की आवाज एक बार फिर गुन्ज उठी थी। जांघ से जांघ और चुतड टकराने से पटक-पटक की आवाज भी निकल रही। दोनो के पैर उत्तेजना के मारे कांप रहे थे।

"पेलता रह,,,,,,और जोर से माआआरर,,,,,,बेटा मार,,,,,फाड दे चुत,,,,,,मामी को बहुत मजा दे रहा हैएएएएए,,,,,,,,। ओह चोद,,,,,,,,,देख रे मेरी ननद, तुने कैसा लाल पैदा किया है,,,,,,,,,तेरे भाई का काम कर रहा है,,,,,,,,ऐईईईई.......फाआआअड दीयाआआआअ सल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्ल्लेएएए नेए,,,,,,,,,,"

"ओह मामी, आअज आपकी चुत,,,,सीईईईई,,,,,मन कर रहा, इसी में लंड डाले,,,,,ओह,,,,सीईईईई मेरे मामा की लुगाई,,,,,,सीई बस ऐसे ही हंमेशा मेरा लंड लेती,,,,,,,,........"

"हाये चोद,,,,,बहुत मजा,,,,,,सीईईइ गांडचाटु,,,,,तु ने तो मेरी जवानी पर जादु कर दिया,,,,,"

"हाये मामी, ऐसे ही गांड हीला-हीला के लौडा ले,,,,,सीईईइ, जादु तो तुमने किया हैईई,,,,,,,,,,अहसान किया है,,,,इतनी हसीन चुत, मेरे लंड के हवाले करके,,,,'पक पक',,,,,लो मामी,,,,,ऐसे ही गांड नचा-नचा के मेरा लंड अपनी चुत में दबोचो,,,,,,,,,,,सीईईई"

",,,,,,,,,रंडी की औलाद,,,,,,,अपनी मां को चोद रहा है, की मामी को,,,,,जोर लगा के चोद ना भोसडी के,,,,,,,देख,,,,,,,,,,,,,देख तेरा लंड गया तेरी मां की बुर में,,,,,,, डाल साले,,,,,,पेल साले,,,,,पेल अपनी मां की बुर में,,,,,,रण्डी बना दे, मुझे,,,,,,,चोद अपनी मामी की बुर,,,,,,रण्डी की औलाद,,,,,,साला,,,,,मादरचोद,,,,,,"

'''''फच,,,,,,फच,,,,,फच,,,,,''''''''

और, एक झटके के साथ उर्मिला देवी का बदन अकड गया.
"ओह,,, ओह,,,, सीईई,,,, गई, मैं गई,,,,"
करती हुई डाईनींग टेबल पर सिर रख दिया। झडती हुई चुत ने जैसे ही राजु के लंड को दबोचा, उसके लंड ने भी पीचकारी छोड दी. 'फच फच' करता हुआ लंड का पानी चुत के पसीने से मिल गया। दोनो पसिने से तर-बतर हो चुके थे। राजु उर्मिला देवी की पीठ पर निढाल हो कर पड गया था। दोनो गहरी गहरी सांसे ले रहे थे।

जबरदस्त चुदाई के कारण दोनो के पैर कांप रहे थे। एक दुसरे का भार सम्भालने में असमर्थ। धीरे से राजु मामी की पीठ पर से उतर गया, और उर्मिला देवी ने अपनी साडी नीचे की और साडी के पल्लु से पसीना पोंछती हुई सीधी खडी हो गई।

वो अभी भी हांफ रही थी। राजु पास में पडे टोवेल से लंड पोंछ रहा था। राजु के गालो को चुटकी में भर मसलते हुए बोली,
"कमीने,,,,,,,अब सन्तुश्टी मिल गई,,,,,,पुरा टाईम खराब कर दिया, और कपडे भी,,,,,"

"पर मामी, मजा भी तो आया,,,,,,,,सुबह-सुबह कभी मामा के साथ ऐसे मजा लिया है,,,,,,"

मामी को बाहों में भर लिपट ते हुए राजु बोला। उर्मिला देवी ने उसको परे धकेला,
"चल हट, ज्यादा लाड मत दिखा तेरे मामा अच्छे आदमी है। मैं पहले आराम करुन्गी फिर मारकेट जाउन्गी, और खबरदार, जो मेरे कमरे में आया तो, तुझे ट्युशन जाना होगा तो चले जाना॥"

"ओके मामी,,,,,पहले थोडा आराम करुन्गा जरा."
बोलता हुआ राजु अपने कमरे में, और उर्मिला देवी बाथरुम में घुस गई। थोडी देर खट पट की आवाज आने के बाद फिर शान्ती छा गई।

राजु युं ही बेड पर पडा सोचता रहा की, सच में मामी कितनी मस्त औरत है, और कितनी मस्ती से मजा देती है। उनको जैसे सब कुछ पता है, की किस बात से मजा आयेगा और कैसे आयेगा ??। रात में कितना गन्दा बोल रही थी,,,,,,' मुंह में मुत दुन्गी ',,,,,,ये सोच कर ही लंड खडा हो जाता है. मगर ऐसा कुछ नही हुआ. चुदवाने के बाद भी वो पेशाब करने कहां गई, हो सकता है बाद में गई हो मगर चुदवाते से समय ऐसे बोल रही थी जैसे,,,,,,,,शायद ये सब मेरे और अपने मजे को बढाने के लिये किया होगा। सोचते सोचते थोडी देर में राजु को झपकी आ गई।

एक घंटे बाद जब उठा तो मामी जा चुकी थी वो भी तैयार हो कर ट्युशन पढने चला गया। दिन इसी तरह गुजर गया। शाम में घर आने पर दोनो एक दुसरे को देख इतने खुश लग रहे थे जैसे कितने दिनो के बाद मिले हो। फिर तो खाना पीना हुआ और उस दिन, रात में दो बार ऐसी ही भयंकर चुदाई हुई की दोनो के कस-बाल ढीले पड गये। दोनो जब भी झडने को होते चुदाई बन्ध कर देते। रुक जाते, और फिर दुबारा दुगुने जोश से जुट जाते। राजु भी खुल गया। खुब गन्दी गन्दी बाते की। मामी को ' रण्डी,,,,,,चुतमरानी,,,,,,,,,बहन की लौडी ' कहता, और वो खुब खुश हो कर उसे ' गांडमरा,,,,हरामी,,,,,,रंडी की औलाद ' कहती।

उर्मिला देवी के शरीर का हर एक भाग थुक से भीग जाता, और चुतडो, चुचीयों और जांघो पर तो राजु के दांत के निशान पड जाते। उसी तरह से राजु के कमसीन गाल, पीठ और छातीयां भी उर्मिला देवी के दांतो और नाखुन के निशना बनते थे।

घर में तो कोई था नही. खुल्लम-खुल्ला जहां मरजी पडे, वहीं चुदाई शुरु कर देते थे दोनो। मामी को गोद में बैठा कर टी वी देखता था। किचन में उर्मिला देवी बिना सलवार के केवल लम्बा वाला कमीज पहन कर खाना बनाती और राजु से कमीज उठा कर, दोनो जांघो के बीच बैठा कर चुत चटवाती। चुत में केला डाल कर उसको धीरे धीरे करके खीलाती। अपनी बेटी की फ्रोक पहन कर, डाईनींग टेबल के उपर एक पैर घुटनो के पास से मोड कर बैठ जाती और राजु को सामने बिठा कर अपनी नंगी बुर दीखाती और दोनो नास्ता करते। राजु कभी उन्गली, तो कभी चम्मच घुसा देता मगर उनको तो इस सब में मजा आता था।

राजु का लंड खडा कर, उस पर अपना दुपट्टा कस कर बांध देती थी। उसको लगता जैसे लंड फट जायेगा मगर गांड चटवाती रहती थी, और चोदने नही देती। दोनो जब चुदाई करते करते थक जाते तो एक ही बेड पर नंग-ढडंग सो जाते।

शायद, चौथे दिन सुबह के समय राजु अभी उठा नही था। तभी उसे मामी की आवाज सुनाई दी,
"राजु बेटा,,,,,,राजु,,,,,,,।"

राजु उठा देखा, तो आवाज बाथरुम से आ रही थी। बाथरुम का दरवाजा खुला था, अन्दर घुस गया। देखा मामी कमोड पर बैठी हुई थी। उस समय उर्मिला देवी ने मेक्षी जैसा गाउन डाल रखा था। मेक्षी को कमर से उपर उठा कर, कमोड पर बैठी हुई थी। सामने चुत की झांटे और जांघे दीख रही थी।

राजु मामी को ऐसे देख कर मुस्कुरा दीया, और हस्ते हुए बोला,

"क्या मामी, क्यों बुलाया,,,?"

"इधर तो आ पास में,,,,,,,", उर्मिला देवी ने इशारे से बुलाया।

"क्या काम है ?,,,,,,,पोट्टी करते हुए."

राजु कमोड के पास गया और फ्लश चला कर. झुक कर खडा हो गया। उसका लंड इतने में खडा हो चुका था।

उर्मिला देवी ने मुस्कुराते हुए. अपने निचले होठों को दांतो से दबाया और बोली.
"एक काम करेगा ?"

"हां बोलो, क्या करना है,,,?"

"जरा मेरी गांड धो दे ना,,!!??,,,,,,"
कह कर उर्मिला देवी मुस्कुराने लगी। खुद उसका चेहरा इस समय शरम से लाल हो चुका था, मगर इतना मजा आ रहा था की चुत के होंठ फरकने लगे थे।

राजु का लंड इतना सुनते ही लहरा गया। उसने तो सोचा भी नही था, की मामी ऐसा करने को बोल सकती है। कुछ पल तो युं ही खडा, फिर धीरे से हसते हुए बोला,
"क्या मामी ?, कैसी बाते कर रही हो ?।

इस पर उर्मिला देवी तमक कर बोली, "तुझे कोई प्रोब्लेम है, क्या,,,?"

"नही, पर आपके हाथ में कोई प्रोब्लेम है, क्या,,,,,?"

"ना, मेरे हाथ को कुछ नही हुआ, बस अपनी गांड नही धोना चाहती,,,,,,,,?।"

राजु समझ गया की, 'मामी का ये नया नाटक है. सुबह सुबह चुदवाना चाहती होगी। यहीं बाथरुम में साली को पटक कर गांड मारुन्गा, सारी गांड धुलवाना भुल जायेगी।' उर्मिला देवी अभी भी कमोड पर बैठी हुई थी। अपना हाथ टोईलेट पेपर की तरफ बढाती हुई बोली,
"ठीक है, रहने दे,,,,,गांड चाटेगा, मगर धोयेगा नही,,,,,,आना अब छुने भी नही,,,,,,,,,,"

"अरे मामी रुको,,,,,,,मैं सोच रहा था, सुबह सुबह,,,,,,,लाओ मैं धो देता हुं.?

और टोईलेट पेपर लेकर, नीचे झुक कर चुतड को अपने हाथों से पकड थोडा सा फैलाया. जब गांड का छेद ठीक से दिख गया, तो उसको पोंछ कर अच्छी तरह से साफ किया, फिर पानी लेकर गांड धोने लगा । गांड के सीकुडे हुए छेद को खुब मजे लेकर, बीच वाली अंगुली से रगड-रगड कर धोते हुए बोला,
"मामी, ऐसे गांड धुलवा कर, लंड खडा करोगी तो,,,,,,,,??!!।

उर्मिला देवी कमोड पर से हसते हुए, उठते हुए बोली,
"तो क्या,,?,,मजा नही आया,,,,,???"

बेसीन पर अपने हाथ धोता हुआ राजु बोला,
"मजा तो अब आयेगाआ,,,,,,!!!।"

और मामी को कमर से पकड कर, मुंह की तरफ से दिवार से सटा एक झटके से उसकी मेक्षी उपर कर दी, और अपनी शोर्टस् नीचे सरका, फनफनाता हुआ लंड नीकाल कर गीली गांड पर लगा एक झटका मरा।

उर्मिला देवी ' आ उईईइ क्या कर रहा है कंजरे,?,,,,छोड...' बोलती रही, मगर राजु ने बेरहमी से तीन-चार धक्को में पुरा लंड पेल दिया और हाथ आगे ले जा कर चुत के भगनशे को चुटकी में पकड मसलते हुए, खचा-खच धक्के लगाना शुरु कर दिया। पुरा बाथरुम मस्ती भरी सिसकारीयों में डुब गया. दोनो थोडी देर में ही झड गये। जब गांड से लंड नीकल गया, तो उर्मिला देवी ने पलट कर राजु को बाहों में भर लिया।

कुछ दिनो में राजु एक्षपर्ट चोदु बन गया था। जब मामा और ममेरी बहन घर आ गये, तो दोनो दिन में मौका खोज लेते और छुट्टी वाले दिन कार लेकर, शहर से थोडी दुरी पर बने फार्म हाउस पर काम करवाने के बहाने निकल जाते।

जब भी जाते काजल को भी बोलते चलो, मगर वो तो शहर की परकटी लडकी थी, मना कर देती। फिर दोनो फार्म हाउस में मस्ती करते।

इसी तरह से राजु के दिन सुख से कट ते गये। और भी बहुत सारी घटनाये हुई बीच में मगर उन सबको बाद में बताउन्गा।

तो ये थी, मुन्ना बाबु के ट्रेईनिन्ग की कहानी। मुन्ना को उसकी मामी ने पुरा बिगाड दिया।

खैर, हमे क्या ? हम वापस गांव लौटते है। देखते है वहां क्या गुल खिल रहे है।

अपनी मां और आया को देखने के दो-तीन दिन बाद तक मुन्ना बाबु को कोई होश नही था। इधर उधर पगलाये घुमते रहते थे। हर समय दिमाग में वही चलता रहता थ। घर में भी वो शीला देवी से नजरे चुराने लगे थे। जब शीला देवी इधर उधर देख रही होती, तो उसको निहारते। हालांकी कई बार दिमाग में आता की, अपनी मां को देखना बडी कमजर्फी की बात है ,मगर जीसकी ट्रेईनिन्ग ही मामी से हुई उस लडके के दिमाग में ज्यादा देर ये बात टिकने वाली नही थी। मन बार-बार शीला देवी के नशीले बदन को देखने के लिये ललचाता। उसको इस बात पर ताज्जुब होता की, इतने दिनो में उसकी नजर शीला देवी पर कैसे नही पडी। तीन चार दिन बाद कुछ नोर्मल होने पर मुन्ना ने सोचा की, हर औरत उसकी मामी जैसी तो हो नही सकती। फिर ये उसकी मां है. और वो भी ऐसी की, जरा सा उंच-नीच होने पर चमडी उधेड के रख दे। इसलिये ज्यादा हाथ पैर चलाने की जगह, अपने लंड के लिये गांव में जुगाड खोजना ज्यादा जरुरी है। किस्मत में होगा तो मील जायेगा।

मुन्ना ने गांव की भौजी, लाजवन्ती को तो चोद ही दिया था. और उसकी ननद बसन्ती के मम्मे दबाये थे, मगर चोद नही पाया था। सीलबन्ध माल थी। आजतक किसी अनचुदी की नही चोदी थी. इसलिये मन में आरजु पैदा हो गई की, बसन्ती की लेते। बसन्ती, मुन्ना बाबु को देखते ही बीडक कर भाग जाती थी। हाथ ही नही आ रही थी। उसकी शादी हो चुकी थी मगर, गौना नही हुआ था।

मुन्ना बाबु के शैतानी दिमाग ने बताया की, बसन्ती की बुर का रास्ता लाजवन्ती के भोसडे से होकर गुजरता है। तो फिर उन्होंने लजवन्ती को पटाने की ठानी। एक दिन सुबह में जब लाजवन्ती लोटा हाथ में लिये लौट रही थी, तभी उसको गन्ने के खेत के पास पकडा।

"क्या भौजी, उस दिन के बाद से तो दिखना ही बन्ध हो गया, तुम्हारा,,,,?"

लाजवन्ती पहले तो थोडा चौंकी, फिर जब देखा की आस पास कोई नही है, तब मुस्कुराती हुइ बोली,
"आप तो खुद ही गायब हो गये छोटे मालीक, वादा कर के,,,,,,!"

"आरे नही रे, दो दिन से तो तुझे खोज रहा हु. और हम चौधरी लोग जो वादा करते है, निभाते भी है. मुझे सब याद है,"

"तो फिर लाओ मेरा इनाम,,,,,,,,,"

"ऐसे कैसे दे दु, भौजी !?,,,,,,,,इतनी हडबडी भी ना दिखाओ,,,,,'

"अच्छा, अभी मैं तेजी दिखा रही हु !!?,,,,,,और उस दिन खेत में लेटे समय तो बडी जल्दी में थे आप, छोटे मालीक,,,,,,आप सब मर्द लोग एक जैसे ही हो."

मुन्ना ने लाजवन्ती का हाथ पकड कर खींचा, और कोने में ले खुब कस के गाल काट लिया। लाजवन्ती चीखी तो उसका मुंह दबाते हुए बोला,
"क्या करती हो भौजी ?, चीखो मत, सब मीलेगा,,,,,,तेरी पायल मैं ले आया हु, और बसन्ती के लिये लहन्गा भी।"

मुन्ना ने चारा फेंका। लाजवन्ती चौंक गई,
"हाये मालीक, बसन्ती के लिये क्यों,,,,,,?।"

"उसको बोला था की, लहन्गा दिलवा दुन्गा सो ले आया ।",
कह कर लाजवन्ती को एक हाथ से, कमर के पास से पकड, उसकी एक चुचीं को बायें हाथ से दबाया।

लाजवन्ती थोडा कसमसाती हुई, मुन्ना के हाथ की पकड को ढीला करती हुई बोली,
"उस से कब बोला था, आपने ?"

"अरे जलती क्यों है ?,,,,,,उसी दिन खेत में बोला था, जब तेरी चुत मारी थी..",
और अपना हाथ चुचीं पर से हटा कर, चुत पर रखा और हल्के से दबाया।

"अच्छा अब समझी, तभी आप उस दिन वहां खडा कर के खडे थे. मुझे देख कर वो भाग गई और आपने मेरे उपर हाथ साफ कर लिया ।"

"एकदम ठीक समझी रानी,,,,,,,",
और उसकी चुत को मुठ्ठी में भर कस कर दबाया। लाजवन्ती चीहुंक गई। मुन्ना का हाथ हटाती बोली,
"छोडो मालीक, वो तो एकदम कच्ची कली है।"

अचानक सुबह सुबह उसके रोकने का मतलब लाजवन्ती को तुरन्त समझ में आ गया।

अरे, कहां की कच्ची कली ?, मेरे उमर की तो है,,,,"

"हां, पर अनचुदी है,,,,,,एकदम सीलबन्ध,,,,,,,दो महीने बाद उसका गौना है.."

"धत् तेरे की, बस दो महीने की ही मेहमान है. तो फिर तो जल्दी कर भौजी कैसे भी जल्दी से दिलवा दे,,,,,,"
कह कर उसके होठों पर चुम्मा लिया।

ऊउ...हहहह छोडो, कोई देख लेगा !?,,,,,,,पायल तो दी नही, और अब मेरी कोरी ननद भी मांग रहे हो,,,,,,,,बडे चालु हो, छोटे मालीक...!!!"

लाजवन्ती को पुरा अपनी तरफ घुमा कर चीपका लिया और खडा लंड साडी के उपर से चुत पर रगडते हुए, उसकी गांड की दरार में उन्गली चला, मुन्ना बोला,
"अरे कहां ना, दोनो चीज ले आया हु,,,,,दोनो ननद-भौजाई एक दिन आ जाना, फिर,,,,,"

"लगता है, छोटे मालीक का दिल बसन्ती पर पुरा आ गया है..."

"हां रे ,तेरी बसन्ती की जवानी है ही ऐसी,,,,,,,,बडी मस्त लगती है,,,,,,"

"हां मालीक, गांव के सारे लौंडे उसके दिवाने है,,,,....."

"गांव के छोरे, मां चुदाये,,,,,,,तु बस मेरे बारे में सोच,,,,,,,"
कह कर उसके होठों पर चुम्मी ले, फिर से चुचीं को दबा दिया।

"शीईई,,,,,,मालीक क्या बताये..??, वो मुखीया का बेटा तो ऐसा दिवाना हो गया है, की,,,,,,,,उस दिन तालाब के पास आकर पैर छुने लगा और सोने की चेन दिखा रहा था, कह रहा था की भौजी, 'एक बार बसन्ती की,,,,,,!!! ' पर, मैने तो भगा दिया साले को. दोनो बाप-बेटे कमीने है.."

मुन्ना समझ गया की, साली रण्डी, अपनी औकात पर आ गई है। पन्त की जेब में हाथ डाल कर पायल निकाली, और लाजवन्ती के सामने लहरा कर बोला,
"ले, बहुत पायल-पायल कर रही है ना, तो पकड इसको,,,,,,,,,और बता बसन्ती को कब ले कर आ रही है ?,,,,,,"

"हाये मालीक, पायल लेकर आये थे,,,,,और देखो, तब से मुझे तडपा रहे थे,,,,,,,,"

और पायल को हाथ में ले उलट पुलट कर देखने लगी। मुन्ना ने सोचा, जब पेशगी दे ही दी है, तो थोडा सा काम भी ले लिया जाये. और उसका एक हाथ पकड खेत में थोडा और अन्दर खींच लिया।

लाजवन्ती अभी भी पायल में ही खोई हुई थी। मुन्ना ने उसके हाथ से पायल ले ली और बोला,
"ला पहना दु,,,,,,"

लाजवन्ती ने चारो तरफ देखा, तो पाया की वो खेत के और अन्दर आ गई है। किसी के देखने की सम्भावना नही है, तो चुप-चाप अपनी साडी को एक हाथ से पकड घुटनो तक उठा एक पैर आगे बढा दिया। मुन्ना ने बडे प्यार से उसको एक-एक करके पायल पहनायी, फिर उसको खींच कर घास पर गीरा दीया और उसकी साडी को उठाने लगा। लाजवन्ती ने कोई विरोध नही किया। दोनो पैरों के बीच आ जब मुन्ना लंड डालने वाला था, तभी लाजवन्ती ने अपने हाथ से लंड पकड लिया और बोली,
"लाओ, मैं डालती हुं,,,,,,
और लंड को अपनी चुत के होठों पर रगडती हुई बोली,
"वैसे छोटे मालीक, एक बात बोलुं,,,,,,,???"

"हां बोल,,,,,,,,,छेद पर लगा दे, टाईम नही है,,,,,,,,,,"

"सोने की चैन बहुत मह्न्गी आती है, क्या,,,,,,,??"

मुन्ना समझ गया की, साली को पायल मील गयी है. बिना गोल्ड की चैन लिये इसकी आत्मा को शान्ती नही मिलेगी, और मुझे बसन्ती। लंड को उसके हाथ से झटक कर चुत के मुहाने पर लगा कच से पेलता हुआ बोला,
"महन्गी आये, चाहे सस्ती तुझे क्या,?,,,,आम खाने से मतलब रख गुठली, मत गीन."

इतना सुनते ही, जैसे लाजवन्ती एकदम गनगना गई. दोनो बाहों का हार मुन्ना के गले में डालती बोली,
"हाये मालीक,,,,मैं कहां,?,,,,मैं तो सोच रही थी, कहीं आपका ज्यादा खर्चा ना हो जाये,,,,,,सम्भल के मालीक, जरा धीरे-धीरे आपका बडा मोटा है।"

"मोटा है, तभी तो तेरे जैसी छीनाल की चुत में भी टाईट जाता है,,,,?"
जोर जोर से धक्के लगाता हुआ मुन्ना बोला।

"हाये मालीक, चोदो अब ठीक है,,,,,मालीक अपने लंड के जैसी मोटी चैन लेना,,,,,जैसे आपका मोटा लौडा खा कर चुत को मजा आ जाता है, वैसे ही चैन पहन कर,,,,,"

"ठीक है भौजी, तु चिन्ता मत कर,,,,,,,सोने से लाद दुन्गा,,,,,,,,।"

फिर थोडी देर तक धुंआधार चुदाई चलती रही। मुन्ना ने अपना माल झडा और लंड निकाल कर उसकी साडी में पोंछ कर पेन्ट पहन लिया। लाजवन्ती उठती हुई बोली,
"मालीक, जगह का उपाय करना होगा। बसन्ती अनचुदी है। पहली बार लेगी, वो भी आपका हलब्बी लौडा, तो बिदकेगी और चिल्लायेगी। ऐसे खेत में जल्दी का काम नही है। आराम से लेनी होगी बसन्ती की..."

मुन्ना कुछ सोचता हुआ बोला,
"ये मेरा जो आम का बागीचा है, वो कैसा रहेगा ?"

मुन्ना के बाबुजी ने दो कमरे और बाथरुम बना रखे थे वहां पर, सब जानते थे।

"हाये मालीक, वहां पर कैसे ?!!,,,,,,,,,वहां तो बाबुजी...."

मुन्ना बात समझ गया और बोला,
"तु चिन्ता मत कर, मैं देख लुन्गा,"

लाजवन्ती ने हां में सिर हिलाते हुए कहा,
"हां मालीक, ठीक रहेगा,,,,,ज्यादा दुर भी नही, फिर रात में किसी बहाने से मैं बसन्ती को खीसका के लेते आउन्गी...."

"चल फिर ठीक है, जैसे ही बसन्ती मान जाये मुझे बता देना."

फिर दोनो अपने अपने रास्ते चल पडे।

आम के बागीचे में जो मकान या खलीहान जो भी कहें, बना था वो वास्तव में चौधरी जब जवान था तब उसकी ऐशगाह थी। वहां वो रण्डीयां ले जा कर नचवाता और मौज-मस्ती करता था। जब से दारु के नशे में डुबा था, तब से उसने वहां जाना लगभग छोड ही दिया था।

बाहर से देखने पर तो खलीहान जैसा गांव में होता है, वैसा ही दिखता था मगर अन्दर चौधरी ने उसे बडा खुबसुरत और आलीशान बना रखा था। दो कमरे, जो की काफी बडे और एक कमरे में बहुत बडा बेड था। सुख-सुवीधा के सारे सामान वहां थे।

वहां पर एक मेनेजर जो की चौकीदार का काम भी करता था रहता था। ये मेनेजर मुन्ना के लिये बहुत बडी प्रोब्लेम था। क्यों की लाजवन्ती और बसन्ती दर-असल, उसी की बहु और बेटी थी। लाजवन्ती उसके बेटे की पत्नी थी, जो की शहर में रहता था। मुन्ना बाबु घर पहुंच कर कुछ देर तक सोचते रहे कैसे अपने रास्ते के इस पत्थर को हाटाया जाये। खोपडी तो शैतानी थी ही। तरकीब सुझ गई। उठ कर सीधा आम के बागीचे की ओर चल दिये।

मई महीने का पहला हफता चल रहा था। बागीचे में एक जगह खाट डाल कर मेनेजर बैठा हुआ, दो लडकीयों की टोकरीयों में अधपके और कच्चे आम गीन-गीन कर रख रहा था। मुन्ना बाबु एकदम से उसके सामने जा कर खडे हो गये। मेनेजर हडबडा गया और जल्दी से उठ कर खडा हुआ।

"क्या हो रहा है, ?,,,,,,ये अधपके आम क्यों बेच रहे हो ?,,,,,,,"

मेनेजर की तो गीग्घी बन्ध गई, समझ में नही आ रहा था क्या बोले ?।

"ऐसे ही हर रोज दो टोकरी बेच देते हो क्या,,,,,,,,, ?" थोडा और धमकाया।

"छोटे मालीक,,,,,,,,नही छोटे मालीक,,,,,,,,,,,,वो तो ये बेचारी ऐसे ही,,,,,,,,बडी गरीब बच्चीयां है. आचार बनाने के लिये मांग रही थी,,,,,,,,,,"

दोनो लडकीयां तब तक भाग चुकी थी।

"खुब आचार बना रहे हो,,,,,,,,चालो अभी मां से बोलता हुं. फिर पता चलेगा,,,,,,,।"

मेनेजर झुक कर पैर पकडने लगा। मुन्ना ने उसका हाथ झटक दिया, और तेजी से घर आ गया। घर आ कर चौधराईन को सारी बात नमक मिर्च लगा कर बता दी। चुधराईन ने तुरन्त मेनेजर को बुलवा भेजा, खुब झाड लगाई और बागीचे से उसकी ड्युटी हटा दी और चौधरी को बोला की दिनु को बागीचे में भेज दे, रखवाली के लिये।

अब जीतने भी बागीचे थे, सब जगह थोडी बहुत चोरी तो सारे मेनेजर करते थे। चौधरी की इतनी जमीन-जायदाद थी की, उसका ठीक-ठीक हिसाब किसी को नही पता था। आम के बागीचे में तो कोई झांकने भी नही जाता. जब फल पक जाते तभी चौधराईन एक बार चक्कर लगाती थी।

मेनेजर की किस्मत फुटी थी की मुन्ना बाबु के चक्कर में फस गया। फिर मुन्ना ने चौधरी से बागीचे वाले मकान की चाबी ले ली। दिनु को बोल दिया ' मत जाना, गया तो टांग तोड दुन्गा,,,,,,,,तु भी चोर है। ' दिनु डर के मारे गया ही नही, और ना ही किसी से इसकी शिकायत की।

जब सब सो जाते, तो रात में चाबी ले कर मुन्ना बाबु खीसक जाते। दो रातो तक लाजवन्ती की जवानी का रस चुसा. आखिर पायल की कीमत जो वसुलनी थी। तीसरे दिन लाजवन्ती ने बता दिया की रात में ले कर आउन्गी। मुन्ना बाबु पुरी तैयारी से बागीचे वाले मकान पर पहुंच गये। करीब आधे घंटे के बाद ही दरवाजे पर खट-खट हुइ।

मुन्ना ने दरवाजा खोला सामने लाजवन्ती खडी थी। मुन्ना ने धीरे से पुछा,
"भौजी, बसन्ती...???"

लाजवन्ती ने अन्दर घुसते हुए, आंखो से अपने पिछे इशारा किया। दरवाजे के पास बसन्ती सिर झुकाये खडी थी। मुन्ना के दिल को करार आ गया। बसन्ती को इशारे से अन्दर बुलाया। बसन्ती धीरे-धीरे शरमाती-संकुचती अन्दर आ गई। मुन्ना ने दरवाजा बंध कर दिया, और अन्दर वाले कमरे की ओर बढ चला। लाजवन्ती, बसन्ती का हाथ खींचती हुइ पिछे-पिछे चल पडी। अन्दर पहुंच कर मुन्ना ने अंगडाई ली। उसने लुन्गी पहन रखी थी। लाजवन्ती को हाथो से पकड अपनी ओर खींच लिया, और उसके होठों पर चुम्मा ले बोला,
"क्या बात है भौजी, आज तो कयामत लग रही हो,,,,,,,,,,"

"हाय छोटे मालीक, आप तो ऐसे ही,,,,,,,,बसन्ती को ले आई,,,,,,,,,,"

बसन्ती बेड के पास चुप चाप खडी थी।

"हां, वो तो देख ही रहा हुं,,,,,,,,,,"

"हां मालीक, लाजवन्ती अपना किया वादा नही भुलती,,,,,,,,,लोग भुल जाते है,,,,,,,,,,,"

मुन्ना ने पास में पडे कुर्ते में हाथ डाल कर एक डिब्बा निकाला, और लाजवन्ती के हाथों में थमा दिया। फिर उसको कमर के पास से पकड कर अपने से चिपका कर, उसके चुतडों को कस कर दबाता हुआ बोला,
"आते ही अपनी औकात पर आ गई,,,,,,,,खोल के देख,,,,,,,"

लाजवन्ती ने खोल के देखा, तो उसकी आंखो में चमक आ गई।

"हाये मालीक, मैं आपके बारे में कहां बोल रही थी ??,,,,,,,,,मुझे क्या पता नही की, चौधरी खनदान के लोग,,,,,,कितने पक्के होते है,,!?!,,,,,,,हाय मार दिया,,,,,,,हड्डीयां तरतरा गई,,,,,,,,,,,"

लाजवन्ती की गांड की दरार में साडी के उपर से उन्गली चलाते हुए, उसके गाल पर दांत गडा उसकी एक चुचीं पकड और कस कर चिपकाया। लाजवन्ती "आह मालीक आआआअ उईईई" करने लगी।

बसन्ती एक ओर खडी होकर उन दोनो को देख रही थी। मुन्ना ने लाजवन्ती को बिस्तर पर पटक दिया। बिस्तर इतना बडा था की, चार आदमी एक साथ सो शकें। दोनो एक दुसरे से गुत्थम-गुत्था हो कर बिस्तर पर लुढकने लगे। होठों को चुसते हुए कभी गाल कटता कभी गरदन पर चुम्मी लेता। चुची को पुरी ताकत से मसल देता था। चुतड दबोच कर गांड में साडी के उपर से ऐसे उन्गली कर रहा था, जैसे पुरी साडी घुसा देगा।

लाजवन्ती के मुंह से "आ हा अह,,,,,,,,उईईईईईइ, मालीक.." निकल रहा था. तभी फुसफुसाते हुए बोली,
"मेरे पर ही सारा जोर निकालोगे क्या,?,,,,,बसन्ती तो,,,,,,,,,,"

मुन्ना भी फुसफुआते हुए बोला,
"अरे खडी रहने दे, तुझे एक पानी चोद देता हुं,,,,,,,फिर खुद गरम हो जायेगी,,,,,,,,"

मुन्ना की चालाकी समझ, वो भी चुप हो गई।

फिर मुन्ना ने जल्दी से लाजवन्ती को पुरा नन्गा कर दिया। अपनी ननद के सामने पुरा नन्गा होने पर शरमा कर बोली,
"हाय मालीक, कुछ तो छोड दो,,,,,,,,।"

मुन्ना अपनी लुंगी खोलते हुए बोला,
"आज तो पुरा नन्गा करके,,,,,,,साडी उठाने से काम नही चलेगा, भौजी"

मुन्ना का दस इंच लम्बा लंड देख कर बसन्ती एकदम शिहार गई। मगर लाजवन्ती ने लपक कर अपने हाथो में थाम लिया, और मसलने लगी। मुन्ना मासंअद के सहारे बैठता हुआ बोला,
"रानी जरा चुसो,,,,,,,,,।"

लाजवन्ती बैठ कर सुपाडे की चमडी हटा, जीभ फिराती हुई बोली,
"मालीक, बसन्ती ऐसे ही खडी रहेगी क्या,,,,,,,,,???"

"अरे, मैने कब कहा खडी रह्ने को ??,,,,,,,बैठ जाये,,,,,,,,,"

"ऐसी क्या बेरुखी मालिक ?,,,,,,,बेचारी को अपने पास बुला लो ना,,,,,,,,," ,
पुरे लंड को अपने मुंह में ले चुसते हुए बोली।

"हाय, बहुत अच्छा भौजी,,,,,,,,अच्छे से चुसो,,,,,,,मैं कहां बेरुखी दिखा रहा हुं. वो तो खुद ही दुर खडी है,,,,,,,"

"हाये मालिक, जब से आई है, आपने कुछ बोला नही है,,,,,,,,बसन्ती आ जा,,,,,,अपने छोटे मालिक बहुत अच्छे है,,,,,,,,शहर से पढ लिख कर आये है,,,,,,,,,गांव के गंवारो से तो लाख दरज्जे अच्छे है,,,,,,,,"

बसन्ती थोडा सा हिचकी तो, लंड छोड कर लाजवन्ती उठी और हाथ पकड बेड पर खींच लिया। मुन्ना ने एक और मासंअद लगा, उसको थप थपाते हुए इशारा किया। बसन्ती शरमाते हुए मुन्ना के बगल में बैठ गई।

लाजवन्ती ने मुन्ना का लंड पकड हिलाते हुए दिखाया,
"देख कितना अच्छा है !?, अपने छोटे मालिक का,,,,एकदम घोडे के जैसा है,,,,,ऐसा पुरे गांव में किसी का नही,,,,,,,।"

और फिर से चुसने लगी। झुकी पलकों के नीचे से बसन्ती ने मुन्ना का हलब्बी लंड देखा, दिल में एक अजीब सी कसक उठी। हाथ उसे पकडने को ललचाये, मगर शर्मो-हया का दामन नही छोड पाई।

मुन्ना ने बसन्ती की कमर में हाथ डाल अपनी तरफ खींचा,
"शरमाती क्यों है ? आराम से बैठ,,,,,,,आज तो बडी सुन्दर लग रही है,,,,,,,,,खेत में तो तुझे अपना लौडा दिखाया था ना,,,,,तो फिर क्यों शरमा रही है ?।"

बसन्ती ने शरमा कर गरदन झुका ली। उस दिन के मुन्ना और आज के मुन्ना में उसे जमीन आसमान का अन्तर नजर आया। उस दिन मुन्ना उसके सामने गीडगीडा रहा था. उसको लहंगे का तोहफा दे कर ललचाने की कोशिश कर रहा था, और आज का मुन्ना अपने पुरे रुआब में था. वो इसलिये क्योंकी. आज वो खुद उसके दरवाजे तक चल कर आई थी।

"हाय् मालीक,,,,,,,,मैने आज तक कभी,,,,,,,,"

"अरे, तेरी तो शादी हो गई है. दो महीने बाद गौना हो कर जायेगी, तो फिर तेरा पति तो दिखायेगा ही,,,,,,,"

"धत् मालिक,,,,,,,,,,"

"तेरा लहंगा भी लाया हु,,,,,,,,,,लेती जाना,,,,,,,,सुहागरात के दिन पहनना,,,,,,,,"

कह कर अपने पास खींच कर, उसकी एक चुचीं को हल्के से पकडा। बसन्ती शरमा कर और सीमट गई। मुन्ना ने ठुड्डी से पकड कर उसका चेहरा उपर उठाते हुए कहा,
"एक चुम्मा दे,,,,,,,,बडी नशीली लग रही है."

और उसके होठों से अपने होंठ सटा कर चुसने लगा। बसन्ती की आंखे मुंद गई। मुन्ना ने उसके होथों को चुसते हुए, उसकी चुंची को पकड लिया और खुब जोर जोर से दबाते हुए, उसकी चोली में हाथ घुसा दिया। बसन्ती एकदम से छटपटा गई।

"उईईईइ मालिक, सीईई,,,,,,,"

मुन्ना ने धीरे से उसकी चोली के बटन खोलने की कोशिश की, तो बसन्ती ने शरमा कर मुन्ना का हाथ हल्के से हटा दिया। लजवन्ती लंड को पुरा मुंह में ले चुस रही थी। उसकी लटकती हुई चुंची को पकड दबाते हुए मुन्ना बोला,
"देखो भौजी, कैसे शरमा रही है ?,,,,,,,,पहले तो चुप-चाप वहां खडी रही, अब कुछ करने नही दे रही,,,,,,,,,"

लाजवन्ती लंड पर से मुंह हटा बसन्ती की ओर खिसकी, और उसके गालो को चुटकी में मसल बोली,
"हाय मालिक पहली बार है बेचारी का, शरमा रही है,,,,,,,,,लाओ मैं खोल देती हुं,,,,,"

"मेरे हाथों में क्या बुराई है,,,,,,,,"

"मालिक बुराई आपके हाथो में नही, लंड में है,,,,,,,देख कर डर गई है."

फिर धीरे से बसन्ती की चोली खोल, अंगीया निकाल दी। बसन्ती और उसकी भौजी दोनो गेहुंये (व्हीटीश) रंग की थी। मतलब बहुत गोरी तो नही थी, मगर काली भी नही थी। बसन्ती की दोनो चुचियां छोटी मुठ्ठी में आ जाने लायक थी। निप्पल गुलाबी और छोटे-छोटे थे । एकदम अछुती चुंची थी। कठोर और नुकिली। मुन्ना ने एक चुंची को हल्के से थाम लिया।

"हाय क्या चुंची है !!,,,,,मुंह में डाल कर पिने लायक,,,,,,"

और दुसरी चुंची पर अपना मुंह लगा, जीभ निकाल कर निप्पल को छेडते हुए चारों तरफ घुमाने लगा। बसन्ती सिहर उठी। पहली बार जो था।

सिसकते हुए मुंह से निकला, "हाय भाभी,,,,,,"

लाजवन्ती ने उसका हाथ पकड कर मुन्ना के लंड पर रख दिया, और उसके होठों को चुम बोली,
"पकड के तु भी, मसल, छोटे मालिक तो अपने खीलौने से खेल रहे है,,,,,,,,ये हम लोगो का खिलौना है."

मुन्ना दोनो चुचियों को बारी बारी से चुसने लगा। बडा मजा आ रहा था उसको।

कुछ देर बाद उसने बसन्ती को अपनी गोद में खींच लिया, और अपने लंड पर उसको बैठा लिया.

"आओ रानी, तुझे झुला झुला दु,,,,,,,,शरमा मत,,,,,,,,शरमायेगी तो सारा मजा तेरी भाभी लुट लेगी,"

मुन्ना का खडा लंड उसकी गांड में चुभने लगा। ठीक गांड की दरार के बीच में लंड लगा कर दोनो चुंची मसलते हुए, गाल और गरदन को चुमने लगा। तभी लाजवन्ती ने मुन्ना का हाथ पकड कर अपनी ढीली चुंची पर रखते हुए कहा,
"हाय मालिक, कोरा माल मिलते ही मुझे भुल गये."

"तुझे कैसे भुल जाउन्गा छिनाल,,,,,,,चल आ अपनी चुंची पीला, मैं तब तक इसकी दबाता हु."

"हाये मालिक पीजीये,,,,,,,,,,,अपनी इस छिनाल भौजी की चुंची को,,,,,,,,ओह हो सीईईएए,,,,,"

मुन्ना तो जन्नत में था. दोनो हाथ में दो अछुती चुंची. लंड के उपर अनचुदी लौंडीया अपनी गांड ले कर बैठी हुइ थी और मुंह में खुद से चुंची ठेल-ठेल कर पीलाती रण्डी। दो चुचियों को मसल-मसल कर और दो को चुस-चुस कर लाल कर दिया। चुंची चुसवा कर लाजवन्ती एकदम गरम हो गई. अपने हाथ से अपनी चुत को रगडने लगी। मुन्ना ने देखा तो मुस्कुरा दिया और बसन्ती को दिखाते हुए बोला,
"देख. तेरी भौजी कैसे गरमा गई है,,,,,,,,,,हाथी का भी लंड लील जायेगी।"

देख कर बसन्ती शरमा कर. "धत् मालीक,,,,,,,आपका तो खुद घोडे जैसा,,,,,,,,"

इतनी देर में वो भी थोड बहुत खुल चुकी थी।

"अच्छा है ना ?"

"धत् मालिकि,,,,,,,,,,,,,,,आपका बहुत मोटा.....!!!"

"मोटे और लम्बे लंड से ही मजा आता है,,,,,,,,,क्यों भौजी.....?"

"हां छोटे मालिक, आपका तो बडा मस्त लौडा है,,,,,,,,,मेरे जैसी चुदी हुई में भी,,,,,,,,बसन्ती को भी चुसवाओ मालिक."

एक हाथ से बसन्ती की चुंची को मसलते हुए, दुसरे से बसन्ती का लहन्गा उठा उसकी नंगी जांघो पर हाथ फेरते हुए, मुन्ना ने पुछा,

"चुसेगी ?,,,,,,,,,अच्छा लगेगा,,,,,,,,,,तेरी भौजी तो इसकी दिवानी है,,,,।"

"धत् मालिक,,,,,,,,भौजी को इसकी आदत है,,,,,,,,"

"शरमाना छोड,,,,,,,,देख मैं तेरी चुंची दबाता हुं तो मजा आता है ना ?।"

"हाय मालिक,,,,,,,,,,अच्छा लगता है."

"और तेरी चुंची दबाने में मुझे भी मजा आता है,,,,,,,,वैसे ही लंड चुसेगी तो,,,,,,,,"

"हाय मालिक, भौजी से चुसवाओ,,,,,,,"

"भौजी तो चुसती ही है ना,,,,,तु भी इसका स्वाद ले,,,,,,,,शरमायेगी तो फिर,,,,,,,, भौजी छोडो इसको, तुम ही आ जाओ. ये बहुत शरमा रही है,,,,,,,",
कह कर मुन्ना ने अपने हाथ बसन्ती के बदन पर से हटा लिये और उसको अपनी गोद से हल्के से निचे उतार दिया।

बसन्ती जो अब तक मजे की लहर में दुबी हुई थी, जब उसका मजा थोडा हल्का हुआ तो होश आया। तब तक लाजवन्ती फिर से अपने छोटे मालिक का लंड अपने मुंह में ले चुंची मिसवाती हुई, मजा लुट रही थी। बसन्ती अपनी ललचाई आंखो से उसको देखने लगी। उसका मन कर रहा था की, फिर से जा कर मुन्ना की गोद में बैठ जाये और कहे,
"हाय मालिक चुंची दबाओ,,,,,,,,,आप जो कहोगे मैं करुन्गी,,,,,,,,,,।"

पर चुप-चाप वहीं बैठी रही। लजवन्ती ने लंड को मुंह से निकाल हिलाते हुए उसको दिखाया और बोली,
"तेरी तो किस्मत ही फुटी है,,,,,,,,वहीं बैठी रह और देख-देख कर ललचा,,,,।"

"धत् भाभी मेरे से नही,,,,,,,,,"

"मैं क्या कोई मां के पेट से शिख के आई थी ?,,,,,,,चल आ जा, मैं शीखा देती हुं,,,,,"

बसन्ती का मन तो ललचा ही रहा था। धीरे से सरक कर पास गई। लाजवन्ती ने मोटा बलिश्त भर का लंड उसके हाथ में थमा दिया, और उसके सिर को पकड निचे झुकाती हुई बोली,
"ले, आराम से जीभ निकाल कर सुपाडा चाट,,,,,फिर सुपाडे को मुंह भर कर चुसना,,,,,,,पुरा लंड तेरे मुंह में नही जायेगा अभी,,,,,,।"

बसन्ती लंड का सुपाडा मुंह में ले चुसने लगी। पहले धीरे-धीरे फिर जोर-जोर से। भौजी को देख आखीर इतना तो शिख ही लिया था। मुन्ना के पुरे बदन में आनन्द की तरंगे उठ रही थी। शहर से आने के बहुत दिनो बाद ऐसा मजा उसे मिल रहा था। लाजवन्ती उसके अंडकोशो को पकड अपने मुंह में भर कर चुमला ते हुए चुस रही थी।

कुछ देर तक लंड चुसवाने के बाद, मुन्ना ने दोनो को हटा दिया और बोला,
"भौजी, जरा अपनी ननद के लालमुनीया के दर्शन तो करवाओ,,,,,,,,,,"

"हाये मालिक, नजराना लगेगा...!!। एक दम कोरा माल है, आज तक किसी ने नही..."

"तुझे तो दिया ही है...अपनी बसन्ती रानी को भी खुश कर दुन्गा...मैं भी तो देखु कोरा माल कैसा...।"

"हाये मालिक, देखोगे तो बिना चोदे ही निकाल दोगे...इधर आ बसन्ती, अपनी ननद रानी को तो मैं गोद मैं बैठा कर...",
कहते हुए बसन्ती को खींच कर अपनी गोद मैं बैठा लिया और उसके लहन्गे को धीरे-धीरे कर उठाने लगी।

शरम और मजे के कारण बसन्ती की आंखे आधी बन्ध थी। मुन्ना उसकी दोनो टांगो के बिच बैठा हुआ, उसके लहन्गे को उठता हुआ देख रहा था। बसन्ती की गोरी-गोरी जांघे बडी कोमल और चिकनी थी। बसन्ती ने लहन्गे के नीचे एक पेन्टी पहन रखी थी, जैसा गांव की कुंवारी लडकियां आम तौर पर पहनती है।

लहन्गा पुरा उपर उठा, पेन्टी के उपर हाथ फेरती लाजवन्ती बोली,
"कच्छी फाड कर दिखाउं ?"

"हाये, जैसे मरजी हो वैसे दिखा...तु कच्छी फाड, मैं फिर इसकी चुत फाडुन्गा..."

लाजवन्ती ने कच्छी के बिच में हाथ रखा और मयानी की सिलाई, जो थोडी उधडी हुई थी, उसमे अपने दोनो हाथों की उन्गलियों को फसा चरर्र् से कच्छी फाड दी।

बसन्ती की १६ साल की कच्च्ची चुत मुन्ना की भुखी आंखो के सामने आ गई। हल्के-हल्के झांठो वाली, एकदम कचोडी के जैसी फुली बुर देख कर मुन्ना के लंड को एक जोरदार झटका लगा।

लजवन्ती ने बसन्ती की दोनो टांगे फैला दी और बसन्ती की चुत के उपर हाथ फेरती हुई, पेन्टी को फाड पुरा दो भाग में बांट दिया और उसकी बुर के गुलाबी होंठो पर उन्गली चलाते हुए बोली,
"हाये छोटे मालिक, देखो हमारी ननद रानी की लालमुनिया..."

नन्गी चुत पर उन्गली चलने से बसन्ती के पुरे बदन में सनसनी दौड गई। सिसकार कर उसने अपनी आंखे पुरी खोल दी। मुन्ना को अपनी चुत की तरफ भूखे भेडिये की तरह से घुरते देख उसका पुरा बदन सिहर गया, और शरम के मारे अपनी जांघो को सिकोडने की कोशिश की मगर, लाजवन्ती के हाथो ने ऐसा करने नही दिया। वो तो उल्टा बसन्ती की चुत के गुलाबी होंठो को अपनी उन्गलियों से खोल कर मुन्ना को दिखा रही थी,

"हाये मालिक, देख लो कितना खरा माल है !!!...ऐसा माल पुरे गांव में नही है...वो तो बडे चौधरी के बाबुजी पर इतने अहसान है की, मैं आपको मना नही कर पाई...। नही तो ऐसा माल कहां मिलता है ?!!..."

"हां रानी, सच कह रही है तु...। मार डाला तेरी ननद ने तो...क्या लालगुडीया चुत है!!!!!"

"खाओगे मालिक ?...चख कर तो देखो..."

"हाये रानी, खीला,,,,,कोरी चुत का स्वाद कैसा होता है ?..."

लाजवन्ती ने दोनो जांघो को फैला दिया।

मुन्ना आगे सरक कर, अपने चेहरे को उसकी चुत के पास ले गया और जीभ निकाल कर चुत पर लगा दी। चुत तो उसने मामी की भी चुसी थी, मगर वो चुदी चुत थी. कच्ची कोरी बुर उपर जीभ फिराते ही उसे अहसास हो गया की, अनचुदी बुर का स्वाद अनोखा होता है।

लाजवन्ती ने चुत के होंठो को अपनी उन्गली फसा कर खोल दिया। चुत के गुलाबी होंठो पर जीभ चलते ही बसन्ती का पुरा बदन अकड कर कांपने लगा।

"ऊऊफफ्फ्......। भौजी...। सीएएएए मालिक...॥"

चुत के गुलाबी होंठो के बिच जीभ घुसते ही मुन्ना को अनचुदी चुत के खारे पानी का स्वाद जब मिला, तो उसका लंड अकड के अप-डाउन होने लगा। मुन्ना ने चुत के दोनो छोटे-छोटे होंठो को अपने मुंह में भर खुब जोर जोर से चुसा, और फिर जीभ पेल कर घुमाने लगा। बसन्ती की अनचुदी चुत ने पानी छोडना शुरु कर दीया। जीभ को चुत के छेद में घुमाते हुए, उसके भगनसे को अपने होंठो के बिच कस कर चुमलाने लगा। लजवन्ती उसकी चुचियों को मसल रही थी।

बसन्ती के पुरे तन-बदन में आग लग गई। मुंह से सिसकारीयां निकलने लगी। लाजवन्ती ने पुछा,
"बिट्टो, मजा आ रहा है...?"

"हाय मालिक,...ओओओओ ऊउस्स्स्स्सीईई भौजी, बहुत...उफफ्फ्फ्...भौजी, बचा लो मुझे कुछ हो जायेगा...उफह्फ्फ्फ् बहुत गुद-गुदी...सीएएएए मालिक को बोलो, जीभ हटा ले...हायेएए।"

लाजवन्ती समझ गई की, मजे के कारण सब उल्टा पुल्टा बोल रही है। उसकी चुचियों से खेलती हुई बोली,
"हाय मालिक,,...चाटो...अच्छे से...अनचुदी चुत है, फिर नही मिलेगी...पुरी जीभ पेल कर घुमाओ...गरम हो जायेगी तब खुद..."

मुन्ना भी चाहता था की, बसन्ती को पुरा गरम कर दे. फिर उसको भी आसानी होगी अपना लंड उसकी चुत में डालने में यही सोच, उसने अपनी एक उन्गली को मुंह में डाल, थुक से भीगा कर कच से बसन्ती की चुत में पेल दी, और टीट के उपर अपनी जीभ लफर लफर करते हुए चलाने लगा।

उन्गली जाते ही बसन्ती सिसक उठी। पहली बार कोई चीज उसकी चुत के अन्दर गई थी। हल्का सा दर्द हुआ, मगर फिर कच-कच चलती हुई उन्गली ने चुत की दिवारों को ऐसा रगडा की, उसके अन्दर आनन्द की एक तेज लहर दौड गई। ऐसा लगा जैसे चुत से कुछ निकलेगा, मगर तभी मुन्ना ने अपनी उन्गली खींच ली और भगनशे पर एक जोर दार चुम्मा दे, उठ कर बैठ गया।

मजे का सिलसिला जैसे ही टुटा, बसन्ती की आंखे खुल गई। मुन्ना की ओर आशा भरी नजरो देखा।

"मजा आया, बसन्ती रानी...!!?"

"हाये मालिक...सीएएएए", करके दोनो जांघो को भींचती हुई बसन्ती शरमाई।

"अरे, शरमाती क्यों है ?,...मजा आ रहा है तो खुल के बता...और चाटु,,,??"

"हाय मालिक...,! मैं नही जानती...",
कह कर अपने मुंह को दोनो हाथो से ढक कर, लाजवन्ती की गोद में एक अन्गडाई ली।

"तेरी चुत तो पानी फेंक रही है."

बसन्ती ने जांघो को और कस कर भींचा, और लाजवन्ती की छाती में मुंह छुपा लिया।

मुन्ना समझ गया की, अब लंड खाने लायक तैयार हो गई है। दोनो जांघो को फिर से खोल कर, चुत की फांको को चुटकी में पकड कर, मसलते हुए बुर के भगनशे को अंगुठे से कुरेदा और आगे झुक कर बसन्ती का एक चुम्मा लिया। लाजवन्ती दोनो चुचियों को दोनो हाथों में थाम कर दबा रही थी। मुन्ना ने फिर से अपनी दो उन्गलियां उसकी चुत में पेल दी, और तेजी से चलाने लगा। बसन्ती सिसकने लगी।

"हाये मालिक, निकल जायेगा,,!!??... सीएएएए. हाय मालिक..."

"क्या निकल जायेगा...???,,, पेशाब करेगी क्या...??"

"हां मालिक,,,,, सीएएएए, पेशाब निकल..."
मुन्ना ने सटक से उन्गली खींच ली।

"ठिक है, जा पेशाब कर के आ जा,,,... मैं तब तक भौजी को चोद देता हुं ..."

लाजवन्ती ने बसन्ती को झट से गोद से उतार दिया, और बोली,
"हां मालिक,,,,, बहुत पानी छोड रही है..."

उन्गली के बाहर निकालते ही, बसन्ती आसमान से धरती पर आ गई। पेशाब तो लगा नही था, चुत अपना पानी निकालना चाह रही थी. ये बात उसकी समझ में तुरन्त आ गई। मगर तब तक तो पासा पलट चुका था।

उसने देखा की लाजवन्ती अपनी दोनो टांगे फैला कर लेट गई थी, और मुन्ना, लाजवन्ती की दोनो जांघो के बीच लंड को बुर की छेद पर टीका, दोनो चुचीं दोनो हाथों में थाम कर पेलने ही वाला था। बसन्ती एकदम जल-भुन कर कोयला हो गई। उसका जी कर रहा था की लाजवन्ती को धकेल कर हटा दे, और खुद मुन्ना के सामने लेट जाये, और कहे की मालिक मेरी में डाल दो।

तभी लाजवन्ती ने बसन्ती को अपने पास बुलाया,
"हाय बसन्ती, आ ईधार आ कर देख, कैसे छोटे मालिक मेरी में डालते है...?। तेरी भी ट्रेईनिन्ग...।"

बसन्ती मन मसोस कर सरक कर, मन ही मन गाली देते हुए लाज्वन्ती के पास गई, तो उसने हाथ उठा उसकी चुंची को पकड लिया और बोली,
"देख, कैसे मालिक अपना लंड मेरी चुत में दालते है ?!, ऐसे ही तेरी चुत में भी..."

मुन्ना ने अपना फनफनाता हुआ लंड उसकी चुत से सटा, जोर का धक्का मरा. एक ही झटके में कच से पुरा लंड उतार दिया। लाजवन्ती कराह उठी,
"हाये मालिक, एक ही बार में पुरा ...!!... सीएएएएए,,,"

"साली. इतना नाटक क्यों चोदती है? अभी भी तेरे को दर्द होता है ...??"

"हाये मालिक, आपका बहुत बडा है ...!।" फिर बसन्ती की ओर देखते हुए बोली,
"...तु चिन्ता मत कर. तेरी में धीरे-धीरे खुद हाथ से पकड के डलवाउन्गी... तु जरा मेरी चुंची चुस"।

मुन्ना अब धचा-धच धक्के मार रहा था। कमरे में लाजवन्ती की सिसकारीयां और धच-धच फच-फच की आवज गुंज रही थी।

"हाये मालिक, जोर...। और जोर से चोदो मालिक......हाये सीएएएएएए,,,"

"हां मेरी छिनाल भौजी, तेरी तो आज फाड ही दुन्गा...। बहुत खुजली है ना तेरी चुत में !!?...ले रण्डी...खा मेरा लौडा...सीएएएए कितना पानी छोडती है !!?......कन्जरी."

"हाये मालिक .आज तो आप कुछ ज्यादा ही जोश में...। हाय, फाड दो मालिक,,"

"हाय भौजी, मजा आ गया...। तुने ऐसी कचोडी जैसी चुत के दर्शन करवाया है, की बस...लंड लोहा हो गया है...ऐसा हाये मजा आ रहा है ना भौजी...आज तो तेरी गांड भी मारुन्गा...। सीईईईईईईहयेएएएए,,,"

बसन्ती देख रही थी, की उसकी भाभी अपनी गांड हवा में लहरा-लहरा कर मुन्ना का लंड अपनी ढीली चुत में खा रही थी, और मुन्ना भी गांड उठा-उठा कर उसकी चुत में दे रहा था। मन ही मन सोच रही थी की, साला जोश में मेरी चुत को देख कर आया है, मगर चोद भाभी को रहा है। पता नही चोदेगा की नही।

करीब पंद्रह मीनट की धकम-पेल चोदा-चोदी के बाद लाजवन्ती ने पानी छोड दिया, और बदन अकडा कर मुन्ना की छाती से लिपट गई। मुन्ना भी रुक गया, वो अपना पानी आज बसन्ती की अनचुदी बुर में ही छोडना चाहता था। अपनी सांसो को स्थिर करने के बाद। मुन्ना ने उसकी चुत से लंड खींचा। पक की आवाज के साथ लंड बाहर निकल गया। चुत के पानी में लिपटा हुआ लंड अभी भी तमतमाया हुआ था. लाल सुपाडे पर से चमडी खिसक कर निचे आ गई थी। पास में पडी साडी से पोंछने के बाद, वहीं मसंद पर सिर रख कर लेट गया। उसकी सांसे अभी भी तेज चल रही थी। लाजवन्ती को तो होश ही नही था। आंखे मुन्दे, टांगे फैलाये, बेहोश पडी थी।

बसन्ती ने जब देखा की, मुन्ना अपना खडा लंड ले कर ऐसे ही लेट गया, तो उस से रहा नही गया। सरक कर उसके पास गई, और उसकी जांघो पर हल्के से हाथ रखा. मुन्ना ने आंखे खोल कर उसकी तरफ देखा, तो बसन्ती ने मुस्कुराते हुए कहा,
"हाये मालिक, मुझे बडा डर लग रहा है,,? ...आपका बहुत लम्बा !!..."

मुन्ना समझ गया की, साली को चुदास लगी हुई है। तभी खुद उसके पास आ कर बाते बना रही है की, मोटा और लम्बा है। मुन्ना ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया,
"अरे, लम्बे और मोटे लंड से ही तो मजा आता है. एक बार खा लेगी, फिर जिन्दगी भर याद रखेगी चल, जरा सा चुस तो ...। खाली सुपाडा मुंह में भर कर ... जैसे टौफी खाते है ना, वैसे ......"
कहते हुए, बसन्ती का हाथ पकड के खींच कर अपने लंड पर रख दिया।

बसन्ती ने शरमाते-सकुंचते अपने सिर को झुका दिया. मुन्ना ने कहा,
"अरे, शरमाना छोड रानी !।"
और उसके सिर को हाथो से पकड झुका कर, लंड का सुपडा उसके होठों पर रख दिया। बसन्ती ने भी अपने होंठ धीरे खोल कर लंड के लाल सुपाडे को अपने मुंह में भर लिया।

लाजवन्ती वहीं पास पडी, ये सब देख रही थी। थोडी देर में जब उसको होश आया, तो उठ कर बैठ गई और अपनी ननद के पास आ कर, उसकी चुत अपने हाथ से टटोलती हुई बोली,
"बहुत हुआ रानी, कितना चुसेगी ? ... अब जरा मुसल से कुटाई करवा ले,,"

और बसन्ती के मुंह को मुन्ना के लंड पर से हटा दिया. और मुन्ना का लंड पकड के हिलाती हुई बोली.
" हाये मालिक,,,... जल्दी करीये...बुर एकदम पनीया गई है ।"

"हां भौजी,,,... क्यों बसन्ती डाल दे ना ?..."

"हाये मालिक, मैं नही जानती,,,"

"... चोदे ना,,,??!!??"

"हाये,,...मुझे नही...जो आपकी मरजी हो,,..."

"अरे क्या मालिक ?, आप भी ...। चल आ बसन्ती, यहां मेरी गोद में सिर रख कर लेट.."

इतना कहते हुए लाजवन्ती ने बसन्ती को खींच कर, उसका सिर अपनी गोद में ले लिया और उसको लिटा दिया।

बसन्ती ने अपनी आंन्खे बन्ध कर लेटे ही दोनो पैर पसारे कर लेट गई थी। मुन्ना उसके पैरों को फैलाते हुए उनके बिच बैठ गया। फिर उसने बसन्ती के दोनो पैरों के टखनो को पकड कर उठाते हुए, उसके पैरों को घुटनो के पास से मोड दिया। बसन्ती मोम की गुडीया बनी हुइ, ये सब करवा रही थी। तभी लजवन्ती बोली,
"मालिक, इसकी गांड के निचे तकीया लगा दो ... आराम से घुस जायेगा ।"

मुन्ना ने लजवन्ती की सलह मान कर मसंद उठाया, और हाथो से थप-थपा कर, उसको पतला कर के बसन्ती के चुत्तडों के निचे लगा दिया। बसन्ती ने भी आराम से गांड उठा कर तकिया लगवाया। दोनो जांघो के बिच उसकी अनचुदी, हल्के झांठो वाली बुर चमचमा रही थी। चुत की दोनो गुलाबी फांके आपस में सटी हुई थी। मुन्ना ने अपना फनफनाता हुआ लौडा, एक हथ से पकड कर बुर के दपदपाते हुये फुलते पीचकते छेद पर लगा दिया और रगडने लगा।

बसन्ती गनगना गई। घुदगुदी के कारण अपनी जांघो को सिकोडने लगी। लाजवन्ती उसकी दोनो चुचियों को मसलते हुए, उनके निप्पल को चुटकी में पकड मसल रही थी।

"मालिक, नारियल तेल लगा लो.", लाजवन्ती बोली.

"चुत तो पानी फेंक रही है... इसी से काम चला लुन्गा."

"अरे नही. मालिक आप नही जानते. ... आपका सुपाडा बहुत मोटा है ... नही घुसेगा ... लगा लो."

मुन्ना उठ कर गया, और टेबल से नारियल तेल का दिब्बा उठा लाया। फिर बसन्ती की जांघो के बीच बैठ कर तेल हाथ में ले कर उसकी चुत के उपर मल दिया। फांको को थोडा फैला कर उसके अन्दर तेल टपका दिया।

"अपने सुपाडे और लौडे पर भी लगा लो मालिक." लाजवन्ती ने कहा।

मुन्ना ने थोडा तेल अपने लंड पर भी लगा दिया।

"बहुत नाटक हो गया भौजी, अब डाल देता हुं...."

"हां मालिक, डालो....." ,
कहते हुए लाजवन्ती ने बसन्ती की अनचुदी बुर के छेद की दोनो फांको को, दोनो हाथों की उन्गलियों से चीडोरा।

मुन्ना ने चीडोरे हुए छेद पर, सुपाडे को रख कर हल्का-सा धक्का दिया। कच से सुपाडा कच्ची बुर को चीरता अन्दर घुसा। बसन्ती तडप कर मचली, पर तब तक लाजवन्ती ने अपना हाथ चुत पर से हटा उसके कंधो को मजबूती से पकड लिया था। मुन्ना ने भी उसकी जांघो को मजबूती से पकड फैलाये रखा, और अपनी कमर को एक और झटका दिया। लंड सुपडे सहीत चार इंच अन्दर धस गया।

बसन्ती को लगा, बुर में कोइ गरम डन्डा डाल रहा है. मुंह से चीख निकल गई, "आआआ,,, मर !!! मरररर, गईईईईई,,, ।"

लाजवन्ती उसके उपर झुक कर, उसके होथों और गालों को चुमते हुए, चुंची दबाते हुए बोली,
"कुछ नही हुआ बिट्टो, कुछ नही ! ... बस दो सेकंड की बात है.।"

मुन्ना रुक गया. उसने नजरे उठा कर इशरा किया काम चालु रखो। मुन्ना समझ गया. और लौडा खींच कर धक्का मारा और आधे से अधिक लंड को धंस दिया। बसन्ती का पुरा बदन अकड गया था। खुद मुन्ना को लग रहा था, जैसे किसी जलते हुए लकडी के गोले के अन्दर लंड घुसा रहा है. सुपडे की चमडी पुरी उलट गई थी।

आज के पहले उसने किसी अनचुदी चुत में लंड नही डाला था। जिसे भी चोदा था, वो चुदा हुआ भोसडा ही था। बसन्ती के होठों को, लाजवन्ती ने अपने होठों के नीचे कस कर दबा रखा था. इसलिये वो घुटी-घुटी आवज में चीख रही थी, और छटपटा रही थी। मुन्ना उसकी इन् चीखो को सुन कर रुका, मगर लाजवन्ती ने तुरन्त मुंह हटा कर कहा,
"मालिक, झटके से पुरा डाल दो एक बार में,,,...। ऐसे धीरे-धीरे हलाल करोगे तो, और दर्द होगा साली को.. ... डालो.."

मुन्ना ने फिर कमर उठा कर, गांड तक का जोर लगा कर धक्का मारा। कच से नारियल तेल में दुबा लौडा बसन्ती की अनचुदी चुत की दिवारों को कुचलता हुआ अन्दर घुसता चला गया। बसन्ती ने पुरा जोर लगा कर, लाजवन्ती को धकेला और चिल्लायी,
"ओह्,, ...!!! मार् दियाआआअ ...! हरामी ने मार दिया ...। कुत्ती, साली, भौजी हरामजादी ......बचा लो ... आआ फाड दिया ... खून भी,,, ...,,"

लाजवन्ती ने जल्दी से उसका मुंह बन्ध करने की कोशीश की, मगर उसने हाथ झटक दिया।

मुन्ना अभी भी चुत में लौडा डाले, उसके उपर झुका था।

"लंड बाहर निकालो, मुझे नही चुदवाना,,,। भौजी को चोदो,,, । मालिक उतर जाओ,,। तुम्हारे पांव पडती हुं । मर जाउन्गी,,, ",
तब लाजवन्ती बोली,
"मालिक, रुको मत ... जल्दी-जल्दी धक्का मारो, मैं इसकी चुंची दबाती हु, ठीक हो जायेगा...."

बस, मुन्ना ने बसन्ती की कलाईयों को पकड निचे दबा दिया और कमर उठा-उठा कर आधा लंड खींच-खींच कर धक्के लगाना शुरु कर दिया। कुछ देर में सब ठीक हो गया। बसन्ती गांड उचकने लगी। चेहरे पर मुस्कान फैल गई। लौडा आरम से चुत के पानी में फिसलता हुआ, सटा-सट अन्दर बाहर होने लगा।

उस रात भर खुब रासलीला हुई। बसन्ती दो बार चुदी। छुत सूज गई मगर, दुसरी बार में उसको खुब मजा आया। बुर से निकले खून को देख पहले थोडा सहम गई, पर बाद में फिर खुल कर चुदवाई। सुबह चार बजे जब अगली रात फिर आने का वादा कर दोनो बिदा हुइ, तो बसन्ती थोडा लन्गडा कर चल रही थी मगर उसकी आंखो में अगली रात के इन्तजार का नशा थ। मुन्ना भी अपने आप को फिर से तरो ताजा कर लेना चाहता था, इसलिये घोडे बेच कर सो गया।

आम के बागीचे में मुन्ना की कारस्तानीयां एक हफ्ते तक चलती रही। मुन्ना के लिये, जैसे मौज-मजे की बहार आ गई थी। तरह तरह के कुटेव और करतूतो के साथ उसने लाजवन्ती और बसन्ती का खुब जम के भोग लगाया। पर एक ना एक दिन तो कुछ गडबड होनी ही थी, और वो हो गई।

एक रात जब बसन्ती और लाजवन्ती अपनी चुतो की कुटाई करवा कर अपने घर में घुस रही थी, की आया की नजर पड गई। वो उन दोनो के घर के पास ही रहती थी। उसके शैतानी दिमाग को एक झटका लगा की कहां से आ रही है, ये दोनो ?। लाजवन्ती के बारे में तो पहले से पता था की, गांव भर की रण्डी है। जरुर कहीं से चुदवा कर आ रही होगी। मगर जब उसके साथ बसन्ती को देखा तो सोचने लगी की, ये छोकरी उसके साथ कहां गई थी।

दुसरे दिन जब नदी पर नहाने गई तो, संयोग से लाजवन्ती भी आ गई। लाजवन्ती ने अपनी साडी, ब्लाउस उतारा और पेटीकोट खींच कर छाती पर बांध लिया। पेटीकोट उंचा होते ही आया की नजर लाजवन्ती के पैरों पर पडी। देखा पैरों में नयी चमचमाती हुयी पायल। और लाजवन्ती भी ठुमक-ठुमक चलती हुइ, नदी में उतर नहाने लगी।

"अरे बहुरिया, मरद का क्या हाल चल है ?..."

"ठीक ठाक है चाची, ...। परसो चिट्ठी आई थी...."

"बहुत प्यार करता है... और लगता है, खुब पैसे भी कमा रहा है.."

"का मतलब चाची ...?"

"वह बडी अन्जान बन रही हो बहुरिया, ? ... अरे, इतनी सुंदर पायल कहां से मिली ये तो ??..."

"कहां से का क्या मतलब चाची, ...!। जब आये थे, तब दे गये थे..."

"अरे, तो जो चीज दो महिने पहले दे गया था, उसको अब पहन रही है...."

लाजवन्ती थोडा घभरा गई, फिर अपने को स्म्भालते हुए बोली,
"ऐसे ही रखी हुई थी...। कल पहन ने का मन किया तो..."

आया के चेहरे पर कुटील मुस्कान फैल गई.

"किसको उल्लु बना...???। सब पता है, तु क्या-क्या गुल खिला रही है...??, हमको भी शिखा दे, लोगो से माल ऐठने के गुन.."

इतना सुनते ही लाजवन्ती के तन-बदन में आग लग गई।

"चुप साली, तु क्या बोलेगी ?...हरमजादी, कुतनी, खाली इधर की बात उधर करती रहती है ...।"

आया का माथा भी इतना सुनते घुम गया, और अपने बांये हाथ से लाजवन्ती के कन्धे को पकड, धकेलते हुए बोली,
"हरामखोर रण्डी,,,,...चुत को टकसाल बना रखा है...॥ मरवा के पायल मिली होगी, तभी इतनी आग लग रही है ।"

"हां, हां, मरवा के पायल ली है ॥ और भी बहुत कुछ लिया है...तेरी गांड में क्यों दर्द हो रहा है, चुगलखोर...?"

जो चुगली करे, उसे चुगलखोर बोल दो तो फिर आग लगना तो स्वाभावीक है।

"साली भोसडचोदी, मुझे चुगलखोर बोलती है. सारे गांव को बता दुन्गी बेटाचोदी, तु किससे-किससे से मरवाती फिरती है !!?"

इतनी देर में आस-पास की नहाने आई बहुत सारी औरते जमा हो गई। ये कोई नई बात तो थी नही, रोज तालाब पर नहाते समय किसी ना किसी का पंगा होता ही था, और अधनन्गी औरते एक दुसरे के साथ भिड जाती थी. दोनो एक दुसरे को नोच ही डालती, मगर तभी एक बुढिया बिच में आ गई। फिर और भी औरते आ गई, और बात सम्भल गई। दोनो को एक दुसरे से दूर हटा दिया गया।

नहाना खतम कर, दोनो वापस अपने घर को लौट गई. मगर आया के दिल में तो कांटा घुस गया था। इस गांव में और कोई इतना बडा दिलवाला है नही, जो उस रण्डी को पायल दे। तभी ध्यान आया की, चौधराईन का बेटा मुन्ना उस दिन खेत में पटक के जब लाजवन्ती की ले रहा था, तब उसने पायल देने की बात कही थी. कहीं उसी ने तो नही दी होगी ?!। फिर रात में लाजवन्ती और बसन्ती जिस तरफ से आ रही थी, उसी तरफ तो चौधरी का आम का बागीचा है।

बस फिर क्या था, अपने भारी भरखम पिछवाडे को मटकाते हुए सीधा चौधराईन के घर की ओर दौड पडी।

चौधराईन ने जब आया को देखा तो, उसके चेहरे पर मुस्कान फैल गई। हसती हुई बोली,
"क्या रे, कैसे रास्ता भुल गई ?...कहां गायब थी...?। थोडा जल्दी आती, अब तो मैने नहा भी लिया.."

माथे का पसिना पोंछती हुई आया बोली,
"का कहे मालकिन, घर का बहुत सारा काम ...। फिर तालाब पर नहाने गई तो वहां..."

"क्यों, क्या हुआ तालाब पर...?"

"छोडो मालकिन, तालाब के किस्से को. ये सब तो...अन्दर चलो ना, बिना तेल के थोडी बहुत तो सेवा कर दुं..."

"अरे नही, रहने दे ..."

पर आया के जोर देने पर शीला देवी ने पलन्ग पर लेट अपने पैर पसार दिये। आया पास बैठ कर शीला देवी के पैरों के तलवे को अपने हाथ में पकड हल्के हल्के मसलते हुए दबाने लगी।

शीला देवी ने आंखे बन्ध कर रखी थी। आया कुछ देर तक तो इधर उधर की बकवास करती रही, फिर पेट में लगी आग बुझाने के लिये बोली,
"मालकिन, मुन्ना बाबु कहां है ? नजर नही आते ... पहले तो गांव के लडको के साथ घुमते फिरते मिल जाते थे. अब तो ...।"

"उसके दिमाग का कुछ पता नहीं चलता ...। घर में ही होगा, अपने कमरे में सो रहा होगा॥"

"ये भी कोई टाईम है भला सोने का...?। रात में ठीक से सोते नहि का..."

"नही, सुबह में बडी जल्दी उठ जाता है...। इसलिये शायद दिन में सोता है, बेचारा..!"

"सुबह में जल्दी उठ जाते है, या फिर रात भर सोते ही नही है...!!।"
बांयी जांघ को धीरे धीरे दबाती हुई आया बोली।

"अरे, रात भर क्यों जागेगा भला ...?"

"मालकिन, जवान लडके तो रात में ही जागते है...",
कह कर दांत निकाल कर हसने लगी।

"चुप कमीनी, जब भी आती है...। उल्टा-सीधा ही बोलती है."

चौधराईन की ये बात सुन, आया दांत निकाल कर हसने लगी। शीला देवी ने आंखे खोल कर उसकी तरफ देखा, तो आंखे नचा कर बोली,
"बडी भोली हो आप भी, चौधराईइन ...। जवान लौंडो के लिये इस गांव में कोई कमी है, क्या ?...फिर अपने मुन्ना बाबु तो...। सारी कहानी तो आपको पता ही है..."

"चुप रह चोट्टी,,...तेरी बातो पर विस्वास कर के मैने क्या-क्या सोच लिया था ... मगर जिस दिन तु ये सब बता के गई थी, उसी दिन से मैं मुन्ना पर नजर रखे हुं। वो बेचारा तो घर से निकलता ही नही था। चुप-चाप घर में बैठा रहता था...। अगर मेरे बेटे को इधर-उधर मुंह मारने की आदत होती, तो घर में बैठा रहता"

(जैसा की आपको याद होगा मुन्ना जब अपनी मां के कमरे में आया के मालिश करते समय घुस गया था, और शीला देवी के मस्ताने रसिले रुप ने उसके होश उडा कर रख दिये थे, तो तीन-चार दिन तो ऐसे ही गुमसुम सा घर में घुसा रहा था)

"पता नही... मालकिन, मैने तो जो देखा था, वो सब बताया था ॥,अब अगर मैं बोलुन्गी की आज ही सुबह मैने मुन्ना बाबु को आम के बागीचे की तरफ से आते हुए देखा था, तो फिर...॥"

शीला देवी चौंक कर बैठती हुई बोली,
"क्या मतलब है तेरा...? वो क्यों जायेगा सुबह-सुबह बागीचे में !?"

"अब मुझे क्या पता क्यों गये थे ?... मैने तो सुबह में उधर से आते देखा, सो बता दिया. सुबह मैने लाजवन्ती और बसन्ती को भी आते हुए देखा थ ।... लाजवन्ती तो नई पायल पहन ठुमक-ठुमक कर चल रही थी ...॥"

बस इतना ही काफी था. शीला देवी, जो की अभी झपकी ले रही थी, उठ कर बैठ गई नथुने फुला कर बोली,
"एक नंबर की छिनाल है तु,,, ... हरामजादी,,,,, कुतिया, तु बाज नही आयेगी. ... ... रण्डी ... निकल अभी तु यहां से,,,,,,चल भाग ...। दुबारा नजर मत आना....."

शीला देवी दांत पीस-पीस कर मोटी-मोटी गालियां निकाल रही थी। आया समझ गई की अब रुकी तो खैर नही। उसने जो करना था कर दीया, बाकी चौधराईन की गालियां तो उसने कई बार खाई थी। आया ने तुरन्त दरवाजा खोला, और भाग निकली।

आया के जाने के बाद चौधराईन का गुस्सा थोडा शांत हुआ. ठन्डा पानी पी कर बिस्तर पर धम से गीर पडी। आंखो की नींद अब उड चुकी थी। कहीं आया सच तो नही बोल रही ?... उसकी आखिर मुन्ना से क्या दुश्मनी है, जो झुठ बोलेगी। पिछली बार भी मैने उसकी बातो पर विस्वास नही किया था। कैसे पता चलेगा ?

दिनु को बुलाया, फिर उसे एक तरफ ले जाकर पुछा। वो गभरा कर चौधराईन के पैरो में गीर पडा, और गिडगिडाने लगा,
"मालकिन, मुझे माफ कर दो ...। मैने कुछ नहि किया ...मालकिन, मुन्ना बाबु ने मुझे बागीचे पर जाने से मना किया ... मेरे से चाबी भी ले ली ... मै क्या करता ? ... उन्होंने किसी को बताने से मना ..."

शीला देवी का सिर चकरा गया। एक झटके में सारी बात समझ में आ गई।

कमरे में वापस आ कर, आंखो को बन्ध कर बिस्तर पर लेट गई। मुन्ना के बारे में सोचते ही उसके दिमाग में एक नन्गे लडके की तसवीर उभर आती थी. जो किसी लडकी के उपर चढा हुआ होता। उसकी कल्पना में मुन्ना एक नन्गे मर्द के रुप में नजर आ रहा था। शीला देवी बेचैनी से करवटे बदल रही थी. नींद उसकी आंखो से कोशो दुर जा चुकी थी।

उनको अपने बेटे पर गुस्सा भी आ रहा था, की रण्डीयों के चक्कर में इधर-उधर मुंह मारता फिर रहा है। फिर सोचती, मुन्ना ने किसी के साथ जबरदस्ती तो की नही. अगर गांव की लडकियां खुद मरवाने के लिये तैयार है, तो वो भी अपने आप को कब तक रोकेगा। नया लडका है, अखिर उसको भी गरमी चढती होगी, छेद तो खोजेगा ही ... घर में छेद नही मिलेगा तो बाहर मुंह मारेगा। क्या सच में मुन्ना का हथियार उतना बडा है ?, जीतना आया बता रही थी। बेटे के लंड के बारे में सोचते ही एक सिहरन सोइ दौड गई, साथ ही साथ उसके गाल भी लाल हो गये। एक मां हो कर अपने बेटे के ... औजार के बारे में सोचना ... करीब घंटा भर वो बिस्तर पर वैसे ही लेटी हुई. मुन्ना के लंड, और पिछली बार आया की सुनाई, चुदाई की कहानियों को याद करती, अपनी जांघो को भींचती करवटें बदलती रही।

खट-पट की आवाज होने पर शीला देवी ने अपनी आंखे खोली, तो देखा मुन्ना उसके कमरे के आगे से गुजर रहा था। शीला देवी ने लेटे-लेटे आवाज लगाई,
" मुन्ना,... मुन्ना, जरा इधर आ ...।

शीला देवी की आवाज सुनते ही उसके कदम रुक गये, और वो कमरे का दरवाजा खोल कर घुसा। शीला देवी ने उसको उपर से नीचे देखा, हाल्फ पेन्ट पर नजर जाते ही वो थोडा चौंक गई। ईस समय मुन्ना की हाल्फ पेन्ट में तम्बु बना हुआ था। पर अपने आप को सम्भाल थोडा उठती हुई बोली,
" इधर आ, जरा...।"

शीला देवी की नजरे अभी भी उसके तम्बु में बने खम्भे पर टीकी हुई थी। ये देख मुन्ना ने अपने हाथ को पेन्ट के उपर रख, अपने लंड को छुपाने की कोशीश की और बोला,
"जी,,,!... मांआआ क्या बात है...?"

मुन्ना, शीला देवी से डरता बहुत था। पेशाब लगी थी मगर बोल नही पाया, की मुझे बाथरुम जाना है।

लगता है, इसे पेशाब लगी है ... तभी हथियार खडा करके घुम रहा है. घर में अंडरवियर नही पहनता है शायद, ये सोच शीला देवी के बदन में सनसनी दौड गई। शायद आया ठीक कहती है।

"क्या बात है ?, तुझे बाथरुम जाना है क्या...??"

"नही नही मां, तुम बोलो ना, क्या बात है ?..."

अपने हाथो को पेन्ट के उपर रख कर, खडे लंड को छुपाने की कोशीश करने लगा। शीला देवी कुछ देर तक मुन्ना को देखती रही... फिर बोली,
"तु आज-कल इतनी जल्दी कैसे उठ जाता है !? फिर सारा दिन सोया रहता है, ... क्या बात है ?"

मुन्ना इस अचानक सवाल से घभरा गया, अटकते हुए बोला,
"कोई बात नही है मां, !... सुबह आंख खुल जाती है, तो फिर उठ जाता हुं..."

"तु बागीचे पर हर रोज जाता है, क्या...?"

इस सवाल ने मुन्ना को चौंका दीया। उसकी नजरे नीचे झुक गई। शीला देवी तेज नजरों से उसे देखती रही। फिर अपने पैर समेट ठीक से बैठते हुए बोली,
"क्या हुआ ?... मैं पुछ रही हुं, बागीचे पर गया था क्या ? जवाब दे,..."

"वो,,वो,,,मां,,,,बस थोडा...सुबह आंख खुल गई थी, टहलने च्,,चला गया..."

मुन्ना के चेहरे का रंग उड चुका था।

शीला देवी ने फिर कडकती आवाज में पुछा,
"तु रात में भी वहीं सोता है ना...?"

इस सवाल ने तो मुन्ना की गांड का बेन्ड बजा दीया। उसका कलेजा धक से रह गया। ये बात मम्मी को कैसे पता चली। हकलाते हुए जल्दी से बोल पडा
"नही...नही ... मां ...ऐसा...किसने...कहा...? मैं भला रात में वहां क्यों ...?"

"तो फिर दिनु झुठ बोल रहा है ?...चौधरी साहिब से पुछुं क्या,,,, उन्होंने किसको दी थी चाबी...?"

मुन्ना समझ गया की, अगर मम्मी ने चौधरी से पुछा तो वो तो शीला देवी के सामने झुठ बोल नही पायेन्गे, और उसकी चोरी पकडी जायेगी। साले दिनु ने फसा दीया। कल रात ही लाजवन्ती वादा करके गई थी, की एक नये माल को फसा कर लाउन्गी। सारा प्लान चौपट। तभी शीला देवी अपने तेवर थोडे ढीले करती हुई बोली,
"अपनी जमीन-जायदाद की देख भाल करना अच्छी बात है. तु आम के बागीचे पर जाता है...कोई बात नही, मगर मुझे बता देता...। किसी नौकर को साथ ले जाता..."

"नौकरो को वहां से हटाने के लिये ही तो मैं वहां जाता हुं...सब चोर है."

मुन्ना को मौका मिल गया था, और उसने टपक से बहाना बना लिया।

"तो ये बात तुने मुझे पहले क्यों नही बताई...?"

"वो मां, मां मैं डर गया था की तुम गुस्सा करोगी..."

"ठीक है. जा अपने कमरे में बैठ, बाद में बात करती हुं तेरे से...कहीं जाने की जरुरत नही है, और खबरदार जो दिनु को कुछ बोला तो...!।

मुन्ना चुपचाप अपने कमरे में आ कर बैठ गया, समझ में नहीं आ रहा था की क्या करे। इधर शीला देवी के मन में हलचल मच गई थी। अब उसे पुरा विस्वास हो गया था की, जो कुछ भी आया बोल रही थी, वो सच था।

मुन्ना हर रोज बागीचे पर जाकर, रात भर किसी के साथ मजा करता है। गांव में रण्डीयों की कोई कमी नही है, एक खोजेगा हजार मिलेन्गी। उसने कल्पना में मुन्ना के हथियार के बारे में सोचने की कोशिश की। फिर खुद से शरमा गई। उसने आज तक उतना बडा लंड नही देखा था, जीतने बडे लंड के बारे में आया ने कहा था। उसने तो आज तक केवल अपने पति चौधरी का लौडा देखा था. जो लगभग ६ इंच का रहा होगा। और अब तो वो ६ इंच का लौडा भी पता नही किसकी गांड में घुस गया था, कभी बाहर निकलता ही नही था। पता नही कितने दिन, महिने या साल बीत गये, उसे तो याद भी नही है, जब आखरी बार कोई हथियार उसके बील में घुसा था।

ये सब सोचते-सोचते जांघो के बीच सुरसुराहट हुइ। साडी के उपर से ही हाथ लगा कर अपनी चुत को हल्का सा दबाया, चुत गीली हो चुकी थी। बेटे के लंड ने बेचैनी इतनी बढा दी की रहा नही गया, और बिस्तर से उठ कर बाहर निकली। मुन्ना के कमरे का दरवाजा थोडा खुला हुआ था। धीरे से अन्दर घुसी तो देखा, मुन्ना बिस्तर पर आंखो के उपर हाथ रख कर लेटा हुआ, एक हाथ पेन्ट के अन्दर घुसा कर हल्के हल्के चला रहा था। खडा लंड पेन्ट के उपर से दिख रहा था।

शीला देवी के कदम वहीं जमे रह गये, फिर दबे पाओं वापस लौट गई। बिस्तर पर लेट ते हुए सोचने लगी, पता नही कितनी गरमी है इस लडके में। शायद मुठ मार रहा था। जबकी इसने रात में ही दो-दो लडकियों की चुदाई की होगी।

जब जवान थी, तब भी चौधरी ज्यादा से ज्यादा रात भर में उसकी दो बार लेता था. वो भी शुरु के एक महिने तक। फिर पता नही क्या हुआ, कुछ दिन बाद तो वो भी खतम हो गया. हफ्ते में दो बार, फिर घट कर एक बार से कभी-कभार में बदल गया। और अब तो पता नही कितने दिन हो गये।

आज तक जिन्दगी में बस एक ही लौडे से पाला पडा था। जबकी अगर आया की बातो पर विस्वास करे तो, गांव की हर औरत कम से कम दो लंडो से अपनी चुत की कुटाई करवा रही थी। उसी की किस्मत फूटी हुइ थी।

कुछ रण्डीयों ने तो अपने घर में ही इन्तेजाम कर रखा था। यहां तो घर में भी कोई नही, ना देवर ना जेठ । एक लडका जवान हो गया है !... मगर वो भी बाहर की रण्डीयों के चक्कार में...॥ मेरी तरफ तो किसी का...अपने घर का माल है... मगर बेटा है, कैसे उसके साथ...उसका दिमाग घुम फिर कर मुन्ना के औजार की तरफ पहुंच जाता था।

उत्तेजना अब उसके उपर हावी हो गई थी। चुत पसीज कर पानी छोड रही थी। दरवाजा बन्ध कर, साडी उठा कर, अपनी दो उन्गलियों को चुत में डाल कर भगनशे को सहलाते हुए रगडने लगी। उन्गली को मुन्ना का लंड समझ कच-कच कर, चुत में जब अन्दर बाहर किया तो पुरे बदन में आग लग गई। बेटे के लंड से चुदवाने के बारे में सोचने से ही इतना मजा आ रहा था की, वो एकदम छटपटा गई।

एक हाथ पकड अपनी चुंची को खुद से पुरी ताकत से मसल दिया... मुंह से आह निकल गई। उसके बदन में कसक उठने लगी। दिल कर रहा था, कोई मर्द उसे अपनी बाहों में जाकर उसकी हड्डियां तर-तरा दे। उसकी इन उठी हुइ, नुकिली चुचियों को अपनी छाती से दबा कर मसल दे...। चुत में चींटीयां सरसराने लगी थी। गांड में सुरसुरी होने लगी थी। भगनशा खडा होकर लाल हो चुका था, और चाह रहा था की कोई उसे मसल कर उसकी गरमी शांत कर दे...।

मगर अफसोस, हाथ का सहारा ही उसके पास था। छटपटा ते हुए उठी, और कीचन में जा एक बैगन उठा लाई और कोल्ड क्रीम चुपड कर अपनी चुत में डालने की कोशिश की। मगर अभी थोडा सा ही बैगन गया था की, चुत में छिलकन सी महसुस हुइ, दोनो टांगे फैला कर चुत को देखने लगी। बैगन को थोडा और ठेला तो समझ में आ गया की, इतने दिनो से मशीन बन्ध रहने के कारण छेद सिकुड गया है।

"...! मोटा लौडा मिल जाये, फिर चाहे किसी का...। इससस्,,,,,,। उफफ्फ्,,,,,,। मैं भी कैसी छिनाल...पर अब सहा नही जा रहा...कितने दिनो तक छेद और मुंह बन्ध...कर के...??!!॥"

चुत लंड मांग रही थी. चुत के कीडे मचल रहे थे. बुर की गुलाबी पत्तीयां फरक कर अपना मुंह खोल रही थी। उसकी मशीन ओईलिन्ग मांग रही थी। बेटे के लण्ड ने इतने दिनो से दबी-कुचली हुइ भावनाओं को भडका दिया था। कुछ देर बाद जैसे-तैसे बैगन पेल कर चुत के अन्दर बाहर करते हुए, अपने आप को सन्त्रुष्ट कर वैसे ही अस्त व्यस्त हालत में सो गई।

शाम हो चुकी थी और शीला देवी बाहर नही निकली। गांव में तो लोग शाम सात-आठ बजे ही खाना खा लेते है। सावन का महिना था, बादलों के कारण अन्धेरा जल्दी हो गया था, गरमी भी बहुत लग रही थी। मुन्ना अपने कमरे से निकला देखा, मां का कमरा अभी भी बन्ध है. घर में अभी तक खाना बनाने की खट-पट शुरु हो जाती थी।

चक्कर क्या है !, ये सोच उसने हल्के-से शीला देवी के कमरे के दरवाजे को धकेला दरवाजा खुल गया। दर-असल शीला देवी जब कीचन से बैगन ले कर वापस आई थी, तो फिर दरवाजा बन्ध करना भुल गई थी। अन्दर झांकते ही ऐसा लगा जैसे लंड पानी फेंक देगा।

मुन्ना की आंखो के सामने पलंग पर, उसकी मां आस्त-व्यस्त हालत में लेटी हुइ नाक बजा रही थी। साडी उसकी जांघो तक उठी हुइ थी, और आंचल एक तरफ लुढका पडा था, और ब्लाउस के बटन खुले हुए थे. एक चुंची पर से ब्लाउस का कपडा हटा हुआ था, जीसके कारण काले रंग की ब्रा दिख रही थी।

शीला देवी एकदम गहरी नींद में थी। हर सांस के साथ उसकी नुकिली छातीयां उपर नीचे हो रही थी। मुन्ना की सांस रुक गई। उस दिन आया जब मालिश कर रही थी, तब उसने पहली बार अपनी मां को अर्धनग्न देखा था। उस दिन वो बस एक झलक ही देख पाया था, और उसके होश उड गये थे। आज शीला देवी आराम से सोई हुइ थी। वो बिना किसी लाज-शरम आंखे फाड उसको निहाराने लगा। ब्रा के अन्दर से झांकती गोरी चुंची, गुदाज पेट और मोटी-मोटी जांन्घो ने उसके होश उडा दिये। मोटी मांसल, गोरी, चिकनी जांघे... मामी की जांघ से थोडा सा ज्यादा मोटी ...चुंची भी एकदम ठोस नुकिली...

"काश, ये साडी थोडी और उपर होती !! उफफ्,,,,, ये बैगन यहां पलंग पर क्या कर रहा है ?"

...अभी मुन्ना सोच ही रहा था की, कमरे के अन्दर घुस कर पलंग के नीचे बैठ, दोनो टांगो के बीच देखु।

"छोटे मालिक,,,,, मालकिन को जगाओ,,,,,, क्या खाना बनाना है ? जरा पुछो तो सही...",
पिछे से एक बुढीया नौकरानी की आवाज सुनाई दी.

"आ,,,,!,,,हां,,,,!हां,,,,!" अभी जगाता हुं....",
कहते हुए मुन्ना ने दरवाजे पर दस्तक दी। शीला देवी एकदम हडबडाते हुए उठ कर बैठ गई. झट से अपनी साडी को नीचे किया, आंचल को उठा छाती पर रखा.

" आ हां,,,,,क्या बात है...?"

"मां, वो नौकरानी पुछ रही है...क्या खाना बनेगा ?...अन्धेरा हो गया... मैने सोचा तुम इतनी देर तक तो..."

"पता नही, क्यों आज,,,आंख लग गई थी। अभी बताती हुं उसको,,,,..."

और पलंग से नीचे उतर गई। मुन्ना जल्दी से अपने कमरे में भाग गया। पेन्ट खोल कर देखा तो लंड लोहा बना हुआ था, और सुपाडे पर पानी की दो बुंदे छलक आई थी।

खाना खाने के बाद शीला देवी मुन्ना के कमरे में गई, और पुछा,
"आज बागीचे पर नही जायेगा क्या...?"

मुन्ना ने तो बागीचे पर जाने का ईरादा ही छोड दीया था। वो समझ गया था की भले ही शीला देवी ने कुछ बोला नही, फिर भी उसके कारनामो की खबर उसको जरुर हो गई होगी।

"जाना तो था...मगर, आप तो मना कर रही...।

"नही, मैने कब मना किया !...वैसे भी, बहुत आम चोरी हो रहे है...कम से कम तु देख भाल तो कर लेता है..."

मुन्ना खुशी से उछल पडा, "तो फिर मैं जाउं...?"

"हां हां...जा, जरुर जा,,,,...और किसी नौकर को भी साथ लेता जा..."

"अरे मां, उसकी कोई जरुरत नही है... मैं अभी निकलता हुं..."
कहते हुए मुन्ना उठ कर लुन्गी पहन ने लगा। शीला देवी अपने बेटे के मजबुत बदन को घुरती हुइ बोली,
"ना ना, अकेले तो जाना ही नही है...। किसी नौकर को नही ले जाना तो मैं चलती हुं ..."

इस धमाके ने मुन्ना के लुन्गी की ओर बढते हाथो को रोक दीया। कुछ देर तक तो वो शीला देवी का चेहरा अश्चर्य से देखता रह गया। फिर अपने आप को सम्भालते हुए बोला,
"ओह मां, तुम वहां क्या करने जाओगी ?...मैं अकेला ही..."

"नही, मैं भी चलती हुं...बहुत टाईम हो गया...बहुत पहले गर्मीयों में कई बार चौधरी साहिब के साथ वहां पर सोई हुं...कई बार तो रात में ही हमने आम तोड के खाये है...चल मैं चलती हुं.."

मुन्ना विरोध नही कर पाया।

"ठहर जा, जरा टोर्च तो ले लुं..."

फिर शीला देवी टोर्च लेकर मुन्ना के साथ निकल पडी। शीला देवी ने अपनी साडी बदल ली थी, और अपने आप को संवार लिया था। मुन्ना ने अपनी मां को नजर भर कर देखा एकदम बनी ठनी, बहुत खुबसुरत लग रही थी। मुन्ना की नजरो को भांपते हुए वो हसते हुए बोली,
"क्या देख रहा है...?"

हसते समय शीला देवी के गालो में गड्ढे पडते थे।

" कुछ नही. मैं सोच रहा था, तुम्हे कहीं और तो नही जाना..."

शीला देवी के होठों पर मुस्कुराहट फैल गई। हसते हुए बोली,
"ऐसा क्यों...?, मैं तो तेरे साथ बागीचे पर चल रही हुं।"

"नहीं, तुमने साडी बदली हुइ है, तो..."

"वो तो ऐसे ही बदल लिया...क्यों,,,अच्छा नही लग रहा...??"

"नही, बहुत अच्छा लग रहा है...तुम बहुत सुंदर...",
बोलते हुए मुन्ना थोडा शरमाया तो शीला देवी ने हल्के हस दी। शीला देवी के गालो में पडते गड्ढे देख, मुन्ना के बदन में सिहरन दौड गई।

मुन्ना थोडा धीरे चल रहा था। मां के पिछे चलते हुए, उसके मस्ताने मटकते चुतडों पर नजर पडी तो, उसका मन किया की धीरे से पिछे से शीला देवी को पकड ले, और लंड को गांड की दरार में लगा कर, प्यार से उसके गालो को चुसे। उसके गालो के गड्ढे में अपनी जीभ डाल कर चाट ले। पिछे से सारी उठा कर उसके अन्दर अपना सिर घुसा दे, और दोनो चुतडों को मुट्ठी में भर कर मसलते हुए, गांड की दरार में अपना मुंह घुसा दे।

बहुत दिन हो गया था किसी की गांड चाटे, पर इसके लिये उर्मिला देवी जैसी खुबसुरत गदराई जवानी भी तो चाहिये। मामी के साथ बिताये पल याद आ गये. जब वो किचन में काम करती मुन्ना पिछे से गाउन उठा उसके अन्दर घुस कर चुत और गांड चाटता था। मां की तो मामी से भी दो कदम आगे होगी। कितनी गठीली और सुन्दर लग रही हई। लुन्गी के अन्दर लंड तो फडफडा रहा था, मगर कुछ कर नही शकता था।

आज तो लजवन्ती का भी कोई चांस नही था। तभी ध्यान आया की लाजवन्ती को तो बताया ही नही। डर हुआ की, कहीं वो मां के सामने आ गई तो क्या करुन्गा। और वही हुआ. बागीचे पर पहुंच कर खलिहान या मकान जो भी कहीये उसका दरवाजा ही खोला था, की बागीचे की बाउन्ड्री का गेट खोलती हुइ लाजवन्ती और एक ओर औरत घुसी।।

अन्धेरा तो बहुत ज्यादा था, मगर फिर भी किसी बिजली के खम्भे की रोशनी बागीचे में आ रही थी। शीला देवी ने देख लिया और बोली,
"कौन घुस रहा है बागीचे में,,,,,...?"

मुन्ना ने भी पलट कर देखा, तुरन्त समझ गया की लाजवन्ती होगी। इस से पहले की कुछ बोल पाता, शीला देवी की कडकती आवाज पुरे बागीचे में गुंज गई,
"कौन है, रे ?!!!...ठहर. अभी बताती हुं।"

इसके साथ ही शीला देवी ने दौड लगा दी,
" साली, आम चोर कुतिया,,,,,!। ठहर वहीं पर...!।"

भागते-भागते एक डन्डा भी हाथ में उठा लिया था। शीला देवी की कडकती आवाज जैसे ही लाजवन्ती के कानो में पडी, उसकी तो गांड का पाखाना तक सुख गया। अपने साथ लाई औरत का हाथ पकड, घसीटती हुइ बोली,
"ये तो चौधराईन...है...। चल भाग..."

दोनो औरते बेतहाशा भागी। पिछे शीला देवी हाथ में डन्डा लिये गालियों की बौछार कर रही थी। दोनो जब बाउन्ड्री के गेट के बाहर भाग गई तो शीला देवी रुक गई। गेट को ठीक से बन्ध किया और वापस लौटी। मुन्ना खलिहान के बाहर ही खडा था। शीला देवी की सांसे फुल रही थी। डन्डे को एक तरफ फेंक कर, अन्दर जा कर धम से बिस्तर पर बैठ गई और लम्बी-लम्बी सांसे लेते हुए बोली,
"साली हरामजादीयां,,,,,, देखो तो कितनी हिम्मत है !?? शाम होते ही आ गई चोरी करने !,,,,,अगर हाथ आ जाती तो सुअरनियों की गांड में डन्डा पेल देती...हरामखोर साली, तभी तो इस बागीचे से उतनी कमाई नही होती, जीतनी पहले होती थी...। मादरचोदियां, अपनी चुत में आम भर-भर के ले जाती है...रण्डीयों का चेहरा नही देख पाई..."

मुन्ना शीला देवी के मुंह से ऐसी मोटी-मोटी भद्दी गालियों को सुन कर सन्न रह गया। हालांकी वो जानता था की उसकी मां कडक स्वभाव की है, और नौकर चाकरो को गलियाती रहती है. मगर ऐसी गन्दी-गन्दी गालियां उसके मुंह से पहली बार सुनी थी, हिम्मत करके बोला,

"अरे मां, छोडोना तुम भी...भगा तो दीया...अब मैं यहां आ रहा हु ना. देखना इस बार अच्छी कमाई..."

"ना ना,,,,,ऐसे इनकी आदत नही छुटने वाली...जब तक पकड के इनकी चुत में मिर्ची नही डालोगे ना बेटा, तब तक ये सब भोसडचोदीयां ऐसे ही चोरी करने आती रहेन्गी...। माल किसी का, खा कोई और रहा है..."

मुन्ना ने कभी मां को ऐसे गालियां देते नही सुना था। बोल तो कुछ सकता नही था, मगर उसे उर्मिला देवी यानी अपनी प्यारी छिनाल, चुदक्कड मामी की याद आ गई. जो चुदवाते समय अपने सुंदर मुखडे से जब गन्दी-गन्दी बाते करती थी, तब उसका लंड लोहा हो जाता था।

शीला देवी के खुबसुरत चेहरे को वो एक-टक देखने लगा. भरे हुए कमानीदार होठों को बिचकाती हुइ, जब शीला देवी ने दो-चार और मोटी गालियां निकाली तो उसके इस छिनालपन को देख मुन्ना का लंड खडा होने लगा। मन में आया उसके उन भरे हुए होठों को अपने होठों में कस ले और ऐसा चुम्मा ले की होठों का सारा रस चुस ले। खडे होते लंड को छुपाने के लिये जल्दी से बिस्तर पर अपनी मां के सामने बैठ गया।

शीला देवी की सांसे अभी काफि तेज चल रही थी, और उसका आंचल नीचे उसकी गोद में गीरा हुआ था। मोटी-मोटी चुचियां हर सांस के साथ उपर नीचे हो रही थी। गोरा चिकना मांसल पेट। मुन्ना का लंड पुरा खडा हो चुका था।

तभी शीला देवी ने पैर पसारा और, अपनी साडी को खींचते हुए घुटनो से थोडा उपर तक चढा, एक पैर मोड कर, एक पैर पसार कर, अपने आंचल से माथे का पसिना पोंछती हुइ बोली,
"हरामखोरो के कारण दौडना पड गया...बडी गरमी लग रही है. खिडकी खोल दे, बेटा।"

जल्दी से उठ कर खिडकी खोलने गया। लंड ने लुन्गी के कपडे को उपर उठा रखा था, और मुन्ना के चलने के साथ हील रहा था। शीला देवी की आखों में अजीब सी चमक उभर आई थी. वो एकदम खा जाने वाली निगाहों से लुन्गी के अन्दर के डोलते हुए हथियार को देख रही थी। मुन्ना जल्दी से खिडकी खोल कर बिस्तर पर बैठ गया, बाहर से सुहानी हवा आने लगी। उठी हुइ साडी से शीला देवी की गोरी मखमली टांगे दीख रही थी।

शीला देवी ने अपने गरदन के पसीने को पोंछते हुए, अपनी ब्लाउस के सबसे उपर वाले बटन को खोल दिया और साडी के पल्लु को ब्लाउस के भीतर घुसा पसीना पोंछने लगी। पसीने के कारण ब्लाउस का उपरी भाग भीग चुका था। ब्लाउस के अन्दर हाथ घुमाती बोली,
"बहुत गरमी है,,,,!! बहुत पसीना आ गया ।"

मुन्ना मुंह फेर ब्लाउस में घुमते हाथ को देखता हुआ, भोंचक्का सा बोल पडा,
"हां,,,,!! अह,,, पुरा ब्लाउस भीग,,,,गया..."

"तु शर्ट खोल दे...बनियान तो पहन ही रखी होगी...?!।"

साडी को और खींचती, थोडा सा जांघो के उपर उठाती शीला देवी ने अपने पैर पसारे.

"साडी भी खराब हो...। यहां रात में तो कोई आयेगा नही..."

"नही मां, यहां...रात में कौन..."

"पता नही, कहीं कोई आ जाये...। किसी को बुलाया तो नही...?"

मुन्ना ने मन ही मन सोचा, जीसको बुलाया था उसको तो भगा दिया, पर बोला, "नही,,,नही,,,!!...किसी को नही बुलाया...!"

"तो, मैं भी साडी उतार देती हुं..."
कहती हुइ उठ गई और साडी खोलने लगी।

मुन्ना भी गरदन हिलाता हुआ बोला,
"हां मां,,,,फिर पेटिकोट और ब्लाउस...सोने में भी हल्का..."

"हां, सही है...। पर, तु यहां सोने के लिये आता है ?...सो जायेगा तो फिर रखवाली कौन करेगा...???"

"मैं, अपने सोने की बात कहां कर रहा हुं !...तुम सो जाओ...मैं रखवाली करुन्गा..."

"मैं भी तेरे साथ रखवाली करुन्गी..."

"तब तो हो गया काम...तुम तो सब के पिछे डन्डा ले कर दौडोगी..."

"क्यों, तु नही दौडता डान्डा ले कर...? मैने तो सुना है, गांव की सारी छोरियों को अपने डन्डे से धमकाया हुआ है, तुने !!!?"

मुन्ना एकदम से झेंप गया,
"धत् मां,,,,...क्या बात कर रही हो...?"

"इसमे शरमाने की क्या बात है ?... ठीक तो करता है. अपना आम तुझे खुद खाना है...। सब चुतमरानियों को ऐसे ही धमका दीया कर...।"

मुन्ना की रीड की हड्डीयों में सिहरन दौड गई। शीला देवी के मुंह से निकले इस चुत शब्द ने उसे पागल कर दीया। उत्तेजना में अपने लंड को जांघो के बीच जोर से दबा दीया। चौधराईन ने साडी खोल एक ओर फेंक दीया, और फिर पेटिकोट को फिर से घुटने के थोडा उपर तक खींच कर बैठ गई, और खिडकी के तरफ मुंह घुमा कर बोली,
"लगता है, आज बारिश होगी ।"

मुन्ना कुछ नही बोला. उसकी नजरे तो शीला देवी की गोरी-गठीली पिन्डलियों का मुआयेना कर रही थी। घुमती नजरे जांघो तक पहुंच गई और वो उसी में खोया रहता, अगर अचानक शीला देवी ना बोल पडती,
"बेटे, आम खायेगा...!!?"

मुन्ना ने चौंक कर नजर उठा कर देखा, तो उसे ब्लाउस के अन्दर कसे हुए दो आम नजर आये. इतने पास, की दिल में आया मुंह आगे कर चुचियों को मुंह में भर ले. दुसरे किसी आम के बारे में तो उसका दिमाग सोच भी नही पा रहा था. हडबडाते हुए बोला,
"आम,,,,? कहां है, आम...? अभी कहां से...?"

शीला देवी उसके और पास आ, अपनी सांसो की गरमी उसके चेहरे पर फेंकती हुइ बोली,
"आम के बागीचे में बैठ कर...आम ढुंढ रहा है...!!!!",
कह कर मुस्कुराई......।

"पर, रात में,,,,,,आम !?",
बोलते हुए मुन्ना के मन में आया की गड्ढे वाले गालो को अपने मुंह में भर कर चुस लुं।

धीरे से बोली,
"रात में ही खाने में मजा आता है...चल बाहर चलते है...",
कहती हुइ, मुन्ना को एक तरफ धकेलते बिस्तर से उतरने लगी।

इतने पास से बिस्तर से उतर रही थी, की उसकी नुकिली चुचियों ने अपनी चोंच से मुन्ना की बाहों को छु लिया। मुन्ना का बदन गनगना गया। उठ ते हुए बोला,
"क्या मां,,,,,तुम भी क्या-क्या सोचती रहती हो ?...इतनी रात में आम कहां दिखेन्गे ?"

"ये टोर्च है ना,,,,,,बारिश आने वाली है...जीतने भी पके हुए आम है, गीर कर खराब हो जायेन्गे...।"
और टोर्च उठा बाहर की ओर चल दी।

आज उसकी चाल में एक खास बात थी. मुन्ना का ध्यान बराबर उसकी मटकती, गुदाज कमर और मांसल हिलते चुतडों की ओर चला गया। गांव की उनचुदी, जवान लौंडियों को चोदने के बाद भी उसको वो मजा नही आया था, जो उसे उसकी मामी उर्मिला देवी ने दीया था।

इतनी कम उम्र में ही मुन्ना को ये बात समझ में आ गई थी, की बडी उम्र की मांसल, गदराई हुइ औरतों को चोदने में जो मजा है, वो मजा दुबली-पतली अछूती उनचुदी चुतो को चोदने में नही आता । खेली-खाई औरते कुटेव करते हुए लंड डलवाती है, और उस समय जब उनकी चुत फच-फच...गच-गच अवाज निकालती है, तो फिर घंटो चोदते रहो...उनके मांसल, गदराये जिस्म को जीतनी मरजी उतना रगडो।

एकदम गदराये-गठीले चुतड, पेटिकोट के उपर से देखने से लग रहा था की हाथ लगा कर अगर पकडे, तो मोटी मांसल चुतडों को रगडने का मजा आ जायेगा। ऐसे ठोस चुतड की, उसके दोनो भागो को अलग करने के लिये भी मेहनत करनी पडेगी। फिर उसके बीच गांड का दुपदुपाता हुआ छोटा सा भुरे रंग का छेद बस मजा आ जाये।

लुन्गी के अन्दर लंड फनफाना रहा था। अगर शीला देवी उसकी मां नही होती तो अब तक तो वो उसे दबोच चुका होता। इतने पास से केवल पेटिकोट-ब्लाउस में पहली बार देखने का मौका मिला था। एकदम गदराई-गठीली जवानी थी। हर अंग फडफडा रहा था। कसकती हुइ जवानी थी, जिसको रगडते हुए बदन के हर हिस्से को चुमते हुए, दांतो से काटते हुए रस चुसने लायक था। रात में सो जाने पर साडी उठा के चुत देखने की कोशीश की जा सकती थी, ज्यादा परेशानी शायद ना हो, क्योंकी उसे पता था की गांव की औरते पेन्टी नही पहनती।

इसी उधेडबुन में फसा हुआ, अपनी मां की हिलती गांड और उसमे फसे हुए पेटिकोट के कपडे को देखता हुआ, पिछे चलते हुए आम के पेडों के बीच पहुंच गया। वहां शीला देवी फ्लेश-लाईट (टोर्च) जला कर, उपर की ओर देखते हुए बारी-बारी से सभी पेडों पर रोशनी डाल रही थी।

"इस पेड पर तो सारे कच्चे आम है...इस पर एक-आध ही पके हुए दीख रहे..."

"इस तरफ टोर्च दिखाओ तो मां,,...इस पेड पर ...पके हुए आम दीख...।"

"कहां है,,,? इस पेड पर भी नही है, पके हुए...तु क्या करता था, यहां पर...?? तुझे तो ये भी नही पता, किस पेड पर पके हुए आम है...???"

मुन्ना ने शीला देवी की ओर देखते हुए कहा,
"पता तो है, मगर उस पेड से तुम तोडने नही दोगी...!।"

"क्यों नही तोडने दुन्गी,,?...तु बता तो सही, मैं खुद तोड कर खिलाउन्गी.."

फिर एक पेड के पास रुक गई,
"हां,,,!! देख, ये पेड तो एकदम लदा हुआ है पके आमो से...। चल ले, टोर्च पकड के दिखा, मैं जरा आम तोडती हु...।"
कहते हुए शीला देवी ने मुन्ना को टोर्च पकडा दीया। मुन्ना ने उसे रोकते हुए कहा,
"क्या करती हो...?, कहीं गीर गई तो ...? तुम रहने दो मैं तोड देता हुं...।"

"चल बडा आया...आम तोडने वाला...बेटा, मैं गांव में ही बडी हुइ हुं...जब मैं छोटी थी तो अपनी सहेलियों में मुझसे ज्यादा तेज कोई नही था, पेड पर चढने में...देख मैं कैसे चढती हुं..."

"अरे, तब की बात और थी..."

पर मुन्ना की बाते उसके मुंह में ही रह गई, और शीला देवी ने अपने पेटिकोट को थोडा उपर कर अपनी कमर में खोस लिया, और पेड पर चढना शुरु कर दीया।

मुन्ना ने भी टोर्च की रोशनी उसकी तरफ कर दी। थोडी ही देर में काफी उपर चढ गई, और पेर की दो डालो के उपर पैर जमा कर खडी हो गई, और टोर्च की रोशनी में हाथ बढा कर आम तोडने लगी. तभी टोर्च फिसल कर मुन्ना की हाथो से नीचे गीर गयी।

"अरे,,,,,क्या करता है तु...? ठीक से टोर्च भी नही दिखा सकता क्या ?"

मुन्ना ने जल्दी से नीचे झुक कर टोर्च उठायी और फिर उपर की...

"ठीक से दीखा,,,इधर की तरफ..."

टोर्च की रोशनी शीला देवी जहां आम तोड रही थी, वहां ले जाने के क्रम में ही रोशनी शीला देवी के पैरो के पास पडी तो मुन्ना के होश ही उड गये...॥

शीला देवी ने अपने दोनो पैरो को दो डालो पर टीका के रखे हुए थे. जीसके कारण उसका पेटिकोट दो भागो में बट गया था. और टोर्च की रोशनी सीधी उसके दोनो पैरो के बीच के अन्धेरे को चीरती हुइ पेटिकोट के अन्दर के माल को रोशनी से जगमगा दीया।

पेटिकोट के अन्दर के नजारे ने मुन्ना की तो आंखो को चौंधिया दीया। टोर्च की रोशनी में पेटिकोट के अन्दर कैद, चमचमाती मखमली टांगे पुरी तरह से नुमाया हो गई. रोशनी पुरी उपर तक चुत की काली काली झांठो को भी दीखा रही थी। टोर्च की रोशनी में कन्दली के खम्भे जैसी चिकनी मोटी जांघो और चुत की झांठो को देख, मुन्ना को लगा की उसका लंड पानी फेंक देगा. उसका गला सुख गया और हाथ-पैर कांपने लगे।

तभी शीला देवी की आवाज सुनाई दी,
"अरे, कहां दीखा रहा है ? यहां उपर दीखा ना...!!।

हकलाते हुए बोला,
"हां,,,! हां,,,!, अभी दीखाता...वो टोर्च गीर गयी थी..."

फिर टोर्च की रोशनी चौधराईन के हाथो पर फोकस कर दी। चौधराईन ने दो आम तोड लिये फिर बोली,
"ले, केच कर तो जरा..."
और नीचे की तरफ फेंके, मुन्ना ने जल्दी से टोर्च को कांख में दबा, दोनो आम बारी-बारी से केच कर लिये और एक तरफ रख कर, फिर से टोर्च उपर की तरफ दीखाने लगा...और इस बार सीधा दोनो टांगो के बीच में रोशनी फेंकी. इतनी देर में शीला देवी की टांगे कुछ और फैल गई थी. पेटिकोट भी थोडा उपर उठ गया था और चुत की झांठे और ज्यादा साफ दीख रही थी। मुन्ना का ये भ्रम था या सच्चाई पर शीला देवी के हिलने पर उसे ऐसा लगा, जैसे चुत के लाल लपलपाते होठों ने हल्का सा अपना मुंह खोला था। लौडा तो लुन्गी के अन्दर ऐसे खडा था, जैसे नीचे से ही चौधराईन की चुत में घुस जायेगा। नीचे अन्धेरा होने का फायदा उठाते हुए, मुन्ना ने एक हाथ से अपना लंड पकड कर हल्के से दबाया। तभी शीला देवी ने कहा,
"जरा इधर दीखा...।"

मुन्ना ने वैसा ही किया. पर बार-बार वो मौका देख टोर्च की रोशनी को उसकी टांगो के बीच में फेंक देता था। कुछ समय बाद शीला देवी बोली,
"और तो कोई पका आम नही दिख रहा।...चल मैं नीचे आ जाती हुं. वैसे भी दो आम तो मिल ही गये...। तु खाली इधर उधर लाईट दीखा रहा है, ध्यान से मेरे पैरों के पास लाईट दीखाना।"

कहते हुए नीचे उतरने लगी।

मुन्ना को अब पुरा मौका मिल गया. ठीक पेड की जड के पास नीचे खडा हो कर लाईट दीखाने लगा। नीचे उतरती चौधराईन के पेटिकोट के अन्दर रोशनी फेंकते हुए, उसकी मस्त मांसल, चिकनी जांघो को अब वो आराम से देख शकता था. क्योंकी चौधराईन का पुरा ध्यान तो नीचे उतरने पर था, हालांकी चुत की झांठो का दीखना अब बन्ध हो गया था, मगर चौधराईन का मुंह पेड की तरफ होने के कारण पिछे से उसके मोटे-मोटे चुतडों का नीचला भाग पेटिकोट के अन्दर दीख रहा था। गदराई गोरी गांड के नीचले भाग को देख लौडा अपने आप हिलने लगा था।

एक हाथ से लौडा पकड कस कर दबाते हुए, मुन्ना मन ही मन बोला, "हाये ऐसे ही पेड पर चढी रह उफफ्फ्...क्या गांड है ?...किसी ने आज तक नही मारी होगी एकदम अछूती गांड होगी...। हाये मां...लौडा ले कर खडा हुं, जल्दी से नीचे उतर के इस पर बैठ जा ना..."

ये सोचने भर से लंड ने दो-चर बुंद पानी तपका दी। तभी शीला देवी जब एकदम नीचे उतरने वाली थी की उसका पैर फिसला और हाथ छुट गया। मुन्ना ने हडबडा कर नीचे गीरती शीला देवी को कमर के पास से लपक के पकड लिया। मुन्ना के दोनो हाथ अब उसकी कमर से लिपटे हुए थे और चौधराईन के दोनो पैर हवा में और चुतड उसकी कमर के पास।

मुन्ना का लंड सीधा चौधराईन की मोटी गुदाज गांड को छु रहा था। गुदाज मांसल पेट के फोल्ड्स उसकी मुठ्ठी में आ गये थे। हडबडाहट में दोनो की समझ में कुछ नही आ रहा था, कुछ पल तक मुन्ना ने भी उसके भारी शरीर को ऐसे ही थामे रखा और शीला देवी भी उसके हाथो को पकडे अपनी गांड उसके लंड पर टीकाये झुलती रही।

कुछ देर बाद, धीरे से शरमाई आवज में बोली,
"हाय,,,,, बच गई,,,,,, अभी गीर जाती. अब छोड, ऐसे ही उठाये रखेगा क्या,,,,??"

मुन्ना उसको जमीन पर खडा करता हुआ बोला
"मैने तो पहले ही कहा था..."

शीला देवी का चेहरा लाल पर गया था। हल्के से मुस्कुराती हुइ, कनखियों से लुन्गी में मुन्ना के खडे लंड को देखने की कोशिश कर रही थी। अन्धेरे के कारण देख नही पाई मगर अपनी गांड पर, अभी भी उसके लौडे की चुभन का अहसास उसको हो रहा था। अपने पेट को सहलाते हुए धीरे से बोली,
"कितनी जोर से पकडता है तु ?,,,,लगता है, निशान पड गया..."

मुन्ना तुरन्त टोर्च जला कर, उसके पेट को देखते हुए बुदबुदाते हुए बोला,
"...वो अचानक हो...।"

मुस्कुराती हुइ शीला देवी धीरे कदमो से चलती मुन्ना के एकदम पास पहुंच गई...इतने पास की उसकी दोनो चुचियों का अगला नुकिला भाग लगभग मुन्ना की छातीयों को टच कर रहा था, और उसकी बनियान में कसी छाती पर हल्के से हाथ मरती बोली,
"पुरा सांढ हो गया है...तु... मैं इतनी भारी हुं...मुझे ऐसे टांग लिया...। चल आम उठा ले।"

मुन्ना का दिल किया कै, ब्लाउस में कसे दोनो आमो को अपनी मुठ्ठी में भर कर मसल दे. पर मन मार कर टोर्च अपनी मां के हाथ में पकडा, नीचे गीरे आमो को उठा लिया और अपनी मुठ्ठी में भर दबाता हुआ, उसकी पत्थर जैसी सख्त नुकिली चुचियों को घुरता हुआ बोला,
"पक गये है...चुस चुस...खाने में...।"

शीला देवी मुस्कुराती हुइ शरमाई सी बोली,
"हां,,,,चुस के खाने लायक,,,इसस्स्...ज्यादा जोर से मत दबा...। सरा रस निकल जायेगा...अराम से खाना ।"

चलते-चलते शीला देवी ने एक दुसरे पेड की डाल पर टोर्च की रोशनी को फोकस किया और बोली,
"इधर देख मुन्ना...ये तो एकदम पका आम है...। इसको भी तोड...थोडा उपर है...तु लम्बा है...जरा इस बार तु चढ के..."

मुन्ना भी उधर देखते हुए बोला,
"हां,,, है तो एकदम पका हुआ, और काफि बडा भी...है...तुम चढो ना...चढने में एक्ष्पर्ट बता रही थी, उस समय."

"ना रे, गीरते-गीरते बची हुं...फिर तु ठीक से टोर्च भी नही दीखाता...कहती हुं हाथ पर तो दीखाता है, पैर पर."

"हाथ हिल जाता है...।"

धिरे से बोली मगर मुन्ना ने सुन लिया,
"तेरा तो सब कुछ हिलता है...तु चढना...उपर..."

मुन्ना ने लुन्गी को दोहरा करके लपेटा लिया। इस से लुन्गी उसके घुटनो के उपर तक आ गई। लंड अभी भी खडा था, मगर अन्धेरा होने के कारण पता नही चल रहा था। शीला देवी उसके पैरो पर टोर्च दीखा रही थी।

थोडी देर में ही मुन्ना काफी उंचा चढ गया था। अभी भी वो उस जगह से दुर था जहां आम लटका हुआ था। दो डालो के उपर पैर रख जब मुन्ना खडा हुआ, तब शीला देवी ने नीचे से टोर्च की रोशनी सीधी उसकी लुन्गी के बीच डाली। चौडी-चकली जांघो के बीच मुन्ना का ढाई इंच मोटा लौडा आराम से दीखने लगा। लंड अभी पुरा खडा नही था. पेड पर चढने की मेहनत ने उसके लंड को ढीला कर दीया था, मगर अभी भी काफी लम्बा और मोटा दीख रहा था। शीला देवी का हाथ अपने आप अपनी जांघो के बीच चला गया। नीचे से लौडा लाल लग रहा था, शायद सुपाडे पर से चमडी हटी हुइ थी। जांघो को भींचती, होठों पर जीभ फेरती, अपनी नजरो को जमाये भुखी आंखो से देख रही थी।

"अरे,,,, रोशनी तो दीखाओ, हाथो पर...।"

"आ,,,हां,,हां,,,,,,तु चढ रहा था...। इसलिये पैरों पर दीखा...।",
कहते हुए उसके हाथो पर दीखाने लगी। मुन्ना ने हाथ बढा कर आम तोड लिया।

"लो पकडो...।"

शीला देवी ने जल्दी से टोर्च को अपनी कांखो में दबा कर अपने दोनो हाथ जोड लिये. मुन्ना ने आम फेंका और शीला देवी ने उसको अपनी चुचियों के उपर, उनकी सहायता लेते हुए केच कर लिया। फिर मुन्ना नीचे उतर गया और शीला देवी ने उसके नीचे उतर ते समय भी अपनी आंखो की उसके लटकते लौडे और अंडकोशो को देख कर अच्छी तरह से शिकाई की। मुन्ना के लंड ने चुत को पनीया दीय&